#यमन युद्ध : अमरीका पश्चिम एशिया को भौगोलिक दृष्टि से छोटे छोटे देशों में बांटना चाहता है : एक विस्तृत रिपोर्ट

सऊदी अरब ने 26 मार्च 2015 को यमन के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया था और इसे निर्णायक तूफ़ान का नाम दिया था।

रियाज़ ने घोषणा की थी कि इस युद्ध का लक्ष्य, यमन के पूर्व राष्ट्रपति मंसूर हादी को सत्ता में वापस लाना है। मंसूर हादी ने दो कारणों से अपनी वैधता समाप्त कर ली थी। पहला यह कि हादी के राष्ट्रपति काल की बढ़ी हुई अवधि फ़रवरी 2015 में समाप्त हो गई थी, जिसके बाद देश में चुनावों का आयोजन होना चाहिए था, लेकिन हादी सरकार ने इसके लिए कोई क़दम नहीं उठाया। इसलिए सत्ता में बना रहना उनके लिए ग़ैर क़ानूनी था। दूसरा यह कि आंतरिक परिस्थितियों और अंसारुल्लाह आंदोलन के साथ बढ़ते तनाव के कारण, हादी ने देश से भाग निकलने को प्राथमिकता दी। पूर्व राष्ट्रपति देश में सैन्य हस्तक्षेप का अधिकार नहीं रखता है। इन परिस्थितियों को देखते हुए सऊदी अरब द्वारा हादी को सत्ता में वापस लौटाने का दावा, केवल एक धोखा और राजनीतिक छल है।

यमन पर सऊदी अरब के हमलों की तीन आयामों से समीक्षा की जा सकती है। यमन, सऊदी अरब के लिए विभिन्न कारणों से बहुत महत्वपूर्ण है। यमन की 1458 किलोमीटर की सीमाएं सऊदी अरब से मिलती हैं। आले सऊद शासन यमन में अपने वर्चस्व वाली सरकार देखना चाहता है। हालांकि 2014 के घटनाक्रमों के कारण, हौसियों की भूमिका कि जो ज़ैदी शिया मुसलमान हैं, बढ़ रही है। उत्तरी यमन में ज़ैदियों की मौजूदगी और उनका दक्षिणी सऊदी अरब की सीमाओं के पड़ोस में होना, इसलिए आले सऊद शासन के क्रोध का कारण बनाते क्योंकि ज़ैदियों और आले सऊद की विचारधारा एक दूसरे की विपरीत दिशा में हैं। इसलिए हौसियों की स्थिति को कमज़ोर करने के लिए यमन पर हमला किया गया।

इसके अलावा, भूरणनीति के लिहाज़ से यमन का काफ़ी महत्व है। बाबुल मंदब स्ट्रेट यमन में स्थित है। यह स्ट्रेट लाल सागर और हिंद महासागर के बीच स्थित है और पूरब एवं पश्चिम के जल मार्ग के सबसे निकट है। सऊदी अरब विश्व में सबसे अधिक तेल निर्यात करने वाला देश है, इसलिए बाबुल मंदब स्ट्रेट का उसके लिए बहुत महत्व है। एशिया, यूरोप और अफ़्रीक़ा के बीच होने वाले समुद्री व्यापार का दो तिहाई भाग इस स्ट्रेट से विशेष है। इसके अलावा, अदन खाड़ी और कई द्वीप भी यमन में स्थित हैं। 2014 के घटनाक्रमों से सऊदी अरब को यह चिंता हो गई कि यह स्ट्रेट कहीं यमन की ऐसी सरकार के निंयत्रण में न आ जाए जो उसके बराबर की हो।

