सिर्फ़ ज़बानीं भाषणबाज़ी के भरोसे रहे तो मुस्लिम समाज को भारी नुक्सान उठाने पड़ेंगे

 

बहुत बार आप को अपनी हैसियत/ताक़त से ज़यादा दम लगाना पड़ता है, मुझे चूँकि बचपन से कुश्ती लड़ने, घुड़सवारी करने, कबड्डी खेलने,,,आदि का मौक़ा मिला है तो कह सकता हूँ कि हम पांच मिनेट की ‘कुश्ती/फाइट’ के लिए घंटों मेहनत करते थे, 6 – 7 km की दौड़ लगाते, तब जा कर ‘सिर्फ़’ पांच, दस मिनट लड़ने लायक़ हो पाते थे, बैठ कर देखने में हर चीज़/काम बहुत आसान सा लगता है, मैदान में जो खेलते हैं, वो जानते हैं कि कब कैसे खेलना है, दर्शक होना मज़े की बात है, खिलाडी होने के लिए मेहनत करना पड़ती है

मुसलमानों को क्या कभी ये अहसास होता है कि जितना मेहनत उन्हें राजनीती आदि के हल्क़ों में करना चाहिए थी की है, हम जिन लोगों को अपना लीडर/क़ायद मानते रहे हैं क्या उनके ग़लत फ़ैसलों पर हम खुद बोले हैं, कभी उन पार्टियों में जिनमे हमारे नेता ‘ठेकेदार’ बन कर बैठे होते हैं उनसे उनकी नाकामियों की बात की है

 

इब्ने मरियम हुआ करे कोई
मेरे दर्द की दवा करे कोई

जब बाबरी मस्जिद को शहीद कर दिया गया था, उस वक़्त भी कांग्रेस व् अन्य पार्टियों में मौजूद मुसलमानों में से किसी, प्रधान, सभासद, विधायक, सांसद, मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया था, 26 जनवरी, 1993 को अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोग्राम में शामिल होने के लिए उस वक़्त के केंद्रीय मंत्री ‘सलमान खुर्शीद’ अमुवि में आये थे, कैंनेडी हाल में उनकी तक़रीर होना थी,,,मजबूरन और तैश में उनको धक्के मार कर बाहर किया था

जून या जुलाई 1995 में कांग्रेस के सदर सीताराम केसरी अमुवि में किसी प्रोग्राम में शामिल होने आये थे, आये तो थे पर लुंगी लपेट कर भागना पड़ा था
2004 के लोकसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में एक ‘आवामी फ्रंट’ बना था, तब मौलाना अरशद मदनी से लोगों ने उसमे शामिल होने की बड़ी खुशामदें कीं थीं, मदनी ने ये कह कर कि मै एक मज़हबी रहनुमा हूँ राजनीती से मेरा वास्ता नहीं है खुद को अलग कर लिया था, बाद में वो अजित सिंह की लोकदल से राजयसभा सदस्य बन गए थे

2006 में उत्तर प्रदेश में असम की तर्ज़ पर एक बड़ा फ्रंट बनाने की कोशिशें हो रही थीं, दिल्ली में मौलाना अहमद बुखारी की मौजूदगी में कई मीटिंग हुईं, कोई फ़ैसला हो पाता उससे पहले ही आल इंडिया मुस्लिम फ़ोरम के सदर निहालुद्दीन ने अप्रैल महिने में UP-PDF के बनजाने का एलान कर दिया, उसके अध्यक्ष बनाए गए मौलाना कल्बे जव्वाद,

