इतिहास

उस शानदार फ़तह़ ने “अतातुर्क” को तुर्की का हीरो बना दिया!

पहली जंग-ए-अज़ीम के दौरान गेलीपोली युद्ध मे ख़िलाफत उस्मानिया की फौजों ने इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की संयुक्त फौज को इब्रतनाक शिकस्त दी थी, ख़िलाफत की तरफ से उस जंग की क़यादत बदनाम-ए-ज़माना सेकुलर-ओ-मुर्तद “मुस्तफा कमाल पाशा” अतातुर्क कर रहा था…ख़िलाफत की उस शानदार फ़तह़ ने “अतातुर्क” को तुर्की का हीरो बना दिया,

मैने एक ग़ैरमारूफ(नाम याद नहीं) लेखक की किताब पढ़ी थी जिसने कमाल पाशा की शान मे वह किताब लिखी थी…..वह लिखता है कि उस वक़्त तुर्की के क़हवाखानों और अवामी मक़ामात पर कमाल पाशा की तारीफ ख़लीफा से भी ज़्यादा की जाती थी जिसका श्रेय बिला-शक् “दोनमा तह़रीक” के संगठित कार्यकर्ताओं को जाना चाहिए जिसने अतातुर्क को तुर्की के गली गली में Introduce करवा दिया था…

आगे चलकर यही अतातुर्क ख़िलाफत के लिए काल साबित हुआ जिसने ख़िलाफत की बिसात लपेटकर दुनियाभर के मुसलमानों को यतीम बना दिया जिसका सिलसिला आज भी जारी है…

मल्का-ए-विक्टोरिया की इब्रतनाक शिकस्त और दोनमा की मेहनत के कारण अतातुर्क हीरो बन जाता है… एक ऐसा हीरो जिसे दुश्मन ने इब्रतनाक शिकस्त झेलकर प्रोजेक्ट किया , दरअसल वह तुर्क अवाम और और उम्मत-ए-मोह़म्मदिया का हीरो नहीं…. सलीब + यहूद गठजोड़ का हीरो था…आज भी ऐसे बहुत सारे हीरो हैं जिन्हें मस्लक-ओ-मज़हब से ऊपर उठकर पहचानने की ज़रूरत है…

कहने का मतलब यह है कि तुम्हारे दुश्मन की साज़िशें इतनी ख़तरनाक हैं कि वह अपने हज़ारों बंदे मरवाकर और माथे पर एतिहासिक इब्रतनाक शिकस्त के दाग़ लेकर भी तुम्हारी ख़िलाफत की बिसात लपेटने मे तनिक भी नहीं संकोच करता , क्योंकि उसने अपनी तारीख़ पढ़ी है , उसे ख़िलाफत का मतलब मालूम है… और ये मनह़ूस बग़दादी भी उसी सिलसिले की एक कड़ी था ताकि मौजूदा नस्ल मे ख़िलाफत के नाम से इतनी नफ़रत पैदा कर दी जाए कि नाम सुनते ही उसे ख़िलाफत से घिन होने लगे , जिसमें काफी ह़द तक वह कामयाब भी रहा.!

अबु फ़ारिस अंसारी

#खिलाफते_उस्मानिया

आपने पढ़ा कि कैसे उसमानी सल्तनत वजूद में आयी और बढते हुए आलमे इस्लाम की खिलाफत बन गई…फिर किस तरह पहली आलमी जंग के बाद खिलाफते उसमानिया.. अजीम आटोमन एम्पायर के हिस्से बखरे किये गये… आपने पढ़ा कि किस तरह फ्री मेसन्स ने साज़िशें करके खिलाफत को कमज़ोर किया और Part-5 में आपने देखा कि किस तरह इन्हीं तमाम हालात के दरम्यान.. अतातुर्क कमाल पाशा मंज़रे आम पर उभर कर आते हैं
अब आखिरी क़िश्त में आपको बता रहे हैं कि राष्ट्रपति बनने के बाद अतातुर्क कमाल पाशा ने तुर्की सल्तनत में क्या क्या बदलाव किये…!!
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खिलाफते उसमानियां का खातमा धीरे धीरे स्टेप बाइ स्टेप किया गया
इसमें सैंकड़ो साल तक मग़लूब रहने वाली यूरोपियन अकवाम के दिलों में मुसलमानों की शदीद नफ़रत और यहूदी ज़ायोनिज़्म तहरीक के अहम टूल फ्री मेसन्स का खास किरदार रहा
आप पढ़ चुके हैं कि 1920 में खलीफा को मजबूर करके नेशनल असेम्बली क़ायम की गई फिर 1922 में सुल्तानी खत्म की गई फिर 1923 में तुर्की रिपब्लिक वजूद में आया और अतातुर्क कमाल पाशा सिपहसालार से तुर्की के राष्ट्रपति बने फिर आखिरकार 1924 में कमाल पाशा ने खिलाफत का खातमा कर दिया…!!