2011 और 2014 में यमन में घटने वाले घटनाक्रम सीधे तौर पर देश की आंतरिक स्थिति को प्रभावित कर सकते थे। यमन में सत्ता परिवर्तन और उसमें अंसारुल्लाह आंदोलन के शामिल होने से लोकतंत्र व्यवस्था की स्थापना होती, जिसके कारण लेबनान और इराक़ की तरह सत्ता में समस्त धार्मिक समुदायों की भागीदारी होती। इस परिवर्तन का सऊदी अरब पर भी असर पड़ सकता था, इसलिए कि सऊदी अरब में तानाशाही शासन है और लोग इस व्यवस्था से नाराज़ हैं। देश में बढ़ती चिंताओ के कारण भी सऊद शासन ने यमन पर हमला कर दिया, ताकि पड़ोसी देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना न हो सके।

सऊदी अरब ने ऐसी परिस्थितियों में यमन पर हमला किया है कि जब सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ और उनके बेटे मोहम्मद बिन सलमान ने नई नई सत्ता संभाली थी। किंग सलमान को किंग अब्दुल्लाह का उत्तराधिकारी बनाया गया, जिन्होंने अपने बेटे मोहम्मद को रक्षा मंत्री बना दिया। जिसका लक्ष्य आख़िर में देश की सत्ता सौंपना था। सऊदी अरब की शक्ति और दबदबे को ज़ाहिर करने के लिए यमन पर हमला किया गया। सऊदी अरब के अनाड़ी शासकों का मानना था कि ए महीने से भी कम में हौसी आंदोलन को कुचल दिया जाएगा, जिससे देश में उनकी लोकप्रियता बढ़ जाएगी।

यमन पर हमले का एक अन्य कारण यह है कि सऊद शासन क्षेत्र में ईरान के बढ़ते प्रभाव से चिंतित है। यमन की लगभग 2 करोड़ 60 लाख की आबादी है, जो कुल मिलाकर क़तर, इमारात, बहरैन, कुवैत और ओमान की कुल आबादी के बराबर है। यमन में शिया और सुन्नी मुसलमानों की आबादी है। कुल आबादी का 58 प्रतिशत सुन्नी मुसलमान हैं, जबकि शियों की आबादी क़रीब 42 प्रतिशत है। शियों में क़रीब 32 प्रतिशत ज़ैदी शिया हैं, 5 प्रतिशत बारह इमामी और 5 प्रतिशत इस्माईली शिया हैं। लगभग 1 करोड़ 10 लाख शिया आबादी के कारण, पड़ोसी देश यमन आले सऊद शासन के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है। इसलिए कि इस शासन का मानना है कि अगर यमन में शिया सत्ता में पहुंचते हैं तो सऊदी अरब में सऊद शासन सत्ता कमज़ोर पड़ सकती है और इसी के साथ यमन और इलाक़े में ईरान के प्रभाव में वृद्धि हो सकती है।

मध्यपूर्व के मामलों के विशेषज्ञ स्टेनबर्ग के अनुसार, आले सऊद शासन का मानना है कि अरब देशों में अस्थिरता से लाभ उठाकर, ईरान क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, इसके लिए वह सऊदी अरब का बैकयार्ड समझे जाने वाले यमन की परिस्थितियों से भी लाभ उठाना चाहता है।

वास्तव में यमन पर हमला करके आले सऊद का मूल कारण, इराक़ और सीरिया समेत अन्य क्षेत्रीय देशों में ईरान के मुक़ाबले में सऊदी अरब की लगातार हार है। जिस तरह से सऊदी अरब ने बहरैन पर चढ़ाई करके वहां की जनता को सत्ता में आने से रोक दिया, वह वैसा ही क़दम मध्यपूर्व के सबसे निर्धन देश यमन में भी उठाना चाहता था।

यमन युद्ध ऐसी स्थिति में चौथे साल में प्रवेश कर गया कि सऊदी अरब का कोई भी लक्ष्य पूरा नहीं हुआ । युद्ध इतने जल्दी ख़त्म नहीं हुआ, जैसा कि सऊदी अरब को भ्रम था। यहां तक कि अब इस युद्ध को लेकर सऊदी अरब के भीतर मतभेद स्पष्ट हो गए हैं। यमन का सऊदी अरब ने चारो ओर से घेराव कर रखा है। इसके बावजूद, इस युद्ध के कारण मोहम्मद बिन सलमान एक हीरो के तौर पर उभरने में विफल रहे, बल्कि इसके विपरीत देश के भीतर और बाहर उनकी नीतियों की आलोचना में वृद्धि हो गई है।

