कहो ईश्वर एक है : अल्लाह के ख़ास बन्दे : पार्ट 1

चौदह सौ साल पहले जब अरब जगत, अंधविश्वास, भ्रष्टाचार और अज्ञानता के अंधकार में डूबा हुआ था, मक्का नगर में इस्लाम का सूरज उदय हुआ और इस नगर की गलियां और लोगों के दिल, ज्ञान की रौशनी से भर गये।

आरंभ में उसकी रौशनी, सीमित और हल्की थी, इतनी हल्की की अरब के घमंडी सरदारों को महसूस भी नहीं हुई लेकिन धीरे धीरे इस सूरज की रौशनी इतनी बढ़ी कि पूरे अरब जगत के क़बाइली सरदारों की आंखें चुंधिया गयीं। इस्लाम फैलता गया, और समाज के सताए गये और शोषित लोग, मज़बूत और अत्याचारी शक्तिशाली सरदार, कमज़ोर होते चले गये। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने एलान कर दिया थाः कहो ईश्वर एक है, कल्याण हो जाएगा। इस नारे से पूरा अरब जगत गूंजने लगा और उस आवाज़ को दबाने की हर कोशिश नाकाम रही। इस्लाम का सूर्योदय हो चुका था, दुनिया में उसकी रौशनी फैल चुकी थी।

“कहो ईश्वर एक है, कल्याण हो जाएगा”

यह सब कुछ इतना आसान नहीं था। पैगम्बरे इस्लाम ने कितना मुश्किल काम किया है यह जानने के लिए हमें सब से पहले उस दौर के अरब जगत और वहां की सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों से अवगत होना पड़ेगा। हमारे साथ रहें।

अरब प्रायद्वीप या हिजाज़ का क्षेत्रफल, 30 लाख वर्गकिलोमीटर है। उसके तीन ओर पानी है। पश्चिम में रेड सी, दक्षिण में अदन की खाड़ी और हिन्द महासागर तथा पूर्व में फ़ार्स की खाड़ी और ओमान सागर हैं।

पुराने ज़माने में हिजाज़ या अरब प्रायद्वीप में जीवन बहुत ही कठिन था। लोग बहुत ही कठिन सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक परिस्थितियों में ज़िंदगी गुज़ारते थे। उस दौर में, सामाजिक व्यवस्था, क़बाइली और ख़ान्दानी थी। यहां तक कि शहरों में रहने वाले भी, अपनी कबाइली जड़ों से जुड़े रहते थे। ख़तरों से खेलते हुए एक इलाक़े से दूसरे इलाके कूच करने वाले इन बंजारों के जीवन की विशेष शैली और सूखे रेगिस्तान की वजह से यह अरब अपने क़रीबी रिश्तेदारों के साथ रहने को तरजीह देते थे इसी तरह साथ रहते रहते उनकी संख्या बढ़ती जाती और वह एक क़बीला बन जाता था। अरब हर क़िस्म के ख़तरे से निपटने के लिए सिर्फ़ उन लोगों की सहायता पर भरोसा करते थे जिनकी उनकी ख़ूनी या फिर किसी अन्य प्रकार की रिश्तेदारी हो। इस प्रकार से वह दूसरे क़बीलों की ओर से संभावित हमलों से ख़ुद को बचाने का इंतेज़ाम करते थे और दूसरे क़बीलों पर हमला करने के लिए उनकी ताक़त भी इसी प्रकार की जीवनशैली की देन थी। रेगिस्तान में रहने की वजह से वह इस प्रकार की जीवन शैली अपनाने पर मजबूर थे लेकिन इसके साथ ही इस शैली की वजह से परिवार और वंश एक दूसरे पर वरीयता का कारण बन गया और जिस क़बीले के लोगों की संख्या जितनी ज़्यादा होती थी, उसके लोग उतना ही ज़्यादा गर्व करते थे क्योंकि उनके पास ताक़त भी अधिक होती थी।

रेगिस्तान में रहने वाला एक अरब

क़बाइली समाज की सब से बड़ी कमी यह होती है कि वह किसी केन्द्रीय सरकार के तहत नहीं होता यहां तक कि मक्का और यसरब जैसे अरब जगत के महत्वपूर्ण नगरों में भी, सरकार व शासन या उसके लिए ज़रूरी दरबार, अदालत या जेल जैसी कोई चीज़ मौजूद नहीं थी बल्कि हर क़बीला अपने आप में एक राजनीतिक व्यवस्था था और अपने समाज को क़बीले का सरदार अपनी इच्छा के अनुसार चलाता था।