कमाल पाशा ने फ्री मेसन्स की निगरानी में तुर्की का संविधान बनवाया जिसकी पहली चार मज़बूत धाराएँ ये हैं….
1.. तुर्की एक जम्हूरी रियासत होगा ( डेमोक्रेटिक स्टेट )
2.. तुर्की एक सेक्युलर स्टेट होगा
3.. तुर्की का एक नाम और झण्डा तय किया गया
4.. ऊपर की तीन धारायें किसी भी सूरत में बदली नहीं जा सकेंगी..!!

ये चार धाराएँ ऐसी हैं कि तुर्की की अवाम 100% एक राय होकर भी इनको बदल नहीं सकती… इन धाराओं की हिफाज़त के लिए तुर्की की फौज को बहुत से इख्तियारात देकर संविधान का ज़ामिन बनाया गया है… मतलब अगर कोई तुर्की हुकूमत इन धाराओं में बदलाव करने की कोशिश करे तो वह बग़ावत मानी जायेगी और फौज को हक़ हासिल है कि वो मार्शल लॉ लागू कर दे
पिछले दिनों जो तुर्की में तख्ता पलट की कोशिश की गई थी उसको आप इसी पसमंज़र में देखिये..!!

इनके अलावा कमाल पाशा ने तुर्की भाषा के अल्फाबेट को अरबी से बदलकर रोमन लिपि में कर दिया और एक नियम यह बनाया कि कोई भी सरकारी काम इस्लामी नाम से हरगिज़ नहीं किया जायेगा… बेपर्दगी आम हो गई.. लोगों के पहनावे रहन सहन तक बदल दिए गए…!!

मौजूदा दौर में आमतौर पर अहम सियासी शख्सियतों में खैर और शर दोनों उनसर पाये जाते हैं आपने कमाल पाशा के शर का पहलू तो देख ही लिया है मगर उसकी शख्सियत में एक पहलू खैर का भी था
वो यह कि यूरोपियन अकवाम के दिलों में नफ़रत की शिद्दत इतनी ज़्यादा थी कि वो मौजूदा तुर्की को भी गवारा करना नहीं चाहते थे उन्हें तुर्की… मज़हबे इस्लाम के बगैर चाहिए था
इन तमाम हालात में देखा जाए तो आलमे असबाब में अतातुर्क कमाल पाशा ने मौजूदा तुर्की को बचाने में कामयाबी हासिल कर ली… अल्लाह तआला चाहे जिससे काम ले ले…!!

आखिरी बात…. तुर्की के एक कोने में एक इलाका ऐसा भी है जहाँ पर सूफी सिलसिला नक़्शबंदिया की जड़ें काफी गहरी हैं और वहां के नौजवान अण्डर ग्राउण्ड तरीके से इस साइलेंट तहरीक से जुड़े हैं राष्ट्रपति तैयब उर्दगान और उनके हमदर्द लोग इसी नक़्शबंदिया सिलसिले की पैदावार हैं
अल्लाह तआला उनको कामयाबी अता फरमायें और एक बार फिर से तुर्की में इस्लाम और खिलाफत को क़ायम फरमायें…. आमीन

M. s. Rana #Ottoman #AtaTurk

Note :- #अतातुर्क कमाल पाशा अपनी पत्नी के साथ जिसने अरबी लेबास और पर्दा कर रखा है..