इंडिपेंडेंट अख़बार ने बिन सलमान की लंदन यात्रा का विरोध करते हुए लिखा था कि सऊदी अरब दूसरे देशों को पीड़ा और दुख निर्यात कर रहा है और इसके योजनाकार मोहम्मद बिन सलमान हैं। क्षेत्र में ईरान के साथ प्रतिस्पर्धा में भी यमन युद्ध से सऊदी अरब की स्थिति कमज़ोर हुई है। आज इस देश में हौसी आंदोलन इतना शक्तिशाली हो चुका है कि सत्ता में उन्हें नज़र अंदाज़ करना संभव नहीं। वास्तविकता यही है कि यमन युद्ध में जहां सऊदी अरब पूर्ण रूप से हार का सामना कर रहा हैं, वहीं राष्ट्र संघ के अनुसार इस देश में विश्व का सबसे बड़ा मानवीय संकट उत्पन्न हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यमन, सऊदी अरब के लिए एक दलदल बन चुका है, जिससे वह निकल नहीं पा रहा है।

यमन युद्ध- 2
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यमन के विरुद्ध सऊदी अरब के युद्ध में अब तक पचास हज़ार से अधिक यमनी हताहत व घायल हो चुके हैं किन्तु इस युद्ध में इंसानी जानों का नुक़सान लोगों के हताहत और घायल होने तक ही सीमित नहीं है बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में तो इससे अधिक विषम स्थिति देखने को मिल रही है। सऊदी अरब और उसके घटकों के यमन पर थोपे गये युद्ध के परिणामों से अवगत होने के लिए काफ़ी है कि आइये इस बारे में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की ओर से पेश किए गये आंकड़ों पर नज़र डालते हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवता प्रेमी सहायता के समन्वय कार्यालय के आंकड़े के अनुसार जो जनवरी 2018 में जारी हुआ था, लगभग 22.2 मिलियन अर्थात इस देश की 75 प्रतिशत आबादी को जनवरी 2018 तक मानवीय सहायता की आवश्यकता थी जिनमें से 11.3 मिलियन लोगों को बहुत अधिक सहायता की आवश्यकता थी और जून 2017 से इस संख्या में दस लाख लोगों की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि उन क्षेत्रों में अधिक मानवीय सहायताओं की आवश्यकता अधिक है जहां युद्ध जारी है या लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हो चुके हैं। एक करोड़ 70 लाख यमनी अर्थात हर तीन में से दो लोगों को यह नहीं पता है कि वह अगला खाने का कहां से प्रबंध करेंगे। लाखों लोग अशांति के कारण खाद्य पदार्थों की भीषण कमी का सामना कर रहे हैं और भुखमरी का शिकार हैं। यह संख्या जून 2017 में 8.4 थी जो अब बढ़कर 24 प्रतिशत हो गयी है। यमन की दस प्रतिशत जनता इस युद्ध के कारण बेघर हो गयी है। यही कारण है कि यमन संकट के कारण यह देश दुनिया में सबसे बड़ा मानवीय संकट बना हुआ है।

दुनिया के इस निर्धन अरब देश का मुख्य कारण यमन पर सऊदी अरब के हमले हैं। इस हमले के कारण यमन के परिवार के मुखिया अपनी नौकरी से हाथ धो बैठें हैं और जिनके पास नौकरी है उनको वेतन नहीं मिल रहे हैं। यमन के घर तबाह हो चुके हैं और परिवार के लोग विस्थापन का कष्ट सहन कर रहे हैं। कृषि पूरी तरह तबाह हो चुकी है और खाद्य पदार्थ परिवेष्टन के कारण आयत नहीं कर सकते और घर के खाने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