दिल्ली में मीटिंग अभी भी जारी रही और फिर 5 जुलाई 2006 को लखनऊ के एक हाल में ”नाम अब याद नहीं’ बड़ा कार्यक्रम हुआ, जिसमे मौलाना अहमद बुखारी, उनके भाई तारिक़ बुख़ारी, पूर्व केंद्रीय मंत्री सी.एम.इब्राहिम, खान आतिफ ख़ान, नईमुल्लाह अंसारी, डॉ अरशद, अहमद सलीम ख़ान पीरज़ादा, युसूफ कुरैशी जैसे और कई नेता मंच पर नज़र आये, यहाँ उस दिन UDF (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) का गठन हुआ, सी.एम.इब्राहिम राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, युसूफ कुरैशी को उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष बनाया गया, पीरज़ादा राष्ट्रीय महासचिव, व् अन्य को भी ज़िम्मेदारियाँ दे दी गयीं, प्रोग्राम के ख़त्म होने के बाद अहमद बुखारी ने मीडिया से बात की, शानदार बयान दिए,,,6 जुलाई की सुबह हम लोग वापस अलीगढ आ गए,,,7 को गिरफ़्तारी हो गयी और 10 जुलाई को जेल पहुंचना हो गया,,,एक दिन जेल में ख़बर पढ़ी कि UDF बिखर गया, बिना किसी को बताये युसूफ कुरैशी ने उसको अपने नाम से एक पार्टी के तौर पर रजिस्ट्रड करवा लिया था, जब ये जानकारी बाक़ी लोगों को हुई तो ‘डॉग्स फाइट at स्ट्रीट’ शुरू हो गयी,,,युसूफ कुरैशी ने अपने कुछ कैंडिडेट खड़े किये, पीरज़ादा वी.पी.सिंह के जन मोर्चा में शामिल हो गए, बाकियों ने अभी अपनी अपनी राह पकड़ी,,,चुनावों के नतीजे 2007 अप्रैल/मई में जब आये तो सभी हार गए सिर्फ एक सीट याक़ूब कुरैशी ने UDF के कैंडिडेट की हैसियत से जीती,,,बाद में युसूफ कुरैशी घर बैठ गए और UDF का विलय बसपा में कर दिया गया,,,32 महिनों के बाद 27 फ़रवरी 2009 को मेरा जेल से रिहा होना hua, जिस पार्टी के लिए उस वक़्त ”मैंने’ अपनी पूरी जान लगा दी थी, उस पार्टी के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष/व् अन्य नेता एक दो जोकि मेरे निजी साथी/दोस्त थे के आलावा अलीगढ में ही रहने के बावजूद कभी कोई एक बार भी मिलने नहीं आया,,,,

2017 में मैंने अलीगढ की कोल विधान सभा सीट से AIMIM के टिकट पर चुनाव लड़ा, नॉमिनेशन से एक दिन पहले तक मै ‘rest position’ में रहा, वजह कि मुझे उम्मीदवार बना देने के बाद भी पार्टी के कई नेता ”हिल्ला” तलाश रहे थे, कोई मिल जाये ‘जिससे कुछ मिल जाये’ वाला मामला था, एक शाम को हम लोग पार्टी के जिला अध्यक्ष के घर पर बैठे थे, अध्यक्ष मेरे बराबर में ही बैठे हुए थे, उनके मोबाइल पर कई कॉल आये, उन्होंने रिसीव नहीं किये, बाद में रिसीव किया तो ‘उधर’ से कोई साहब ‘उनका नाम’ नहीं लुंगा, कह रहे थे कि ‘आप कैसे भी कर के इनका टिकट कटवा दो, मै पार्टी फण्ड में भी देने को तैयार हूँ, आप ने ऐसे आदमी को टिकट दिया है,,,जो ‘रात भर जागता है और दिन भर ”पी” कर सोता है’,,,मेरी हंसी छूट गयी,,,सारी बात मुझे मैच कमेंट्री की तरह सुनाई दे रही थी,,,कॉल कट के बाद अध्यक्ष भी हंसने लगे,,,’बोले परवेज़ भाई’,,,लोग अभी तक पीछे पड़े हैं, मगर कुछ भी हो चुनाव तो आप ही लड़ोगे
24 फ़रवरी 2017 को नॉमिनेशन दाखिल हुआ, 25 को असदुद्दीन ओवैसी की अलीगढ में क़ामयाब मेटिंग हुई,,,प्रचार का काम होने लगा,,,शेर आया शेर आया का नारा जब पहली बार गूंजा तो मै खुद को ‘कम्फर्टेबल’ नहीं कर पा रहा था, उसमे जोश था यकीनन मगर ‘मुझे न पसन्द’ था,,,

 