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15वीं सदी मे ख़िलाफ़त ए उस्मानिया के दौर मे क़ुस्तुन्तुनिया की शाही मस्जिद के इमाम को मुक़रर करने के लिए जो इशतिहार पर्चा के तौर पर छपवाया गया था वो कुछ युं था :-
* अरबी, लातीनी, तुर्की और फ़ारसी जु़बान का माहिर होना चाहीए
* हाफ़िज़ होना चाहीए क़ुरान का, तौरेत का और इंजील का
* शरिया और फिक़ाह का आलिम होना चाहीए
* फ़िज़िक्स को समझने वाला होना चाहीए यहां तक के ख़ुद भी दुसरो को पढ़ा सके
* घोड़सवारी, तलवारबाज़ी, निशानेबाज़ी मे भी महारत हासिल होना चाहीए यहां तक के एक सिपाही के तौर पर जंग व जेहाद मे हिस्सा ले सके
* खुबसुरत होना चाहीए
* आवाज़ बुलंद और सुरीली होनी चाहीए 🙂

During the Golden Age of the Ottoman Empire, Sultan Suleyman Kanuni placed more emphasis on having qualified religious leaders than anything else.

Source: Al Ahram newspaper 22nd September 1986, Egypt

Long before that the Young Turk Party’s Enver Pasha and Kamal had won political power over him leaving him just a puppet caliph.

Ottomans did miracles during their four centuries rule (almost an unbroken chain of one family) in this region and in parts of Europe. They were the role model for Europe for their vast and deep ruling methods. But then Ottomans made a single mistake worth taking them down – they kept ban on printing press for almost 250 years!!! The press changed the world outside them and they simply remained unaware of how literature was changing masses.

Xinhua Hindi News
@xinhua_hindi

तुर्की के अंकारा में अतातुर्क मकबरे में आयोजित एक समारोह में भाग लेते तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन।

तुर्की एक मुस्लिम बहुमुल देश है और यह वही स्थान है जहा के तानाशाही शाषक भारत देश पर आक्रमणकर्ता बने रहे थे लेकिन 1923 में एक बड़े आन्दोलन के बाद कमाल-पाशा ने देश को प्रजातन्त्र घोषित किया और स्वयं प्रथम राष्ट्रपति बने। अब राज्य लगभग निष्कण्टक हो चुका था, पर मुल्लाओं की ओर से उनका निरन्तर विरोध हो रहा था। इसपर कमाल ने सरकारी अखबारों में इस्लाम के विरुद्ध प्रचार शुरू किया। अब तो धार्मिक नेताओं ने उनके विरुद्ध फतवे जारी कर दिये और यह कहना शुरू किया कि कमाल ने अंगोरा में स्त्रियों को पर्दे से बाहर निकाल कर देश में आधुनिक नृत्य का प्रचार किया है, जिसमें पुरुष स्त्रियों से सटकर नाचते हैं, इसका अन्त होना चहिए। हर मस्जिद से यह आवाज उठायी गयी। तब कमाल ने 1924 के मार्च में खिलाफत प्रथा का अन्त किया और तुर्की को धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र घोषित करते हुए एक विधेयक संसद में रखा। अधिकांश संसद सदस्यों ने इसका विरोध किया, पर कमाल ने उन्हें कसके धमकाया। उनकी इस धमकी का पुरजोर असर हुआ और विधेयक पारित हो गया।पर भीतर-भीतर मुल्लाओं के विद्रोह की आग बराब सुलगती रही। कमाल के कई भूतपूर्व साथी मुल्लाओं के साथ मिल गये थे। इन लोगों ने विदेशी पूँजीपतियों से धन भी लिया था। कमाल ने एक दिन इनके मुख्य नेताओं को गिरफ्तार कर फाँसी पर चढ़ा दिया। कमाल ने देखा कि केवल फाँसी पर चढ़ाने से काम नहीं चलेगा, देश को आधुनिक रूप से शिक्षित करना है तथा पुराने रीति रिवाजों को ही नहीं, पहनावे आदि को भी समाप्त करना है।