चिकित्सा के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवता प्रेमी सहायता के समन्वयकर्ता की ओर से जारी होने वाले आंकड़ों के अनुसार देश के 16 प्रांतों में केवल 50 प्रतिशत चिकत्सा केन्द्र ही सक्रिय हैं किन्तु इन्हीं संख्या के चिकित्सा केन्द्रों में उपकरण और संसाधन नहीं हैं। यह भी रिपोर्ट है कि चिकित्सा केन्द्रों में सक्रिय लोगों को महीनों से वेतन नहीं मिल सका है। 16.4 मिलियन यमनी जनता को चिकित्सा सुविधाओं की आवश्यकता है जबकि 9.3 मिलियन लोगों को पिछले वर्ष 2017 के अंत तक 19 प्रांतों में 48 लोग डिफ़्थेरिया के कारण मर गये जबकि 610 लोग इस संदिग्ध बीमारी में ग्रस्त हैं। अप्रैल 2017 से यमन में अब तक 2200 लोग हैज़े से मर चुके हैं जबकि दस लाख लोग से अधिक इस बीमारी में ग्रस्त हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार यमन में पांच साल से कम एक तिहाई बच्चे इस जानलेवा बीमार में जान दे चुके हैं जबकि मरने वालों में साठ वर्ष से अधिक आयु वालों की संख्या भी बहुत अधिक है। यदि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं इस जानलेवा बीमारी पर नियंत्रण पाने में सफल नहीं हो पाती तो यमन में सऊदी अरब द्वारा थोपे गये युद्ध रके कारण इस बीमारी से मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है।

जनवरी 2018 में यमन युद्ध के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवीय सहायता समन्वय कार्यालय की ओर से जारी होने आंकड़ों में बताया गया है कि यमन के शिक्षण संस्थान भी सऊदी अरब के हमलों में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट में कहा गया है कि यमन पर सऊदी अरब के हमलों के कारण शिक्षा प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हुई है और लगभग बीस लाख यमनी बच्चे शिक्षा से वंचित हो गये हैं। मार्च 2015 से नवंबर 2017 तक 16 हज़ार स्कूल बंद हो गये जबकि 156 स्कूल पूरी तरह तबाह हो गये जबकि 1413 स्कूलों को थोड़ा बहुत नुक़सान पहुंचा है। इसी प्रकार 150 स्कूलों पर बेघर लोगों ने तथा 23 स्कूलों पर सशस्त्र लोगों ने क़ब्ज़ा कर लिया है। यह स्थिति स्कूलों के अध्यापकों और कर्मियों को वेतन न मिलने के कारण पैदा हुई है जिसकी वजह से यमन की आगामी पीढ़ी अज्ञानता के ख़तरे में पड़ सकती है।

यमन पर सऊदी अरब के हमलों के कारण इस देश में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और यातनाओं में वृद्धि हुई है। एमेनेस्टी इन्टरनेश्नल ने फ़रवरी 2018 में अपनी 409 पृष्ठों पर आधारित होने वाली रिपोर्ट में कहा कि यमन पर सऊदी अरब के युद्ध के दूसरे आयाम भी सामने आ गये हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि यमन में महिलाओं और पुरुषों के बीच असमानता खुलकर सामने आ गयी है जबकि इस देश में बाल विवाह के स्तर में वृद्धि हुई है। इस रिपोर्ट में सचेत करते हुए कहा गया है कि यमन युद्ध के कारण महिलाओं में अशांति बढ़ी है जबकि महिलाओं के विरुद्ध यौन उत्पीड़न में वृद्धि हुई है जबकि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और उनकी ज़बरन शादी के कई मामले भी सामने आए हैं।