धार्मिक आस्था के लिहाज़ से उस दौर के अक्सर अरब, अनेकेश्वरवादी थे हालांकि प्राचीन काल में यह लोग हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के धर्म के अनुयाई और एकेश्वरवादी थे लेकिन धीरे-धीरे एकेश्वरवाद कम होता गया और उसकी जगह अनेकेश्वरवाद और मूर्ति पूजा ने ले ली। इस परिवर्तन में सब से बड़ी भूमिका , कुछ क़बाइली सरदारों की थी । यही वजह है कि कुछ अरब इतिहासकारों ने लिखा है कि ” अम्र बिन लुहय” से पहले तक अरब के अधिकांश लोग हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के धर्म के अनुयाई थे। ” अम्र बिन लुहय” ” शाम्मात” नामक क्षेत्र से ” हुबल” नामक एक मूर्ति मक्का ले गया और लोगों को उसकी पूजा के लिए प्रेरित किया। इस तरह से अरब में धीरे धीरे मूर्ति पूजा शूरु हुई। इसके अलावा यह भी रस्म थी कि मक्का से बाहर जाने वाला हर यात्री अपने साथ काबे में मौजूद कोई पत्थर अपने साथ ले जाता और वापसी तक उस पत्थर की पूजा करता । इस चलन की वजह से भी मूर्ति पूजा को बढ़ावा मिला। धीरे धीरे और कई पीढ़ियों के बाद इन अरबों ने हज़रत इब्राहीम के धर्म को पूरी तरह से भुला दिया और मूर्ति पूजा में व्यस्त हो गये।अल्बत्ता अधिकांश अरब ” अल्लाह” में आस्था रखते थे किंतु दूसरे देवताओं को उसका भागीदार मानते और उन भागीदारों की भी पूजा करते। आरंभ में अल्लाह की उसके कामों में सहायता करने वाले इन ” सहायकों ” की संख्या कम थी लेकिन फिर उनकी संख्या बढ़ने लगी यहां तक कि जब अरब जगत में पैगम्बरे इस्लाम ने अपनी पैग़म्बरी की घोषणा की तो उस समय, साल के दिनों के अनुसार 360 मूर्तियां, काबे में रखी हुई थीं। उनमें सब से अधिक प्रसिद्ध तीन देवियों की मूर्तियां थीं, ” लात” ” मनात” और ” उज़्ज़ा” अरब इन देवियों को “ईश्वर की बेटियां ” कहते थे और उनके ख्याल में इन की पूजा से ईश्वर प्रसन्न होता है।

 

प्राचीन अरब जगत में पूजी जाने वाली कुछ मूर्तियां

प्राचीन अरब में शिक्षा व्यवस्था का कोई नाम व निशान नहीं था और पढ़ने लिखने का बिल्कुल ही चलन नहीं था। पूरे अरब जगत में जिन लोगों को पढ़ना और लिखना आता था उनकी संख्या उंगलियों पर गिने जाने लायक़ थी और उनसे पूरा अरब जगत अवगत था। उस दौर के अरब जगत में शक्ति और परंपरा को ही सब से अधिक महत्व दिया जाता था और ताक़त, वरीयता का पैमाना था इसी लिए समाज पुरुष प्रधान था और सब कुछ उसे ही हासिल था। मर्द अपनी बीवी और बच्चों का स्वामी होता और उनके बारे में जो भी फैसला करता वह सब के लिए मान्य होता।

अरबों के जीवन के हर क्षेत्र में अज्ञानता का अंधकार देखा जा सकता था। वंश की वरीयता, लूटमार, निर्दयता, कबाइली व जातीय भेदभाव तथा बेटियों और औरतों के बारे में उनके दृष्टिकोण, इसकी मिसाल हैं। बेटियों के बारे में उस समय के अरब जगत की भावनाओं का वर्णन करते हुए कुरआने मजीद के सूरे नेह्ल की आयत 58 और 59 में कहा गया है कि जब किसी मर्द को यह बताया जाता था कि उसकी बीवी ने बेटी को जन्म दिया है तो उसका चेहरा ग़ुस्से से काला पड़ जाता था और वह क्रोधित हो जाता और वह समझ नहीं पाता था कि अपनी इस बेटी को अपमान स्वीकार करते हुए अपने पास रखे या फिर उसे ज़िन्दा ही ज़मीन में दफ़्न कर दे। इस प्रकार से बहुत से अरब अपनी बेटियों को जीवित ही गाड़ दिया करते थे।

