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अमेरिका और इस्राईल ने अरब देशों को युद्ध और आतंकवाद की आग में झोंक दिया है : : रिपोर्ट

फ़िलिस्तीन की तबाही का तमाशा देखने वाले अरब देशों की ओर बढ़ते इस्राईली क़दम, बैतुल मुक़द्दस के बाद पवित्र मक्के की ओर गंदी नीयत से देख रहे हैं ज़ायोनी!

इस्राईल, मध्यपूर्व में एक ऐसा अवैध शासन, जिसने न केवल इस पूरे इलाक़े को युद्ध और आतंकवाद की आग में झोंक दिया है बल्कि इस अवैध शासन के कारण पूरी दुनिया अशांति व स्थिरता के मुहाने पर आ खड़ी हुई है।

वैसे दुनिया इस बात की गवाह है कि मध्यपूर्व के ज़्यादातर अरब देशों के शासक इस समय अमेरिका और ज़ायोनी शासन के पिट्ठू के रूप में काम कर रहे हैं। न जाने वे क्यों इतना आश्वासत हैं कि जिस ज़मीन के टुकड़े पर वह शासन कर रहे हैं उसी को उनके पैर के नीचे से अमेरिका की मदद से ज़ायोनी शासन हड़पने की साज़िश रच रहा है और वह अपनी तबाही से बेख़बर अपने दुश्मनों के साथ नाच-गाने में व्यस्त हैं। इसका ताज़ा उदाहरण है इस्राईल के प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू के उस बयान का जिसमें उन्होंने कहा है कि अगर वह 17 सितंबर चुनाव में जीतकर फिर से ज़ायोनी शासन के प्रधानमंत्री बनते हैं तो इस बार वह जॉर्डन वैली को इस्राईल का हिस्सा बना लेंगे।

एक टीवी कार्यक्रम में बोलते हुए ज़ायोनी प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं इस्राईल की जनता से वादा करता हूं कि अगर मैं अगामी चुनाव में दोबारा जीतकर आया तो जॉर्डन वैली भी इस्राईल का भाग होगी। नेतनयाहू ने कहा कि मैं इस काम को अकेला नहीं करूंगा बल्कि मेरे इस काम में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प पूरा साथ देंगे। दूसरी ओर फ़िलिस्तीनियों ने नेतनयाहू के इस बयान पर त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि नेतनयाहू शांति के लिए किए जा रहे सभी प्रयासों को नुक़सान पहुंचा रहे हैं जबकि उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी उन पर चुनाव से एक सप्ताह पहले दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी वोट प्राप्त करने के लिए गंदी राजनीति का आरोप लगा रहे हैं।

अरब मामलों के टीकाकारों और विशेषज्ञों का कहना है कि ज़ायोनी शासन के प्रधानमंत्री नेतनयाहू चुनावी रैलियों मे जिस तरह के बयान दे रहे हैं वह केवल बयान नहीं हैं बल्कि एक सच्चाई और वह योजना है जिसको इस्राईली पूरे मध्यपूर्व में लागू करना चाहते हैं। यहूदियों का यह दावा है कि सऊदी अरब के पवित्र शहर मदीने के पास स्थित “ख़ैबर दुर्ग”नामक स्थान उनका अपना पैतृक स्थान और उनकी अपनी मिल्कियत है जिसे वह किसी भी स्थिति में प्राप्त करके ही रहेंगे। अरब इतिहास के अनुसार, यह वह स्थान है जहां मुसलमानों और यहूदियों के बीच ख़ैबर नामक ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। यह इलाक़ा पवित्र मदीने से 150 से 170 किलीमीटर की दूरी पर स्थित है जो लगभग 1400 साल पहले यहूदियों का गढ़ हुआ करता था।

सऊदी अरब में स्थित ख़ैबर दुर्ग
वैसे यह कड़वी सच्चाई है कि आज अरब देशों का जो हाल है उसके लिए वहां के शासक और राजनेता जहां सबसे अधिक ज़िम्मेदार हैं तो वहीं वहां की जनता भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार रही है। हलांकि मुख्य ज़िम्मेदार तो इन देशों के शासक और राजनेता ही हैं। स्वयं अगर फ़िलिस्तीन पर नज़र डाली जाए तो वहां फ़िलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास एक ओर तो बड़ी-बड़ी बातें करते हुए दिखाई देते हैं तो दूसरी ओर जार्डन नदी के पश्चिमी तट में फ़िलिस्तीनी युवाओं को गिरफ़्तार कराने में इस्राईली सेना की मदद करते हुए उन्हीं का प्रशासन दिखाई देता है। सच यही है कि अगर सभी अरब देशों के शासक और राजनेता, इस्लामी गणतंत्र ईरान और इस्लामी प्रतिरोध आंदोलनों की तरह अवैध ज़ायोनी शासन और उसके आक़ा अमेरिका के मुक़ाबले में डट जाएं तो मुझे विश्वास है कि मध्यपूर्व के इलाक़े में न केवल यह की शांति व स्थिरता लौट आएगी बल्कि यह दुनिया के सबसे अधिक विकसित क्षेत्र में परिवर्तित हो जाएगा।

(रविश ज़ैदी)

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