यमन के विरुद्ध सऊदी अरब के युद्ध के राजनैतिक और भौगोलिक क्षेत्र सहित कई अन्य परिणाम भी निकले हैं। इस युद्ध के कारण देश कई भागों में विभाजित हो गया है जिसके कुछ हिस्सों पर अंसारुल्लाह और पिपल्ज़ कांग्रूस का नियंत्रण है जबकि त्यागपत्र दे चुके राष्ट्रपति मंसूर हादी के समर्थकों का कुछ क्षेत्रों पर नियंत्रण है जबकि कुछ भाग पर अलक़ायदा का नियंत्रण है। यद्यपि अबयन और हज़रमूत सहित कुछ प्रांतों में हालिया वर्षों में अलक़ायदा अस्तित्व में आया है किन्तु सऊदी अरब के हमलों के कारण इस गुट ने यमन में अपनी पोज़ीशन मज़बूत की है और अपने सदस्यों की संख्या बढ़ाई है। मध्यपूर्व के मामलों के विशेषज्ञ पैट्रिक काकब्रन ब्रिटिश समाचार पत्र इंडीपेंडेट में अपने लेख में लिखते हैं कि सऊदी अरब के नेतृत्व में यमन युद्ध का सबसे बड़ा परिणाम अलक़ायदा नेटवर्क का अस्तित्व है। यदि ओसामा बिन लादेन जीवित होता तो गर्व करता कि उसका नेटवर्क हज़रमूत सहित यमन के बड़े प्रांतों तक फैल रहा है।

सऊदी अरब के यमन पर हमले के कई परिणाम हैं जिनमें निम्न लिखित परिणामों की ओर संकेत किया जा सकता है।

पहलाः सऊदी सरकार के प्रति दुनिया भर के देशों और यमन की जनता के क्रोध में वृद्धि । मार्च 2018 में ब्रिटिश क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की लंदन यात्रा के दौरान होने वाले प्रदर्शनों को इसी परिधि में देखा जा सकता है। लंदन सरकार ने जनता के दबाव में आकर कई बार सऊदी क्राउन प्रिंस की ब्रिटिश यात्रा को रद्द कर दिया था।

दूसराः युद्ध का लंबा खिंचना, आले सऊद शासन की पराजय का कारण बना है क्योंकि यमन युद्ध के समय इस देश के रक्षामंत्री रहे सऊदी क्राउन प्रिंस ने यह युद्ध शुरु करने से पहले ही कहा था कि एक महीने के भीतर ही वह युद्ध जीत लेंगे किन्तु अब इसके परिणाम के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।

तीसराः यमन युद्ध सऊदी अरब के लिए बहुत ख़र्चीला युद्ध सिद्ध हुआ है। इस ख़र्चीले युद्ध के कारण सऊदी अरब आर्थिक समस्या में ग्रस्त हो गया जिसके कारण उसे कर में वृद्धि करनी पड़ी, सब्सिडी काटनी पड़ी, कर्मियों का वेतन काटना पड़ा और सरकारी ख़ज़ाने का प्रयोग करना पड़ा। कुछ टीकाकारों का यह मानना है कि भ्रष्टाचार से संघर्ष के नाम पर नवंबर वर्ष 2017 में सऊदी राजकुमारों की गिरफ़्तारियां, इसी आर्थिक समस्या को निपटाने के लिए सऊदी सरकार की चाल थी।

चौथाः यमन युद्ध के कुछ परिणामों में से एक सऊदी परिवार में बढ़ता मतभेद भी है क्योंकि सऊदी राजकुमार आरंभ से ही एक अरब देश के विरुद्ध युद्ध के विरोधी थे और यमन युद्ध शुरु होते ही शाही परिवार में राजनैतिक मतभेद बढ़ गये और यह मतभेद उस समय और बढ़ गये जब मुहम्मद बिन सलमान को जो सऊदी अरब के अगले नरेश हैं, क्राउन प्रिंस बना दिया गया।

पांचवाः यमन युद्ध के कारण सऊदी अरब की विदेश नीति की बहुत अधिक आलोचना होने लगी और सऊदी अरब के क़तर और लेबनान सहित कई देशों से संबंध ख़राब हो गये क्योंकि सऊदी अरब ने लेबनान के प्रधानमंत्री साद हरीरी के साथ ग़ैर कूटनयिक बर्ताव किया था।

छठाः यमनी सेना और स्वयं सेवी बलों की मीज़ाइल क्षमताओं में वृद्धि के कारण जो रियाज़ में यमामा महल को निशाना बनाने में सफल रही, सऊदी अरब में अशांति बढ़ गयी जिसने सऊदी परिवार की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

