अमरीका में पुलिस द्वारा अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का साम्राज्य : पार्ट 1

कार्यक्रम “अमरीका, भेदभाव का साम्राज्य” की पहली कड़ी में हम अमरीका में पुलिस द्वारा अल्पसंख्यकों पर अत्याचार पर चर्चा कर रहे हें।

अमरीका में अल्पसंख्यकों बल्कि अल्पसंख्यकों से संबधं रखने वाले संदिग्ध बच्चों के साथ जिस प्रकार से हिंसा की जाती है उस से विश्व समुदाय में चितां व्याप्त है। एसा लगता है कि अल्पसंख्यको के खिलाफ, अमरीकी पुलिस जिस प्रकार की हिंसा करती है उसकी जड़ें, नस्लीय, भेदभाव से जुड़ी हैं कि जिसका अतीत अमरीका में बहुत पुराना है। अमरीका का वर्तमान इतिहास, यूरोपीय विशेषकर ब्रिटिश पलायनकर्ताओं से आरंभ हुआ और यह देश दासों के व्यापार और उनके परिश्रम से आगे बढ़ा। अमरीका में अश्वेतों रेड इंडियन्स तथा चीनी व लेटिन अमरीकी मूल के लोगों तथ मुसलमानों, बौद्धों और यहूदियों को अल्पसंख्यक कहा जाता है।

अमरीका में काले वर्ण के लोग वह दास हैं जिन्हें सदियों पहले, खेतों तथा अन्य स्थानों पर काम के लिए अमरीका ले जाया गया था। दूसरे नंबर पर रेड इंडियंस हैं जो वास्तव में इस महाद्वीप के मूल निवासी हैं लेकिन युरोपीय पलायन कर्ताओं द्वारा लूट मार की वजह से वह निर्धन हो चुके हैं हालांकि यह लोग बेहद परिश्रमी होते हैं। तीसरे नंबर पर एशियाई व पूर्वी एशिया से संबंध रखने वाले तथा लेटिन अमरीका के लोग हैं जो कम मज़दूरी और तेज़ काम में दक्षता की वजह से अमरीका के विभिन्न क्षेत्रों में व्यस्त हो गये। इस प्रकार से यदि देखा जाए तो आज जो अमरीका का विकास है वह वास्तव में अवश्वेतों के परिश्रम और श्वेतवर्ण के लोगों द्वारा उनके दोहन से संभव हुआ है। अमरीका में मुसलमान और ज़ायोनी विरोधी यहूदी भी उन अल्पसंख्यकों में शामिल हैं जिन्हें पुलिस की हिंसा का निशाना बनाया जाता है। अमरीका का पुंजीवादी आर्थिक तंत्र, जिसे उदारवादी अर्थ व्यवस्था कहा जाता है, इन अल्पसंख्यकों के लिए व्यापक स्तर पर विकास का अवसर प्रदान करने में विफल रहा है। यहीं बल्कि इस व्यवस्था पर , इन अल्पसख्यंकों के दमन का भी आरोप है।

अमरीकी की पुंजीवादी व्यवस्था, केवल अल्पसंख्यकों को ही नहीं बल्कि अमरीका के अन्य लोगों को भी निशाना बनाती है जिसकी वजह से जनता में असंतोष है। यह असंतोष वाल स्ट्रीट आंदोलन जैसे रूपों में सामने आता रहता है। हालांकि पुलिस के दमन के कारण इस आंदोलन का भी कुछ लाभ नहीं हुआ। सन 2011 से 2011 के मध्य वाल स्ट्रीट आंदोलन के सदस्यों का यह नारा था कि हम अमरीकी जनसंख्या के 99 प्रतिशत हैं लेकिन हमारे पास मात्र एक प्रतिशत देश की पुंजी है जबकि बाकी 99 प्रतिशत देश की पुंजी, अमरीका की जनसंख्या के मात्र एक प्रतिशत के पास है। इस आंदोलन का दमन हो गया है लेकिन अमरीका की स्थिति यथावत बनी हुई है। अमरीका में फैली इस निर्धनता में अधिकांश, अल्पसंख्यक ही ग्रस्त हैं और निर्धनता के साथ ही साथ उन्हें नस्लभेद और पुलिस की हिंसा, जेल, यातना, का भी सामना करना पड़ता है।