कमाल ने पहला हमला तुर्की टोपी पर किया। इस पर विद्रोह हुए, पर कमाल ने सेना भेज दी। इसके बाद इन्होंने इस्लामी कानूनों को हटाकर उनके स्थान पर एक नई संहिता स्थापित की जिसमें स्विटज़रलैंड, जर्मनी और इटली की सब अच्छी-अच्छी बातें शामिल थीं। बहु-विवाह गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही पतियों से यह कहा गया कि वे अपनी पत्नियों के साथ ढोरों की तरह-व्यवहार न करके बराबरी का बर्ताव रखें। प्रत्येक व्यक्ति को वोट का अधिकार दिया गया। सेवाओं में घूस लेना निषिद्ध कर दिया गया और घूसखोरों को बहुत कड़ी सजाएँ दी गर्इं। स्त्रियों के पहनावे से पर्दा उठा दिया गया और पुरुष पुराने ढंग के परिच्छेद छोड़कर सूट पहनने लगे।

इससे भी बड़ा सुधार यह था कि अरबी लिपि को हटाकर पूरे देश में रोमन लिपि की स्थापना की गयी। कमाल स्वयं सड़कों पर जाकर रोमन वर्ण-माला में तुर्की भाषा पढ़ाते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि सारा तुर्की संगठित होकर एक हो गया और अलगाव की भावना समाप्त हो गयी।

इसके साथ ही कमाल ने तुर्की सेना को अत्यन्त आधुनिक ढंग से संगठित किया। इस प्रकार तुर्क जाति कमाल पाशा के कारण आधुनिक जाति बनी। सन् 1938 के नवम्बर मास की 10 तारीख को मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क की मृत्यु हुई तब तक आधुनिक तुर्की के निर्माता के रूप में उनका नाम संसार में सूरज की तरह चमक चुका था। आज भी तुर्की चमक रहा है… आशा करे कि हमारे देश में भी वोटबेंक और कट्टरवाद की राजनीती ख़त्म हो और सही मायने में यह देश धर्मनिरपेक्ष हो. ऐसा देश जहा पर धर्म के आधार पर सरकारी नीतियों में एक दुसरे से भेद न हो…सिर्फ एकता हो..

 

तुर्की के आधुनिकीकरण के लिए उठाए जा रहे तमाम कदमों का श्रेय आधुनिक तुर्की के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क को दिया जाता है. तुर्की की सेना के जनरल कमाल अतातुर्क ने देश को एक आधुनिक और समृद्ध देश के तौर पर खड़ा कर तेजी से बदलते विश्व में तुर्की के लिए जगह बनाई. दुनिया के बहुत से देशों ने खुद को धार्मिक आधार पर पहचान से जोड़ा जबकि अतातुर्क ने तुर्की को यूरोपीय मॉडल पर आधारित देश बनाया. वह तुर्की भाषा बोलने वालों को यूरोपीय मॉडल पर बने आधुनिक राज्य में बदलने में कामयाब रहे.

तुर्की में पुरुषों और महिलाओं के लिए 1933 में ही मताधिकार लागू किया गया. उन्होंने एक ऐसे संविधान की नींव रखी जो साफ तौर पर इस्लामी कानून जैसा नहीं था. नए संविधान में इस्लामी पोशाक, बहुविवाह पर पाबंदी और शराब बेचने की इजाजत थी. इस तरह तुर्की दुनिया का अकेला ऐसा मुस्लिम बहुमत वाला देश बना जो कि धर्मनिरपेक्ष है. ये एक लोकतांत्रिक गणराज्य है जिसके एशियाई हिस्से को अनातोलिया और यूरोपीय हिस्से को थ्रेस कहते हैं.

