साहित्य

एक बड़े होते बच्चें की मम्मा

Madhu
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10th क्लास पास करने के बाद मन रुई सा हल्का हो गया था । जीवन में अब मैथ्स नाम के राक्षस का आतंक न होगा । मैथ्स पीरियड के 40 मिनिट जैसे एक जुग से लम्बे । पीरियड खत्म ही नही होता लगता था । अचम्भा होता कि मैथ्स टीचर इतनी देर से इतने नीरस विषय पर कितनी गम्भीरता से बोल रहे है , बोर्ड में लम्बे लम्बे इक्वेशन साल्व कर थकते नही । मैथ्स पीरियड में मैं अक्सर अपनी सीट बदल सबसे पीछे बैठ जाती ।मेरे जीवन के कितने साल कासथिटा , टैन थीटा , एक्सपोनेंट , रेशनल नम्बर , लीनियर इक्वेशन, अलजेब्रा जैसी जानलेवा सरदर्दी में गुजर गए । जीवन में वह क्षण कभी नही आया कि मैं व्यवहारिकता में π (पाई) की वैल्यू 22/7 का उपयोग कर पाऊं ।

आँखे फोड़, आत्मा निचोड़कर जो लॉग टेबल याद किया था के उपयोग के लिए उस ग्रह का नाम बताए जहाँ ये लॉग टेबल काम आते है ??? पागलों की तरह अंडररूट निकालते चलो , बेटा तब तक निकालते चलो जब तक डेसीमल के बाद के दो नम्बर और न आ जाए । रेशनल नम्बर के अलग अलग डिजाइन के ब्रैकेट तोड़ तोड़कर गुणा भाग सीखे थे उनका कहाँ इस्तेमाल करूँ ?? दुनियादारी हिसाब में कभी ऐसे अंक नही आए कि दुकान में साड़ियों की कीमत को पहले सर्पाकार कोष्ठक( कर्ली ब्रैकेट) के भीतर गुणा करो फिर , वर्त्ताकार कोष्ठक ( राउंड ब्रैकेट )के अंदर के रेशनल नम्बर्स को जोड़ो और अंत में वर्गाकार ( स्क्वेयर ब्रैकेट)को तोड़कर माइनस करो । तिस पर भी अक्ल के मारों अगर नम्बर फ्रैक्शनल नम्बर में है तो डॉमिनेटर नम्बर का एल. सी.एम .( लघुत्तम समापवर्तक निकाल) कर घटाओ ।

सब्जी मार्केट में गुना भाग के बाद दशमलव में जो चिल्हर आएगा क्या उतने प्रकार के सिक्के मार्केट में है ?? कोई दुकानदार 3/4 रुपए मांगेगा तो मैं उसे दे पाऊँगी या फिर मैं किसी पिज़ा का 2/3 भाग रानू के खाने के बाद फिर बचे पिज़ा का 3/2 भाग खुद के लिए रखती हूँ तो बॉक्स में कितना भाग पिज़ा बचा सोच सकती हूं ?? अरे बोल दूँगी छोटा सा पिज़ा बचा । काम में आने लायक व्यवहारिक गणित तो क्लास 5 तक का ही था जिसमें से प्रतिशत अक्सर काम आता है जब मॉल में कुर्ती पर 70% डिस्काउंट देख मैं आँखें नचाती हवा में पर्सेंट निकाल कुर्ती की कीमत निकालती हूँ ।

