अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका व नैटो की रुचि का एक मुख्य कारण, जानिये

अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध जारी रहने और इस देश में अपनी सैन्य उपस्थिति जारी रखने में अमरीका व नैटो की रुचि का एक मुख्य कारण, उनके लिए अफ़ग़ानिस्तान का एक व्यापार केंद्र में परिवर्तित हो जाना है।

कुछ हल्क़े तो इसे अफ़ग़ानिस्तान के खनिज स्रोतों व ऊर्जा की लूटमार और इसी तरह मादक पदार्थों की पैदावार व तस्करी के दृष्टिगत इस देश में व्यापार की जंग भी कहते हैं।

वर्ष 2001 में अमरीका ने आतंकवाद से संघर्ष और अलक़ाएदा व तालेबान को समाप्त करने के बहाने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया था लेकिन व्यवहारिक रूप से उसने न केवल यह कि इन दोनों गुटों को समाप्त करने के लिए कोशिश नहीं की बल्कि 17 साल बीत जाने के बावजूद इस देश में दाइश समेत नए नए आतंकी गुट सामने आ गए हैं और आतंकवादी कार्यवाहियां कर रहे हैं। अफ़ग़ान राष्ट्रपति मुहम्मद अशरफ़ ग़नी के अनुसार इस देश में बीस से अधिक आतंकी गुट सक्रिय हैं।

इस संबंध में सबसे अहम सवाल इन आतंकी गुटों के आर्थिक स्रोतों के बारे में है और राजनैतिक हल्क़ों के विचार में मादक पदार्थों का उत्पादन और तस्करी, इन गुटों का मुख्य आर्थिक स्रोत है। अलबत्ता हाल ही में यह बात भी सामने आई है कि खनिज स्रोत भी अफ़ग़ानिस्तान में आतंकी गुटों के आर्थिक स्रोतों में शामिल हैं। पिछले सत्रह बरसों में अमरीका व ब्रिटेन के साथ ही आतंकी गुटों ने अफ़ग़ानिस्तान के जिन प्रांतों पर सबसे अधिक ध्यान दिया है उनमें से एक हेलमंद है। यह प्रांत अफ़ग़ानिस्तान में मादक पदार्थों का उत्पादन और तस्करी का केंद्र होने के साथ ही अनेक मूल्यवान खनिज स्रोतों का भी स्वामी है।

अफ़ग़ानिस्तान के एक सांसद उबैदुल्लाह बारकज़ई कहते हैं कि हेलमंद प्रांत में उपस्थिति और उस पर नियंत्रण के लिए आतंकी व चरमपंथी गुटों की उपस्थिति का सबसे अहम कारण इस प्रांत में यूरेनियम की खदानों की मौजूदगी और मादक पदार्थों की पैदावार है। हिलमंद में युद्ध व अस्थिरता के सैनिक पहलुओं के अलावा आर्थिक पहलू भी हैं जिनमें मादक पदार्थों का व्यापार और यूरेनियम का निष्कासन शामिल है।

पिछले तीन दशक से अफ़ग़ानिस्तान, दुनिया में मादक पदार्थों विशेष कर अफ़ीम की पैदावार में पहले नंबर पर है। वस्तुतः यह देश अफ़ीम की पैदावार में गोल्डन ट्राइंगल के म्यांमार और अमरीका महाद्वीप के मैक्सिको व कोलम्बिया जैसे देशों से भी आगे है। वर्ष 2001 के बाद से जब अमरीका व उसके घटक देशों के सैनिकों ने अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा किया, इस देश में अफ़ीम की खेती और पैदावार में बेहिसाब वृद्धि होती चली गई। इस प्रकार से कि इन सत्रह बरसों में अफ़ग़ानिस्तान में अफ़ीम की पैदावार में चालीस गुना की वृद्धि हो गई है और अब यह आंकड़ा साढ़े आठ हज़ार टन तक पहुंच गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार अमरीका द्वारा अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा किए जाने के बाद से अफ़ीम की खेती की ज़मीनों में साठ प्रतिशत की वृद्धि हो गई है और अब इस देश में लगभग ढाई लाख हेक्टयर ज़मीन पर अफ़ीम बोई जाती है। इससे पता चलता है कि आतंकी गुट अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों के किसानों को पोस्ते की खेती करने पर मजबूर करते हैं। इन बरसों में अफ़ग़ानिस्तान में औद्योगिक स्तर पर अफ़ीम की पैदावार में भी वृद्धि हुई है।

स्वतंत्र संचार माध्यमों के अनुसार अमरीका की गुप्तचर संस्था सीआईए, निजी सुरक्षा कंपनियां विशेष कर ब्लैक वाटर, जिसने अपना नाम बदल कर एकेडमी रख लिया है और अमरीकी सेना व रक्षा मंत्रालय से संबंधित तत्व अफ़ग़ानिस्तान में मादक पदार्थों की पैदावार और तस्करी में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं हालांकि इस मामले में ब्रिटेन की भूमिका की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। इसका अर्थ यह है कि अफ़ग़ानिस्तान के युद्ध की हैसियत बदल चुकी है और अब यह अतिग्रहणकारी सैनिकों के लिए आय के स्रोत में बदल चुका है।