अमरीका में नस्लभेद की यह हालत है कि इस देश के श्यामवर्ण के नागरिक, मात्र 12 प्रतिशत हैं लेकिन जेल के बंदियों में पचास प्रतिशत श्याम वर्ण के लोग हैं। अमरीका में श्यामवर्ण के लोगों में व्याप्त निर्धनता, उन्हें अपराधों की दलदल में ढकेलती है जिससे विभिन्न प्रकार की समस्याएं उत्पन्न होती हैं और पुलिस भी पहले उन्हीं पर किसी भी अपराध के मामले में संदेह करती है जिसके परिणाम में वह पुलिस की हिंसा के शिकार होते हैं और उन्हें जेल में डाल दिया जाता है। अमरीका में श्याम वर्ण की महिलाएं भी नस्लभेद से सुरक्षित नहीं हैं। जब श्याम वर्ण के लोग जेल चले जाते हैं तो उनके घर की महिलाएं विभिन्न समस्याओं में ग्रस्त हो जाती हैं और फिर वह घर का खर्च चलाने के लिए वेश्यावृत्ति सहित विभिन्न काम करने पर विवश होती हैं। इस वातावरण में उनकी संतान भी अपराधी बन जाती हैं और यह दुश्चक्र इसी प्रकार चलता रहता है। इस से अमरीका में श्याम वर्ण के लोगों के बारे में श्वेतवर्ण के लोगों में धारणा गलत बनती जाती है। जब अभिभावक जेल में हो तो फिर संतान और परिवार के अन्य सदस्यों पर भी उसका बुरा प्रभाव पड़ता है और इस स्थिति को बदलने का कोई मार्ग नहीं रहता जिससे अमरीकी समाज में विभिन्न वर्गों की एक दूसरे से दूरी बढ़ती है और मोहल्ले, इलाक़े और प्रान्त एक दूसरे से दूर होते चले जाते हैं। इस दौरान अगर कोई श्याम वर्ण के व्यक्ति तरक्क़ी करके ऊपर पहुंच जाता है और स्वेत वर्ण के लोगों के मध्य उनके मोहल्ले में रहने लगता है तो उसे पड़ोसियों से लेकर, मोहल्ले के दुकानदार तक, सब संदेह की दृष्टि से देखते हैं और उस पर कड़ी नज़र रखते हैं। इस प्रकार के व्यवहार का पता, अमरीकी सिनेमा से चलता है।

गत दशकों के दौरान, हालीवुड में, रेड इंडियन्स और श्याम वर्ण के लोगों के विरुद्ध नस्लभेद के विषय पर आधारित कई फिल्में बनायी गयी हैं। हालीवुड की आरंभिक फिल्मों में हमें नस्लभेद और श्यामवर्ण के लोगों के विरुद्ध प्रचार पूरी तरह से स्पष्ट रूप में नज़र आता है। इन फिल्मों में रेड इंडियन्स जैसे अन्य अल्पसंख्यकों को भी हिंसक रूप में दिखाया गया है। उदाहरण स्वरूप सस्पेक्ट (Suspect) नामक फिल्म में हालीवुड काले वर्ण के विरुद्ध पुलिस की हिंसा को दिखाता है जबकि शायन क़बीले का पतझड़ (Cheyenne Autumn) नामक फिल्म में रेड इंडियन्स के खिलाफ सरकारी सुरक्षा बलों की हिंसा को दर्शाया गया है। वास्तव में नस्लभेद विशेषकर, काले वर्ण के लोगों के खिलाफ, अमरीका में संगठित रूप से होता है और यह एक प्रकार से व्यवस्था का हिस्सा है। अमरीका में नस्लभेद, इस देश में दासता के इतिहास से जुड़ा है और उसका संबंध 17वीं शताब्दी की परिस्थितियों से है। हालांकि अमरीका में दासता के क़ानून को खत्म हुए सदियां बीत गयी हैं किंतु इस देश में जातीय व नस्लीय अल्पसंख्यक, चाहे वह काले वर्ण के लोग हों, या फिर पलायनकर्ता, सब के सब नस्लभेद का शिकार होते और इस का विरोध करते हैं। अमरीका में नस्लभेद एसी वास्तविकता है जिसे आज स्वंय अमरीकी भी स्वीकार करते हैं।