कमाल अतातुर्क

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कमाल अतातुर्क उर्फ मुस्तफ़ा कमाल पाशा (1881 – 1938) को आधुनिक तुर्की का निर्माता कहा जाता है। तुर्की के साम्राज्यवादी शासक सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय का पासा पलट कर वहाँ कमाल की सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था कायम करने का जो क्रान्तिकारी कार्य उन्होंने किया उस ऐतिहासिक कार्य ने उनके नाम को सार्थक सिद्ध कर दिया।

अनुक्रम
जन्म और बचपन
कमाल पाशा का जन्म 19 मई सन् 1881 में सलोनिका (सैलोनिका) के एक किसान परिवार में हुआ था। इनकी माता का नाम जुवैदा व पिता का अली रजा था। अली रजा सलोनिका के चुंगी दफ्तर में क्लर्क थे। उनका बचपन का नाम मुस्तफा था। जन्म के कुछ वर्ष बाद ही पिता की मृत्यु हो गयी। माता जुबैदा ने मजहबी तालीम दिलाने के उद्देश्य से मदरसे में दाखिल करा दिया जहाँ उनके सीनियर छात्रो के तंग (रैंगिंग) करने पर वह मरने मारने पर उतर आये। मात्र 11 साल की उम्र में ही वह इतने दुर्दान्त (मार पिटाई करने वाले) हो गये थे कि उन्हें मक्तब से निकालना पड़ा। बाद में उन्हें मोनास्तीर (मैनिस्टर) के सैनिक स्कूल में भर्ती कराया गया। परन्तु वहाँ भी उनका मर मिटने वाला उग्रवादी स्वभाव बना रहा लेकिन सैन्य-शिक्षा में दिलचस्पी के कारण उनकी पढाई बदस्तूर जारी रही, उसमें कोई व्यवधान नहीं आया।

सैन्य शिक्षा
बालक मुस्तफा उग्र अवश्य था परन्तु गणित में उसकी गति आश्चर्य जनक थी। अध्यापक के ब्लैक बोर्ड पर सवाल लिखते ही वह उसे मुँहजबानी हल कर दिया करता था। उसमें कमाल की काबिलियत देखकर स्कूल के गणित अध्यापक कैप्टन मुस्तफा उफैंदी ने नाम बदल कर कमाल रख दिया। उसके बाद ही वह कमाल पाशा के नाम से जाना जाने लगा। 17 साल की उम्र में मोनास्तीर के प्राइमरी सैनिक स्कूल में प्रारम्भिक सैन्य शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्हें कुस्तुन्तुनिया (कांस्टेण्टीनोपिल) के स्टाफ़ कालेज (वार एकेडमी) में उच्च सैन्य शिक्षा हेतु भेज दिया गया। उन दिनों कुस्तुन्तुनिया में अब्दुल हमीद (द्वितीय) की सल्तनत थी और उसके राज्याधिपति को सुल्तान कहा जाता था।

वतन से दोस्ती
वहाँ वह अध्ययन के साथ-साथ बुरी संगत में घूमते रहे। कुछ काल तक उद्दण्डतापूर्ण जीवन बिताने के बाद वह वतन नामक एक गुप्त क्रान्तिकारी दल के पहले सदस्य बने और थोड़े ही दिनों बाद उसके नेता हो गये। वतन का उद्देश्य एक तरफ सुल्तान की तानाशाही और दूसरी तरफ विदेशी षड्यन्त्रों को जड से मिटाना था। एक दिन दल की बैठक चल रही थी कि किसी गुप्तचर ने सुल्तान को खबर दे दी और सबके सब षड्यन्त्रकारी अफसर गिरफ्तार करके जेल भेज दिये गये। प्रचलित कानून के अनुसार उन सबको मृत्युदण्ड दिया जा सकता था, पर दुर्बलचित्त सुल्तान को भय था कि कहीं ऐसा करने पर देश में विद्रोह न भड़क उठे, अत: उसने सबकों क्षमादान देने का निश्चय किया।