क्लास 5 के बाद का गणित तो सिर्फ जीवन को सन्ताप से भरने होता है । कभी मेरे मैथ्स टीचर मिले तो मैं उनसे पूछूँगी “क्यो किया आपने ऐसा ?? हम मासूमो का क्या कसूर था आखिर ?? अब बताओ मैं कहाँ जाऊ आपके उन सवालों के जवाब के साथ जो हमसे जामेट्री में रुला रुला कर निकलवाए थे ।
ab{ -c (- ab +ba)× -b( cb ÷ dc) } जामेट्री के कैलकुलेशन चायनीज भाषा से ज्यादा कठिन होते है । यह दावा मैं इनकी डिजाइन देखकर कर सकती हूँ । सर जब बोर्ड में सवाल हल करते तो मन में आता कि प्रश्न के अंको के साथ ऐसा कौन सा भयानक हादसा पेश आया कि नीचे के अगले ही स्टेप में इनका पूरा चोला बदल गया । हे ईश्वर इन नम्बरो के साथ सर ने वो कौन सी गुप्त साधना की है कि नम्बरस अचानक इच्छाधारी हो गए । सभी दोस्तों से गहन मन्त्रणा के बाद समझा अरे जो ज्ञात नही उसे x मान लिया । बस दाँत पीसकर रह गए थे हम । ये आपका “मान लिया x ” की साजिश से अनजान मैं पूरा सप्ताह राज जानने बैचैन घूम रही थी और मालूम हुआ कि आपको भी नही मालूम था तो x मान लिया । क्या आप इसी तरह ये नही मान सकते थे कि “मान लिया तुम्हारा होमवर्क कम्प्लीट है ?” होमवर्क चेक करवाने की लाइन में अपनी कॉपी पकड़े मैं भीतर ही भीतर थर्राती थी । आधे से अधिक बार मैथ्स बनता ही न था सो दूसरों की कॉपी लेकर उतार लिया । कॉपी में टीचर की लाल पेन से राइट होते ही जैसे सर का बोझ उतर गया ।

मुझे आज तक कोई ऐसा खोखला बेलन न मिला जिसके भीतर घुसकर मैं उसका आयतन मतलब वाल्यूम निकालू और तीस पर भी बेलन के वैल्यूम के 3/4 में शक्कर भर कर 1/2 भाग फिर वापस निकाल लू और अब पता लगाऊ कि बेलन का कितना भाग खाली है । मैं ऐसा काम क्यों करूँगी ?? बेलन , स्पियर सबके एरिया , वैल्यूम , पैरामीटर के अलग अलग फार्मूला । एक टँकी में नल चालू करने पर आधे घण्टे में 3/1 भाग खाली हो जाता है और उस टँकी को 10 मिनिट में 5/2 भरा जा सकता है । अब यदि भरने और खाली करने वाले दोनों नल एक साथ खोले जाए तो टँकी के 2/ 3 भाग भरने में कितना समय लगेगा ?? वास्तविक जीवन का एक केस बताइए जिसमें टँकी 2/3 भाग कब भरेगी यह चेक करने के लिए किसी ने खाली करने वाला नल और भरने वाले नल एक साथ खुले छोड़े ।

अब आप बताइए कि किसी बच्चे की आयु उसके पिता कि आयु के 3/4 है । चार साल बाद वो बेटे की आयु पिता की आयु के इतने बंटे उतने हो जाती है । अब पिता पुत्र दोनो की आयु 10 साल बाद क्या होगी ?? वो उन बाप बेटे का निजी मामला है मुझे क्या ?? फिर किसी बाप बेटे की आयु किससे कितने गुना ज्यादा और कितने साल बाद क्या होगी जैसी पारिवारिक पंचायत से मेरे बचपन का क्या लेना देना ??? एक काम को 4 आदमी और 5 औरते इतने दिन में कर सकते है तो उसी काम को 2 औरते और 6 आदमी कितने दिन में करेंगे ?? यदि इस काम को करने आई नई औरतें आलसी है तो फार्मूला तो फेल खा गया न?? कितने बार तो मेरा उत्तर 2.5 मजदूर आता था । मेरी कल्पना में दो साबूत मजदूर और एक मजदूर का केवल धड़ मतलब इस तरह ढाई मजदूर दिखने भी लगते थे ।