अमरीकी इतिहास के एक मात्र श्यामवर्ण के राष्ट्रपति, बाराक ओबामा ने , 18 वर्ष के एक श्याम वर्ण के युवा की एक श्वेत वर्ण पुलिस के हाथों हत्या और फिर अदालत द्वारा श्वेत वर्ण के पुलिस कर्मी को बरी किये जाने के बार में सन 2013 में कहा था कि अफ्रीकी मूल के बहुत कम एसे अमरीकी मिलेंगे जिन्होंने कभी न कभी पुलिस के दुर्व्यवहार का सामना न किया हो, मुझे स्वयं भी इसका अनुभव हो चुका है। यह सब एसी दशा में है कि अमरीका में पुलिस द्वारा श्यामवर्ण के लोगों के खिलाफ नस्लभेद तथा जन प्रदर्शनों का दमन इस देश में एक आम बात हो गयी है और अमरीका में अश्वेतों के खिलाफ न्यायालय और पुलिस द्वारा नस्लभेद, उनके मानवाधिकारों के उल्लंघन का स्पष्ट चिन्ह है। रोचक बात तो यह है कि अमरीका में इतने व्यापक स्तर पर और प्रयोजित रूप से मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है किंतु अमरीका हर साल दुनिया भर में मानवाधिकारों की दशा पर रिपोर्ट प्रकाशित करता और विभिन्न देशों की आलोचना करता है और अमरीका में पुलिस द्वारा हिंसा और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर इस देश के राष्ट्रपति तक मात्र खेद जता कर चुप हो जाते हैं जिसकी वजह से अल्पसंख्यकों विशेषकर श्याम वर्ण के लोगों के प्रति नस्लभेद समाप्त नहीं हो रहा है।

इस प्रकार की एक हिंसा का उदाहरण उस समय देखने को मिला जब कैलीफोर्निया के सनबर्नान्डीनो नगर में 9 पुलिस कर्मियों ने एक संदिग्ध की कई मिनट पर बुरी तरह से पिटाई की। इसी प्रकार एक गोरे पुलिस कर्मी के हाथों एक काले वर्ण के युवा की हत्या की बरसी पर फरगूसन नगर में जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो रहा था तो पुलिस की हिंसा में एक अन्य युवा सब के सामने ही मार डाला गया। अमरीका में इस प्रकार की बार बार घटने वाली घटनाएं यह दर्शाती हैं कि पुलिस और न्यायालय में नस्लभेद, हिंसा और भेदभाव पूरी तरह से रच बस गया है। अमरीका में अफ्रीकी मामलों पर पीएचडी करने वाले रेन्डी शोर्ट का इस बारे में कहना है कि अमरीका में पुलिस के क्रिया कलापों पर नज़र रखने वाली संस्था ने जनता के साथ पुलिस के व्यवहार की सौ से अधिक वीडियो क्लिप देखने के बाद एक रिपोर्ट तैयार की है जिससे पता चलता है कि पुलिस का रवैया बेहद हिंसक होता है यहां तक कि वह फायरिंग करने में भी संकोच नहीं करते। रेंडी शोर्ट ने अमरीका के श्याम वर्ण के लोगों के विरुद्ध, पुलिस की हिंसा को एक प्रकार से प्रायोजित और जातीय सफाये की संज्ञा दी है।

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