चुनाव के वक़्त सर्दियाँ थीं, और मै कभी भी उजलत/जल्दबाज़ी में नहीं रहता हूँ, आराम से एक, दो बजे दिन के प्रचार के लिए निकलते और देर रात तक मिलना मिलाना होता रहता,,,पार्टी के जो कम उम्र साथी थे उन्होंने बहुत काम किया, जी जान से पूरे चुनाव में मेहनत की, जो नेता और बड़े नेता थे उनका हाल बयान करना भी बेकार है, कुछ नेता जो बुद्धिजीवी प्रजाति के थे वो प्रचार/प्रोग्राम/मीटिंगों में हमारे साथ होते और लेट नाईट में ‘दूसरे’ उम्मीदवार के यहाँ जा कर ‘क़ोरमा’ खींचते,,,कई बार ‘गुप्तचरों’ ने उनके फ़ोटो ‘व्हाट्सअप’ पर मेरे पास भेजे,,,मज़े की बात अब सुनिये
चुनाव से पहले ही दो/तीन ‘कलाकारों’ ने अपनी कला दिखाई और सारा खेल बिगाड़ दिया, मुझे पूरा भरोसा था उन लोगों पर, उनकी बातें, उनकी क़ौम के लिए तकलीफ सुन कर मेरा कलेजा भी तड़प उठता था,,,मीटिंगों में अल्लाह, रसूल, हदीस ऐसा लगता जैसे ‘मीलाद’ पढ़ा जा रहा हो, आला दर्ज़े के नेक/शरीफ लोगों ने ‘मुझे’ ‘बेच’ दिया,,,

चूँकि मै ये भरोसा किये हुए था कि सब कुछ ‘सही’ चल रहा है, उनके फ़रेब को न पहंचान सका, मुझे उम्मीद थी कि आख़िर के तीन, चार दिन में ‘मै’ चुनाव का रुख बदल लुंगा, लेकिन उन ‘तीन नेक’ सिफ़त लोगों ने सब ख़राब कर दिया,,,नतीजा ये हुआ कि कुल 400 – 500 के क़रीब वोट मिले, जबकि इस सीट को AIMIM कम से कम 50 हज़ार वोटों से जीतती,,,

मै स्पोर्ट्समैन हूँ इसलिये ‘वो’ टेम्परामेंट जो खिलाडी में होना चाहिए रखता हूँ, मुस्लिम लीडरशिप और मुस्लिम वर्कर्स ”untraind” लोगों की भीड़ है, छः साल तक NCC का कैडिट रहा हूँ, वहां ‘यूनिटी एंड डिसिपिलीन’ ‘ सीखा, जब इस्लाम को पढ़ा तो पाया कि दीने इस्लाम का दारोमदार ही ‘यूनिटी एंड डिसिपिलीन’ पर है,

क़लमा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज ये मुस्लमान की ड्यूटीज हैं जिनको हर हाल में ‘पूरा’ करना है, जैसे कोई सरकारी मुलाज़िम अपनी ड्यूटी अंजाम देता है, दीने इस्लाम मस्जिद के बाहर समाज की जिंदिगी है, जहाँ हमें अपने काम से ज़ाहिर करना होता है, अपनी ज़बान से साबित करना होता है कि हां हम दीन पर क़ायम हैं/दीनदार हैं, जो कारोबार हम करते हैं उसमे सच्चाई होना चाहिए, जब हम नाप तोल करें तो सही होना चाहिए, कम न हो, ये दीन है, जब हम कोई बात कहीं तो सच हैं, ये दीन है, कोई वादा करें तो पूरा करें, ये दीन है,,,मुसलामनों ने तहक़ीक़ करना छोड़ रखा है

हम मज़हब और दीन को नहीं समझते हैं, हम मस्जिद में पांच वक़्त जा कर इमाम के पीछे खड़े होकर नमाज़ पढ़ने को दीन समझते हैं, हम इतिहाद से वाकिफ नहीं हैं, एक भीड़ का समूह रह गए हैं

याद रहे नमाज़ का असल सन्देश ‘यूनिटी एंड डिसिपिलीन’ है, मस्जिदें सजदों के लिए नहीं हैं वो ‘शिक्षा/राजनीती/समाजशात्र/विज्ञानं’ को जानने/समझने/सीखने का केंद्र हैं, अल्लाह को अगर सिर्फ नमाज़ ही पढ़वाना होती तो, कोई भी कहीं भी पढ़े, जमायत से नमाज़ का आदेश नहीं होता, मस्जिदों को बनाने की ज़रूरत नहीं होती,