…वह समझ नहीं पाता था कि अपनी इस बेटी को अपमान स्वीकार करते हुए अपने पास रखे या फिर उसे ज़िन्दा ही ज़मीन में दफ़्न कर दे…

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली खामेनई, अरब जगत में पैगम्बरे इस्लाम से पहले के दौर का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि ” समाज में एक तरफ हर प्रकार की निरंकुशता थी तो दूसरी तरफ अपनी इच्छाओं का अनुसरण करने वाले निर्दयता और तबाही फैलाने में इस हद तक आगे बढ़ जाते थे कि जिस के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था यह लोग अपने बच्चों को ही मार डालते थे।”

अरब के आस पास के इलाक़ों में भी बहुत अच्छे हालात नहीं थे। उस दौर में ईरान और पूर्वी रोम का साम्राज्य था और तत्कालीन सभ्य समाज के यह दोनों बड़े साम्राज्य एक दूसरे के खिलाफ लड़ाई में व्यस्त थे। ईरानियों और रोमियों के मध्य सन 531 से 589 ईसवी तक चलने वाला युद्ध अनुशेरवान शासन से आरंभ हुआ और ” खुसरो परवेज़” के शासन काल तक जारी रहा। चौबीस वर्षों तक चलने वाले इस युद्ध ने ईरान और रोम को भारी नुक़सान पहुंचाया । युद्ध के नतीजे में पैदा होने वाली समस्याओं और बड़े अफसरों के अत्याचार की वजह से जंग खत्म होते होते इन दोनों साम्राज्यों का बस नाम ही बचा था । प्रसिद्ध इतिहासकार ” सईद नफीसी” ने ईरान के सामाजिक इतिहास पर लिखी गयी अपनी किताब ” तारीखे एजतेमाई ईरान” में इस्लाम के उदय के समय ईरानियों की स्थिति के बारे में लिखा हैः

” … जिस चीज़ ने ईरानियों के मध्य सब से अधिक फूट डाली थी वह दर अस्ल सासानी राजाओं द्वारा समाज का अत्याधिक क्रूर बंटवारा था अलबत्ता यह प्रचलन ईरानी समाज में सासानी काल से भी पहले से चला आ रहा था लेकिन सासानी काल में उसका रिवाज बढ़ गया। सब से पहले सात शाही परिवार थे । उनके बाद पांच वर्गों को कुछ सुविधाएं मिली थीं लेकिन आम जनता हर चीज़ से वंचित थी। ” स्वामित्व” सिर्फ उन्ही सात परिवारों से विशेष था।”

दूसरी ओर पूर्वी रोम यानी बाइज़ेंटाइन साम्राज्य अरब जगत का दूसरा पड़ोसी था जो अपने समय में विश्व का सब से बड़ा और ताक़तवर साम्राज्य था लेकिन छठीं ईसवी सदी में ” जस्टियन” के काल में रक्तरंजित घटनाओं में ग्रस्त था। इस रोमी सम्राट का एेश्वर्य पूर्ण जीवन उस काल के लोगों की दुखदायी परिस्थितियों को दर्शाता है। बाइज़ेंटाइन के लोगों ने जो अधिकांश ईसाई थे ” जस्टियन ” के काल में जो सत्ता को ईश्वर की धरोहर कहता था, अत्याधिक कठिन हालात का सामना किया।

इन हालात में इस्लाम का उदय हुआ और पूरी दुनिया को संदेश दिया कि वह ईश्वरीय संदेश के साथ आया है। इस संदेश से दुनिया बदल गयी। इस धर्म ने एकेश्वरवाद का नारा लगाया और लोगों के दिलों में उम्मीद की किरण जगायी। इस महान मिशन की बागडोर, पैगम्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के हाथ में थी कि जिन्हें कुरआने मजीद ने प्रकाशमय चिराग़ की उपाधि दी है।

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