आख़िर में यह कहा जा सकता है कि यमन युद्ध जितना अधिक चलेगा इस देश में मानव त्रासदी उतना ही बढ़ेगी और जितना युद्ध बढ़ेगा तथा यमन में मानव त्रासदी बढ़ेगी । यमन युद्ध सऊदी अरब के लिए वियतनाम युद्ध बनता जा रहा है। यमन की जनता ने सऊदी अरब के हमलों का भरपूर जवाब देकर यह सिद्ध कर दिया है कि वह किसी भी स्थिति में सऊदी अरब को यमन में सफल नहीं होने देगी।

यमन युद्ध- 3
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यमन संकट का परिदृष्य स्पष्ट नज़र नहीं आ रहा है। मौजूदा हालात के साथ जंग जारी रहना, आंतरिक स्तर पर मतभेद गहराना, इस देश के टूटने का ख़तरा बढ़ना और राजनैतिक गतिरोध का जारी रहना, यमन संकट के चार परिदृष्य कहे जा सकते हैं।

वास्तव में इस बात के कोई चिन्ह नज़र नहीं आते कि यमन के ख़िलाफ़ जंग को ख़त्म करने की दिशा में बढ़ रहा हो। सऊदी अरब न सिर्फ़ यह कि जिसे उसने यमन को वैधता को लौटाने का नाम दिया था उसमें सफल नहीं हुआ बल्कि उसके सबसे बड़े घटक अली अब्दुल्लाह सालेह भी पिछले साल दिसंबर में मारे गए और आज अंसारुल्लाह यमन में एक ऐसी सच्चाई बन चुका है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। सऊदी अरब यह उम्मीद लगाए बैठा है कि वह यमन के ख़िलाफ़ जंग को जारी रखेगा तो यमन में जनता में असंतोष बढ़ेगा कि जिसके नतीजे में अंसारुल्लाह के ख़िलाफ़ आंतरिक स्तर पर विद्रोह फूटेगा। सऊदी अरब जो पश्चिम एशिया की एक शक्ति है, पश्चिम एशिया के सबसे निर्धन देश के ख़िलाफ़ जंग में हार को क़ुबूल करने को तैयार नहीं है। इसलिए वह इस जंग को इसके मानवीय दृष्टि से भयावह अंजाम के साथ जारी रखेगा

यमन जंग का तीसरा साल ऐसी हालत में ख़त्म हुआ था जब कि मतभेद व फूट यमन संकट का हिस्सा बन चुका है। अंसारुल्लाह और पीपल्ज़ कांग्रेस पार्टी के यमन की इस्तीफ़ा दे चुकी सरकार के साथ मतभेद के अलावा, इस्तीफ़ा दे चुकी सरकार के साथ यमन के दूसरे गुटों व धड़ों के मतभेद भी उसी तरह बढ़ गए हैं जिस तरह यमन जंग में सऊदी अरब और यूएई के बीच मतभेद बढ़े ।