signature of ataturk

क्षमादान के पश्चात फिर वही कार्य
इस प्रकार अन्य सनिकों के साथ कमाल भी क्षमादान में छोड़ दिये गये। तत्पश्चात सुल्तान ने द्रूज जाति के विद्रोह को दबाने के लिये उन्हें दमिश्क भेज दिया। वहाँ कमाल ने काम तो कमाल का ही किया, पर स्वभाव के अनुसार कुस्तन्तुनिया वापस लौटते ही उन्होंने स्ताम्बूल (स्टैम्बोल) में एक कमरा लेकर वतन-ओ-हुर्रियत पार्टी का कार्यालय खोलकर उसमें आजादी की गुप्त संस्था का कार्य आरम्भ कर दिया। इसी बीच उन्हें यह ज्ञात हुआ कि मकदूनिया में सुल्तान के विरुद्ध खुला विद्रोह होने वाला है। मौके की नजाकत को भाँपते हुए कमाल ने सुल्तान की सेना से छुट्टी ले ली और जाफ़ा, मिरुा व एथेंस होते हुए वेश बदलकर विद्रोह के केन्द्र सलोनिका जा पहुँचे। परन्तु वहाँ पर उन्हें पहचान लिया गया।

पलायनावस्था
फिर वह ग्रीस होते हुए जाफ़ा की ओर भागे। पर तब तक उनकी गिरफ्तारी का आदेश वहाँ भी पहुँच चुका था। अहमद बे नामक एक अफसर पर कमाल को पकड़ने का भार था, पर चूँकि अहमद स्वयं वतन का सदस्य था, इसलिए उसने कमाल को गिरफ्तार करने के बजाय गाजा मोर्चे पर भेज दिया और यह सुल्तान को यह रिपोर्ट भेज दी कि वह छुट्टी पर गये ही नहीं थे।

यद्यपि कमाल सलोनिका में बहुत थोड़े समय तक ही रह पाये, फिर भी उन्होंने यह भली-भाँति समझ लिया था कि सलोनिका को ही विद्रोह का केन्द्र बनाना ठीक रहेगा, इसलिये बड़े प्रयत्नों के बाद सन् 1908 में उन्होंने अपना स्थानान्तरण सलोनिका ही करवा लिया।

अनवर पाशा का क्रान्ति-प्रयास
यहाँ अनवर के नेतृत्व में दो साल पहले ही एकता और प्रगति समिति के नाम से एक क्रान्तिकारी दल की स्थापना हो चुकी थी। कमाल तत्काल उसके सदस्य बन गये, परन्तु दल के नेताओं से उनकी नहीं बनीं। फिर भी वे समिति का काम निरन्तर करते रहे। इस दल के एक नेता नियाज़ी ने केवल कुछ सौ आदमियों को लेकर तुर्की सरकार के विरुद्ध विद्रोह बोल दिया। यद्यपि थी तो यह बड़ी मूर्खता की बात, परन्तु चूँकि सारा देश तैयार था, इसलिए जो सेना उससे लड़ने के लिए भेजी गयी थी, वह भी अनवर से जा मिली। इस प्रकार देश में अनवर का जय-जयकार हो गया।

अनवर की असफल क्रान्ति
अब सह सम्मिलित सेना राजधानी पर आक्रमण करने की तैयारी कर रही थी। सुल्तान ने इन्हीं दिनों कुछ शासन-सुधार भी किये। फिर भी विद्रोह की शक्तियाँ अपना काम करती रहीं, पर जब विद्रोह सफल हो चुका तब सुल्तान अब्दुल हमीद ने सेना के कुछ लोगों को यथेष्ट घूस देकर अपने साथ मिला लिया, जिससे सैनिकों ने विद्रोह करके अपने अफसरों को मार डाला और फिर एक बार इस्लाम, सुल्तान और खलीफ़ा की जय के नारे बुलन्द हुए।

अनवर का पाशा पलट पुनर्प्रयास
इन दिनों अनवर बर्लिन में थे। वह जल्दी ही लौटे और उन्होंने अब्दुल हमीद को गद्दी से उतार कर अनेक प्रतिक्रियावादी नेताओं की फाँसी पर चढ़ा दिया। इस प्रकार अनवर की क्रान्तिकारी समिति के हाथ में प्रशासनिक शक्ति आ गयी। आम जनता को दिग्भ्रमित करने के लिये सुल्तान के भान्जे को सिंहासन पर बिठा दिया गया।