दो ट्रेन आपस में एक दूसरे को क्रास कर रही है । पहली ट्रेन की लंबाई इतने मीटर और गति 120 किलोमीटर प्रति घण्टे है । दूसरी ट्रेन की लंबाई उतने मीटर और गति 80 किलोमीटर प्रति घण्टा तो दोनों ट्रेन आपस में एक दूसरे को कितने देर में क्रास करेंगे ।अब बताओ हम बच्चे ट्रेन के डब्बे गिनने का काम छोड़ आपस में क्रास करने का टाइम निकालेंगे ?? । अलजेब्रा में ab का cd से गुणा क्यों किया जाए ?? क्या हमारे पास अंको का टोटा है जो हम नम्बर छोड़ लेटर्स abc का गुणा भाग करने लगे ?? अगर लेटर्स में गुणा भाग कर रहे है तो फिर अंको में कविताएं लिखिए ??मतलब कोई कहे कि करेंट का झटका लगवाना है या गणित पढ़ना है तो मैं फौरन करेंट का झटका लगवाने तैयार हो जाती । क्या ही अच्छा होता कि हमें सिर्फ अपनी अपनी रुचि के विषय ही पढ़ना होता और बाकि विषयों का सामान्य ज्ञान ही करना होता । पढ़ाई तब शायद यातना न लगकर मनोरंजक खेल सी होती । पढ़ाई को खेल पद्धति से पढ़ाने के परिणाम बेहतर होंगे। किसी भी हाल में बच्चे पर पढ़ाई का दबाव नही होना चाहिए , किसी भी हाल में नही । ये आश्चर्यजनक था कि मुझे मैथ्स से नफरत थी लेकिन साइंस पसन्दीदा विषय था। मुझे अचम्भा होता था कि कैमेस्ट्री सबको क्यो कठिन लगती है ??

मैथ्स की इस घोर मानसिक प्रताड़ना से गुजरते हुए अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद लगा कि हाय सिलेबस- हाय सिलेबस , इम्पोर्टेन्ट क्वेश्चनस , लास्ट ईयर के क्वेश्चन पेपर , जैसे मनहूस शब्दो से सदा के लिए छुटकारा मिल गया । अब जिंदगी कितनी आसान है लेकिन सपनों का महल उस दिन भरभरा कर टूट गया जब मेरे बेटे ने स्कूल जाना शुरू किया। अब लगता है कि बेटे के लिए जितनी मेहनत करती हूँ उतनी मेहनत अपने छात्र जीवन में की होती तो मैं भी आज मंगल यान भेजने वालों की टीम में होती । उसको हिस्ट्री , मैथ्स, जाग्रफी समझाते हुए खुद को अब समझ आया कि लांगीट्यूड (देशांतर रेखा)और लेटीट्यूड ( अक्षांश रेखा)क्या है । अपने स्कूल के समय में जाग्रफी की प्रैक्टिक कॉपी जिसमें एक साइड सफेद पन्ना और दूसरी साइड लाइनिंग होती थी पर पेंसिल से पृथ्वी के डायग्राम में देशांतर रेखाएं, भूमध्य रेखा , अक्षांश रेखा की ड्राइंग बनाई थी । समझ ही नही आता था कि इतनी बड़ी गोल पृथ्वी पर किस स्पाइडरमैन ने स्केल से लाइन खींची ?? जाग्रफी बहुत बोरिंग चीज लगती थी । अब ये सब अपने बेटे को समझाने के लिए जान भिड़ा देती हूँ ताकि उसे कठिन न लगे , उसे समझने में सहायता मिले। गूगल , यूट्यूब की वीडियो वयाख्याए सिलेबस को सरल , पठनीय और सहज ग्राहय बना देती है । मैं मुस्तैदी से हर साल उसकी नयी किताबें आती ही पहले खुद पढ़ने बैठती हूँ — देख बिट्टू अगर तेरा मैथ्स अच्छा है तो समझ ले बाकी कुछ भी टफ़ नही है । (बेटे की नही मालूम कि उसकी माँ ने राम राम करते मैथ्स की वैतरणी पार की थी।) सुन बाबू हिंदी , साइंस और इंग्लिश लिटरेचर तो चुटकी का खेल है । हाँ हिस्ट्री जरा बोरिंग है लेकिन उसमें समझने जैसा कुछ है नही । पास्ट में जो हो चुका उसे याद करना है ।मतलब मेमोरी पॉवर का खेल है । तुझे हिस्ट्री पढ़ना मेरी उम्र में आकर अच्छा लगेगा ।आप लोगों ने भी महसूस किया होगा कि बचपन भविष्य के लिए रोमांचित होता है । अतीत या इतिहास के प्रति उत्सुकता कम बच्चों में ही देखने मिलती है । बेटे को पढ़ाते पढ़ाते एक बात ये हुई कि मेरा मैथ्स सुधर गया । जामेट्री में भी मजा आने लगा ।