कनाडा की ग्लोबल रिसर्च वेबसाइट ने अपनी हालिया रिपोर्ट में लिखा है कि अफ़ग़ानिस्तान में मादक पदार्थों की तस्करी से अमरीका को हर साल 50 अरब डालर से अधिक की आय होती है। अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने यह रक़म 60 से 100 अरब डालर तक बताई थी। अमरीकी सेनेट के जांच आयोग ने भी घोषणा की है कि हर साल 500 से 1000 अरब डालर ब्लैक मनी, संसार के बैंकों में वाइट की जाती है जिसमें से आधी राशी अमरीकी बैंकों में वाइट की जाती है।

हफ़िंग्टन पोस्ट ने अमरीकी प्रतिनिधि सभा में पूर्व रिपब्लिकन सांसद के हवाले से अफ़ग़ानिस्तान में मादक पदार्थों की तस्करी में सीआईए की भूमिका को अत्यंत निर्णायक बताया है। ग्लोबल रिसर्च ने भी बताया है कि सीआईए, अफ़ग़ानिस्तान में अपने ख़र्चे इस देश में हेरोइन से हासिल होने वाली आय से पूरा करती है। अमरीका के एक इतिहासकार और पिछले पचास बरसों में अमरीका के सभी युद्धों में मादक पदार्थों की तस्करी में सीआईए के हस्तक्षेप के बारे में शोध करने वाले अल्फ़्रेड मैककोय का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान के मादक पदार्थों पर निर्भर अर्थव्यवस्था ऐसी परियोजना है जो सीआईए की ओर से पूरी गंभीरता से और अमरीका की विदेश नीति की मदद से तैयार की जाती है।

अफ़ग़ानिस्तान में अनेक निजी सुरक्षा कंपनियां भी सक्रिय हैं और इस देश के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई के अनुसार अनेक अपराधों और मादक पदार्थों की तस्करी में ये कंपनियां लिप्त हैं। ब्रिटिश समाचारपत्र गार्डियन के अनुसार निजी सुरक्षा कंपनी ब्लैक वाटर या एकेडमी ने अफ़ग़ानिस्तान में मादक पदार्थों से हासिल होने वाली आय के अलावा मादक पदार्थों से संघर्ष के लिए अमरीका की ओर से ख़र्च की जाने वाली तथाकथित राशि का एक चौथाई भाग हासिल कर लिया है। हाल ही में जर्मनी के मीडिया ने भी रहस्योद्घाटन किया था कि अफ़ग़ानिस्तान में नैटो की छावनियों के लिए सामान पहुंचाने वाली एक निजी एजेंसी इकोलोग, जिस पर अलबानियाई माफ़िया से संबंध रखने का संदेह है, अफ़ग़ानिस्तान से कोसोवो और जर्मनी तक मादक पदार्थों की तस्करी में लिप्त रही है।

अफ़ग़ान समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी सैनिकों विशेष कर अमरीकी सैनिकों की बड़ी छावनियों के आस-पास अफ़ीम की खेती से पता चलता है कि इन छावनियों की छत्रछाया में ही मादक-पदार्थों का व्यापार फल-फूल रहा है। रोचक बात यह है कि इन छावनियों तक अफ़ग़ानिस्तान की किसी भी राष्ट्रीय व सरकारी संस्था की पहुंच नहीं है। इस आधार पर अफ़ग़ानिस्तान के विभिन्न हल्क़ों में यह बुनियादी सवाल पैदा हो रहा है कि इस देश में पैदा होने वाले 8500 टन मादक पदार्थों को किस प्रकार अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकाल कर अंतर्राष्ट्रीय मंडियों तक पहुंचाया जाता है? इन हल्क़ों का मानना है कि तालेबान और मादक पदार्थों के व्यापार में शामिल अन्य गुट अकेले ही इतनी बड़ी मात्रा में मादक पदार्थों को देश से बाहर भेजने में सक्षम नहीं हैं और अमरीका और नैटो की हवाई छावनियां इस संबंध में अहम भूमिका निभा रही हैं।

प्रत्येक दशा में अफ़ग़ानिस्तान में मादक पदार्थ न केवल यह कि चरमपंथी व आतंकी गुटों लिए अहम आर्थिक स्रोत हैं बल्कि विदेशी सेनाओं के लिए अफ़ग़ानिस्तान का अतिग्रहण जारी रखने और आय की प्राप्ति का भी एक अहम साधन हैं। इसी कारण न केवल यह कि अफ़ग़ानिस्तान के सरकार विरोधी सशस्त्र गुट हथियार रख कर इस देश की शांति प्रक्रिया में शामिल होने में रुचि नहीं रखते बल्कि अमरीका और नैटो भी अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा कर अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सैन्य स्थिति को पहले से अधिक मज़बूत बनान की कोशिश में हैं।

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