कमाल व अनवर में सत्ता-संघर्ष
इधर कमाल पाशा अनवर के विरुद्ध निरन्तर षड्यन्त्र करते रहे क्योंकि उनके विचार से अनवर बेशक आदर्शवादी थे किन्तु अव्यावहारिक अधिक व्यक्ति थे। बावजूद इस सबके अनवर ने उस समय होने वाले विदेशी आक्रमणों को एक के बाद एक लगातार विफल किया इससे जनता में अनवर की ख्याति और अधिक बढ़ी।

अनवर के इस्लामीकरण के विरुद्ध कमाल का आन्दोलन
इसके बाद अनवर ने अपने सर्व इस्लामी स्वप्न को सत्य करने के लिए कार्य आरम्भ किया और उन्होंने इसके लिए सबसे पहला काम यह किया कि तुर्की सेना को संगठित करने का भार एक जर्मन जनरल को दिया। कमाल ने इसके विरुद्ध यह कहते हुए आन्दोलन प्रारम्भ किया कि यह तो तुर्की जाति का अपमान है। इस पर कमाल को सैनिक दूत बनाकर सोफ़िया भेज दिया गया।

महायुद्ध के भँवर-जाल में
इसी बीच महायुद्ध छिड़ गया। इसमें अनवर सफल नहीं हो सके, पर कमाल ने एक युद्ध में कुस्तन्तुनिया पर अधिकार करने की ब्रिाटिश चाल को विफल कर दिया और उसके बाद उनकी जीत पर जीत होती चली गयी। फिर भी महायुद्ध में तुर्की हार गया। कमाल दिन रात परिश्रम करके विदेशियों के विरुद्ध आन्दोलन करते रहे। 1920 में सेव्रा की सन्धि की घोषणा हुई परन्तु इसकी शर्तें इतनी खराब थीं कि कमाल ने फौरन ही एक सेना तैयार कर कुस्तुन्तुनिया पर आक्रमण की तैयारी की।

ग्रीस का आक्रमण
इसी बीच ग्रीस ने तुर्की पर हमला कर दिया और स्मरना में सेना उतार दी जो कमाल के प्रधान केन्द्र अंगारा की तरफ बढ़ने लगी। अब तो कमाल के लिये बड़ी समस्या पैदा हो गई, क्योंकि इस युद्ध में यदि वे हार जाते तो आगे कोई संभावना न रहती। इसलिये उन्होंने बड़ी तैयारी के साथ युद्ध किया जिसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे ग्रीक सेना को पीछे हटना पड़ा।

फ्रांस व रूस की सहायता
इस बीच फ्रांस और रूस ने भी कमाल को गुप्त रूप से सहायता देना शुरू किया। थोड़े दिनों में ही ग्रीक निकाल बाहर किए गए। ग्रीकों को भगाने के बाद ही अंग्रेजों के हाथ से बाकी हिस्से निकालने का प्रश्न था। देश उनके साथ था, इसके अतिरिक्त ब्रिाटेन अब लड़ने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं था। इस कारण यह समस्या भी सुलझ गई।

तुर्की में प्रजातन्त्र
कमाल ने देश को प्रजातन्त्र घोषित किया और स्वयं प्रथम राष्ट्रपति बने। अब राज्य लगभग निष्कण्टक हो चुका था, पर मुल्लाओं की ओर से उनका निरन्तर विरोध हो रहा था। इसपर कमाल ने सरकारी अखबारों में इस्लाम के विरुद्ध प्रचार शुरू किया। अब तो धार्मिक नेताओं ने उनके विरुद्ध फतवे जारी कर दिये और यह कहना शुरू किया कि कमाल ने अंगोरा में स्त्रियों को पर्दे से बाहर निकाल कर देश में आधुनिक नृत्य का प्रचार किया है, जिसमें पुरुष स्त्रियों से सटकर नाचते हैं, इसका अन्त होना चहिए। हर मस्जिद से यह आवाज उठायी गयी। तब कमाल ने 1924 के मार्च में खिलाफत प्रथा का अन्त किया और तुर्की को धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र घोषित करते हुए एक विधेयक संसद में रखा। अधिकांश संसद सदस्यों ने इसका विरोध किया, पर कमाल ने उन्हें कसके धमकाया। उनकी इस धमकी का पुरजोर असर हुआ और विधेयक पारित हो गया।