मैं बेटे के आगे उपदेश जारी रखती हालाँकि बेटे पर इसका अल्पावधि प्रभाव भी नही रहता — देख मुन्ना मैथ्स हर दिन करना जरूरी है । बार बार करने से मैथ्स ईजी और इंटरेस्टिंग लगने लगता है । आगे की लाइन बेटा खुद ही पूरी कर लेता है — प्रैक्टिस मेक्स अ मेन परफैक्ट ( बेटा माधुरी दीक्षित के अंदाज़ में परररररफेक्ट को लम्बा खींच कर उच्चारित करने लगता है ।) मेरे गम्भीर लेक्चर की ऐसी तौहीन से चिढ़कर अक्सर एक ही वाक्य मुँह से निकलता है — जितने ध्यान से तू टीवी देखता है न , काश उतने ही ध्यान से पढ़ाई करता तो मेरा जीवन तर जाता। फला आँटी को देख माँ पचासों किटी में घूमती है । बेटी कमरा बन्द कर पढ़ती रहती है । मुझे थक हारकर अपने मूल मुद्दे एग्जाम की रणनीतियाँ , नम्बर हासिल करने के गूढ़ तरीकों और चेकिंग में एग्जामिनर को इम्प्रेस करने के सूक्ष्म कौशल पर वापस आना होता है। आजकल के बच्चे सभी विषय सोशलसाइंस , हायर इंग्लिश , साइंस , G K , कम्प्यूटर , एक्स्ट्रा रीडिंग सब कुछ अंग्रेजी में पढ़ते है तो स्वाभाविक तौर पर हिंदी लिखने में कमजोर होते है । बेटे को हिंदी लिपि के अक्षरों और मात्राओं के घुमाव बेहद जटिल लगते है । जब नर्सरी में था तब सभी हिंदी अक्षरों की मिरर इमेज़ बनाता था । अगली कक्षा में अक्षरों का अगला पड़ाव “शब्दों ” के साथ माथापच्ची । अक्षरों को जोड़कर शब्द बनाना समझाते समझाते धीरज छूटने लगता “तुमहारा नही बेटा “तुम्हारा” आधा म लिखते है । अचछा नही “अच्छा” , कूकि नही क्योकि , बहोत नही बहुत । वास्तव में वो हिंदी से इतना ज्यादा डरता है जितना मैं मैथ्स से भी नही डरी । मेरे मैथ्स मैथ्स करके की वजह से वो मैथ्स में तो ब्रिलियंट हो गया लेकिन हिंदी के पेपर में नम्बर सुनामी की रफ्तार में बह जाते है।