ये मतभेद यमन के ख़िलाफ़ जंग के सिर्फ़ एक साल बाद ही स्पष्ट हो गए। यमन के इस्तीफ़ा दे चुके राष्ट्रपति मंसूर हादी ने 3 अप्रैल 2016 को अपने मंत्रीमंडल के सदस्य ख़ालिद बहा को प्रधान मंत्री के पद से हटाकर उनकी जगह अहमद उबैद बिन दग़र को प्रधान मंत्री बनाया। इसके साथ ही मंसूर हादी ने जनरल अली मोहसिन अलअहमर को उपराष्ट्रपति नियुक्त किया। इस बदलाव पर यूएई नाराज़ हुआ क्योंकि ख़ालिद बहा को यूएई के निकट समझा जाता था जबकि बिन दग़र और अली मोहसिन अलअहमर सऊदी अरब के निकट समझे जाते हैं। वास्तव में इन बदलाव और ख़ास तौर पर जनरल अली मोहसिन अलअहमर के मंसूर हादी के सहायक बनने से जो उन्हीं की तरह रियाज़ आते जाते रहते हैं, यमन की इस्तीफ़ा दे चुकी सरकार पर सऊदी अरब का वर्चस्व बढ़ा और इसके मुक़ाबले में यूएई सरकार का प्रभाव कम हो गया। इसी लिए यूएई ने पिछले साल ऐसा क़दम उठाया जिससे मंसूर हादी का धड़ा कमज़ोर हुआ जैसा कि यूएई का दक्षिणी शहर अदन में उठाया गया क़दम। यूएई ने मई 2017 में दक्षिणी यमन की अंतरिम परिषद का अध्यक्ष ईदरूस ज़ुबैदी को बनाया जिन्हें मंसूर हादी अदन के महापौर के पद से हटा चुके थे। पिछले साल अदन शहर में दक्षिणी यमन की अंतरिम परिषद और मंसूर हादी की समर्थक फ़ोर्सेज़ के बीच झड़पें होती रहीं और इसने जनवरी 2018 के अंत में भयावह रूप अख़्तियार किया कि जिसके नतीजे में यूएई की समर्थक फ़ोर्सेज़ ने अदन जैसे अहम शहर का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। ये झड़पें सऊदी अरब और यूएई के बीच बढ़ते मतभेद को दर्शाती हैं।

यूएई को यह लगने लगा है कि यमन के ख़िलाफ़ जंग में सऊदी अरब का साथ देने से कोई नतीजा नही निकलेगा । यूएई का मुख्य लक्ष्य दक्षिणी यमन की अहम बंदरगाहों का नियंत्रण हासिल करना था ।

यमन के रणनैतिक मामलों के टीकाकार अली अज़्ज़हब का इस बारे में कहना है कि यूएई के नेता अदन बंदरगाह से हिन्द महासागर तक पहुंच को दुबई बंदरगाह का प्राकृतिक विस्तार मानते हैं। इसके अलावा दक्षिणी यमन सुरक्षा व व्यापार की दृष्टि से भी अहमियत रखता है क्योंकि वहां उत्तरी यमन की तरह झड़पें नहीं हो रही हैं। यूएई दक्षिणी यमन की बंदरगाहों पर वर्चस्व के ज़रिए ओमान का घेराव, उसकी व्यापारिक बंदरगाहों को कमज़ोर और उसकी राजनैतिक अहमियत को कम कर सकता है। दूसरे शब्दों में यूएई दक्षिणी यमन की बंदरगाहों पर क़ब्ज़ा करके क्षेत्र में आर्थिक मैदान में अपने प्रभाव को मज़बूत बनाएगा।

यमन में राष्ट्रीय एकता को प्रदर्शित करने वाली सरकार नहीं है। यद्यपि अरब-पश्चिम ध्रुव मंसूर हादी की अध्यक्षता में इस्तीफ़ा दे चुकी सरकार को यमन की वैध सरकार दर्शाने की कोशिश कर रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि यमन भौगोलिक नज़र से कई टुकड़ों में बटा हुआ है। एक भाग पर अंसारुल्लाह और पीपल्ज़ कांग्रेस पार्टी का नियंत्रण, एक भाग पर इस्तीफ़ा दे चुकी मंसूर हादी की सरकार का नियंत्रण, एक भाग पर अलक़ाएदा का क़ब्ज़ा और एक भाग पर यमनी क़बीलों का नियंत्रण है। यमन पर इस बात का ख़तरा मंडरा रहा है कि कहीं वह 90 से पहले की हालत अर्थात उत्तरी और दक्षिणी भाग में फिर से न बट जाए। हालांकि यमन के उत्तरी और दक्षिणी दो टुकड़ों में बंटने से सऊदी अरब के हित पूरे नहीं होंगे लेकिन यूएई यमन के विभाजन में अपना हित देख रहा है। यमन के बटने की स्थिति में उत्तरी यमन पर अंसारुल्लाह का नियंत्रण होगा कि जिसकी सीमा सऊदी अरब से मिलती है जबकि यमन पर जंग थोपने के पीछे सऊदी अरब का लक्ष्य अंसारुल्लाह को सत्ता में पहुंचने से रोकना है।