जब कोई मुसलमान इमाम के पीछे खड़ा होता है तब वो अपनी मनमानी कर के दिखा दे, इमाम रुकू में जाए तो खुद सजदे में जा कर दिखा दे, ऐसा नहीं कर सकता है कोई भी, यही है ‘यूनिटी एंड डिसिपिलीन’, जो आदेश इमाम/लीडर का होगा उसका पालन करना होगा, नमाज़ियों की सफों को देख कर हज़रत उमर ने सेना को ‘सफों/लाईनों’ में खड़ा करना शुरू किया, जैसे मस्जिद का इमाम आगे खड़ा हो कर कमांड देता है, वैसे ही सेना में सेना का नायक आदेश देता है,,,
मुस्लिम राजनीती और मुस्लिम राजनेता राजनीती के असल उदेश या तो जानते/समझते नहीं हैं या वो उनको अमल में लापाने की सलाहियत नहीं रखते हैं,,,AIMIM के 36 कैंडिडेट उत्तर प्रदेश में 2017 में चनाव लड़े थे, चनावों के बाद कभी एक बार भी पार्टी के सदर असद ओवैसी ने उनको बुला कर नहीं पूंछा कि हार की क्या वजह थीं, प्रदेश की इकाई के लोग सदर से भी बड़े लीडर हैं,,,

किसी की तनक़ीद करना मेरा कोई मक़सद नहीं है, लेकिन इस वक़्त जो देश के राजनैतिक हालात बने हुए हैं उसमे आप बे तरतीब भीड़ को भाषण देकर ‘गर्म’ कर के उनका नुक्सान करेंगे, कौम तो लीडर के इन्तिज़ार में कब से बैठी है, उसे कभी किसी ने धोखा दिया कभी किसी ने, बार बार धोखे पर धोखा खाते-खाते यहाँ पहुँच गए हैं कि 20 साल से कम उम्र के बड़ी संख्या में बच्चे नशा करने लगे हैं, टाइगर गुल्ला, मुनक्का, शिव बूटी, हितकारी, ativan, कम्पोज़, natrabat, कोरेक्स, स्लोचन, हथु, भांग, चरस, स्मैक, गांजा,,,ये सारे नशे के सामान आप को मुस्लिम आबादियों में जहाँ चाहिएं मिल जायेंगे,,,

लीडरशिप सिर्फ ज़ोरदार भाषण देना नहीं होता, लोगों के ज़ज़्बात को उभार कर उनको कब तक कोई संभाल सकता है, गाड़ी से उतरे, मंच पर पहुंचे और तक़रीर शुरू,,,ये लीडरशिप है,,,आप अपने लोगों से मिलेंगे नहीं, उनकी तरबियत नहीं करेंगे, उनको कैसे काम करना चाहिए बताएँगे नहीं, उनकी क्या ग़लतियाँ हैं आप जानते नहीं,,,सिर्फ भाषण,,,ये काम तो कितने ही मौलाना भी करते हैं, मीलाद में देखें, नीचे से ऊपर तक का ज़ोर लगा देते हैं, बिना माईक के ही उनकी आवाज़ कोसों तक जाती है,,,

इस वक़्त देश में लोगों में गुस्सा देखने को मिल रहा है, उस कई वजह हैं, दो अहम् वजहें ख़ास हैं
– एक तो संघ परिवार ने लोगों के अंदर नफ़रत पैदा की है
– दूसरे लोगों के पास काम नहीं है, लोग खाली हाथ बैठे हैं, डिग्रियां हैं मगर नौकरी नहीं है, सुबह को जागते हैं, माँ -बाप ताने देने लगते हैं, लड़का उलटे सीधे कपडे पहने और बाहर फालतू के लोगों के साथ टाइम पास करता है, वो वहां ख़राब हो जाता है, उसका भविष्य ख़त्म हो जाता है, वो पुरानी फिल्म के किसी हीरो की तरह रातों रात अमीर बनने की तरकीबें अपनाने लगते हैं और मुजरिम तक बन जाते हैं

लोगों को बहुत ईमानदारी और संजीदगी के साथ सोचना होगा, सिर्फ़ ज़बानीं भाषणबाज़ी के भरोसे रहे तो मुस्लिम समाज को भारी नुक्सान उठाने पड़ेंगे, 30 करोड़ से ज़यादा आबादी मुसलमानों की भारत में है, उनका कोई ‘एक’ भी लीडर नहीं है, जो कुछ हैं भी तो सिर्फ और सिर्फ हो हल्ला, करनवाने के लिए,,,
इस मुश्किल वक़्त में मै समझता हूँ कि एक नए राजनैतिक दल का गठन किया जाये,,,,

– परवेज़ ख़ान

 

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