मुल्ला मौलवियों पर नकेल
पर भीतर-भीतर मुल्लाओं के विद्रोह की आग बराब सुलगती रही। कमाल के कई भूतपूर्व साथी मुल्लाओं के साथ मिल गये थे। इन लोगों ने विदेशी पूँजीपतियों से धन भी लिया था। कमाल ने एक दिन इनके मुख्य नेताओं को गिरफ्तार कर फाँसी पर चढ़ा दिया। कमाल ने देखा कि केवल फाँसी पर चढ़ाने से काम नहीं चलेगा, देश को आधुनिक रूप से शिक्षित करना है तथा पुराने रीति रिवाजों को ही नहीं, पहनावे आदि को भी समाप्त करना है।

सामाजिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन
कमाल ने पहला हमला तुर्की टोपी पर किया। इस पर विद्रोह हुए, पर कमाल ने सेना भेज दी। इसके बाद इन्होंने इस्लामी कानूनों को हटाकर उनके स्थान पर एक नई संहिता स्थापित की जिसमें स्विटज़रलैंड, जर्मनी और इटली की सब अच्छी-अच्छी बातें शामिल थीं। बहु-विवाह गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही पतियों से यह कहा गया कि वे अपनी पत्नियों के साथ ढोरों की तरह-व्यवहार न करके बराबरी का बर्ताव रखें। प्रत्येक व्यक्ति को वोट का अधिकार दिया गया। सेवाओं में घूस लेना निषिद्ध कर दिया गया और घूसखोरों को बहुत कड़ी सजाएँ दी गर्इं। स्त्रियों के पहनावे से पर्दा उठा दिया गया और पुरुष पुराने ढंग के परिच्छेद छोड़कर सूट पहनने लगे।

भाषायी क्रान्ति से राष्ट्रीय एकता की स्थापना
इससे भी बड़ा सुधार यह था कि अरबी लिपि को हटाकर पूरे देश में रोमन लिपि की स्थापना की गयी। कमाल स्वयं सड़कों पर जाकर रोमन वर्ण-माला में तुर्की भाषा पढ़ाते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि सारा तुर्की संगठित होकर एक हो गया और अलगाव की भावना समाप्त हो गयी।

सैन्य व्यवस्था में सुधार
इसके साथ ही कमाल ने तुर्की सेना को अत्यन्त आधुनिक ढंग से संगठित किया। इस प्रकार तुर्क जाति कमाल पाशा के कारण आधुनिक जाति बनी। सन् 1938 के नवम्बर मास की 10 तारीख को मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क की मृत्यु हुई तब तक आधुनिक तुर्की के निर्माता के रूप में उनका नाम संसार में सूरज की तरह चमक चुका था।

वैसे तो कमाल पाशा के जीवन में चार स्त्रियों के साथ उसका प्रेम प्रसंग चला किन्तु शादी उसने केवल लतीफी उस्साकी से ही की। यद्यपि उससे कमाल को कोई सन्तान नहीं हुई और वह निस्संतान ही मर गयी। बीबी के मरने के बाद मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने कभी विवाह नहीं किया। जीवन के एकाकीपन को दूर करने के लिये उसने तेरह अनाथ बच्चों को गोद लिया और उनकी बेहतर ढँग से परवरिश की। इन तेरह बच्चों में भी बारह लड़कियाँ थीं और केवल एक ही लड़का था।

पाशा

मुहंमद अली पाशा
पाशा तुर्की में प्रयुक्त एक पदवी नाम है जो भारतीय उपमहाद्वीप में भी मुस्लिम उपनाम-कुलनाम की तरह इस्तेमाल होते हैं। बीसवीं सदी के तुर्की के कमाल पाशा (अतातुर्क) इसके एक उदाहरण हैं।

पाशा फारसी के पाद-शाह (बड़ा राजा) से बना है। इसी पादशाह से अरबी में बादशाह बनता है – क्योंकि अरबी में प का उच्चारण नहीं होता। पंजाबी साहित्य में पादशाह का चलन रहा है , जबकि शेष उत्तर भारत में बादशाह कहते हैं।

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