इसके अलावा यमन के हज़रमूत प्रांत में अलक़ाएदा का प्रभाव बढ़ गया है। हज़रमून प्रांत अलक़ाएदा का गढ़ समझा जाता है और इस प्रांत में अपेक्षाकृत स्थिरता है। दक्षिणी और उत्तरी यमन में मतभेद बढ़ने और अदन की जरजर सुरक्षा स्थिति के जारी रहने से यमनी जनता और यमनी गुटों तथा अलक़ाएदा अदन और सनआ के वर्चस्व से निकलने के लिए कोशिश शुरु कर देंगे। इस संदर्भ में यमन के राजनैतिक कार्यकर्ता ऐमन बाहमीद का कहना है कि हज़रमूत की जनता ने इंटरनेट पर “हज़रमूत अपने भविष्य का निर्धारण ख़ुद करना चाहता है” शीर्षक के तहत एक हैशटैग शुरु किया है जिसमें वह बल देती है कि हज़रमूत दक्षिणी और उत्तरी यमन योजना का हिस्सा नहीं है। यमन के एक और राजनैतिक कार्यकर्ता जमआन बिन सअद का भी मानना है कि हज़रमूत के लोग अदन-सनआ के बीच झड़प से चिंतित हैं इसकी एक वजह हज़रमूत में मौजूद स्थिरता है, इसलिए वे सनआ और अदन के प्रभाव से हटकर अपने भविष्य का निर्धारण करना चाहते हैं।

अमरीका पश्चिम एशिया को भौगोलिक दृष्टि से छोटे छोटे देशों में बांटना चाहता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि यमन के ख़िलाफ़ सऊदी अरब की जंग जारी रहने की स्थिति में यमन दो या तीन देशों में बंट सकता है।

हालांकि यमन के मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष दूत इस्माईल वुल्द अश्शैख़ अहमद ने इस देश के संकट का राजनैतिक हल निकालने की कोशिश की और इसके तहत उन्होंने जनेवा और कुवैत में वार्ता की लेकिन उन्होंने फ़रवरी 2018 में ऐसी हालत में यमन के मामले की बागडोर मार्टिन ग्रीफ़िथ के हवाले की है कि अगस्त 2016 से पिछले महीने अर्थात 18 महीने तक यमनी गुटों के बीच कोई बातचीत नहीं हुयी और यह संकट राजनैतिक दृष्टि से बंद गली में पहुंच गया है, हालांकि इस संकट का राजनैतिक हल बहुत ज़रूरी है क्योंकि इस समय यमन में हालिया दशकों का सबसे बड़ा मानव संकट खड़ा है। लेकिन ऐसा लगता है कि कम से कम अगस्त 2018 से पहले किसी भी तरह की राजनैतिक वार्ता आयोजित नहीं होगी।

राजनैतिक वार्ता शुरु होने की एक शर्त यह है कि यह वार्ता संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अप्रैल 2015 में पारित हुए प्रस्ताव नंबर 2216 के आधार पर न हो क्योंकि इस प्रस्ताव में अंसारुल्लाह को कोई स्थान नहीं दिया गया है जबकि ज़मीनी सच्चाई यह है कि अंसारुल्लाह यमन का सबसे सुव्यवस्थित राजनैतिक गुट है। दूसरी शर्त यह है कि अंसारुल्लाह के विरोधी यह चाहते हैं कि वार्ता में फ़ैसला करने के लिए उनके पास ज़रूरी आज़ादी हो और यह फ़ैसला रियाज़ के इशारे पर न हो। एक अन्य शर्त यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ और यमन के मामले में उसके नए प्रतिनिधि मार्टिन ग्रीफ़िथ यमन संकट में पश्चिमी देशों के प्रतिनिधि बन कर नहीं बल्कि एक आज़ाद व्यक्ति के रूप में अपना रोल निभाएं क्योंकि यमन के मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व प्रतिनिधि इस्माईल वुल्द अश्शैख़ अहमद स्वाधीन रूप से रोल निभाने में नाकाम रहे।

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