जैसे जैसे कक्षा आगे बढ़ी हिंदी पाठ्यक्रम का विस्तार शब्दों से बढ़कर वाक्य में पहुँचा और हम माँ बेटे की आफत भी बढ़ी । तब बेटा शायद क्लास 2 में रहा होगा जब उसके प्रश्रपत्र में सरप्राइज क्वेश्चन के रूप में… “दिए गए शब्दों के वाक्यों में प्रयोग करिये।”…. धूमकेतु बन गिरे । “कमल” शब्द का वाक्यों में प्रयोग करना था । बेटा एग्जाम देकर घर आया मैंने फटाफट उसके बैग से प्रश्नपत्र निकाल कर देखा — हे भगवान ! वाक्यों में प्रयोग । बिट्टू तू लिख कर आया क्या ?? उसने हाँ में सर हिलाया । मुझे ताज्जुब हुआ कि इसे शब्द का वाक्यों में प्रयोग आता है — क्या लिखा तुमने ? उसने अपनी बुद्धिमता का अद्भुत प्रदर्शन किया था । कमल शब्द का वाक्यों में प्रयोग कुछ इस तरह किया था — जब सूरए निकल्लता है तो कमल का फुल्ल खिल्ल जाता है । ( आधा म आधा च के उचित उपयोग पर जोर देने की वजह से अनावश्यक आधा ल का प्रयोग करके उसने अदम्य बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया था ।)मुझे उसकी मात्राओं की त्रुटियों का ज्ञान था इसलिए कातर होकर कहा — बेटा क्या जरूरत थी ओवर स्मार्टनेस दिखाने की ?? सूरय नही सूर्य होता है । तू सीधा साधा सूरज लिख सकता था । खिल्ल नही खिल होता है । तुम सीधे सीधे बिना कोई मात्रा वाला शब्द लिख सकते थे जैसे — कमल का फूल लाल होता है या कमल तालाब में होता है । सूरज उगा कर कमल खिलाकर तुमने सारे नम्बर डूबो दिए ।

साल दर साल कान्हा जी की हिंदी की चरमराती गाड़ी मंथर गति से बढ़ रही थी । यकीन करना मुश्किल था कि इसी बच्चे के सभी विषयों में लगभग शत प्रतिशत नम्बर होते है । कान्हा बहुत कम उम्र से मोटे मोटे नॉवेल्स दो से तीन घण्टे में पूरी पढ़ लेता है । किताबों के प्रति जुनूनी पागलपन है । बेटे की मात्राओं की त्रुटियाँ सुधारने गर्मी की छुट्टियों में हर दिन दो पन्ने हिंदी लिखने का प्रण लिया गया लेकिन छुट्टियों के प्रण कभी पूरे नही होते । उसकी हिंदी की क्लास वर्क कॉपी मैडम द्वारा लिखे “मात्राओं पर ध्यान दीजिए” के रिमार्क से भरी होती ।

हम माँ बेटे की मुश्किलें तब और बढ़ी जब अगली क्लास के सिलेबस में आवेदन पत्र भी शामिल हुए । जब तक एक लाइन के छोटे छोटे उत्तर या रिक्त स्थानों की पूर्ति थे तब तक याद करवाना फिर भी आसान था — सुनो कान्हा आवेदन पत्र में सबसे ऊपर “प्रति” फिर आगे प्रधानाचार्य । मम्मा ये “प्रति” मतलब क्या हुआ , “प्रधानाचार्य” तो वो ऑरेंज क्लॉथ वाले टेम्पल के पुजारी जी को बोलते है न ?? बेटे की बातों से मुझे बुखार चढ़ने लगता । आवेदन पत्र याद करवाने से ज्यादा आसान काम माउंटएवरेस्ट पर चढ़ाई करना था ।

प्रति,
प्रधानाचार्य
दिल्ली पब्लिक स्कूल

आधा घण्टे से ज्यादा समय तक इसकी मात्रा लिख लिखकर याद की गई । लड़के की रुलाई देख मुझे तरस आने लगा लेकिन रहम करना मुश्किल था । मन ही मन मुझे भी आवेदन पत्र का विषय देख गुस्सा आ रहा था “ज्वर से पीड़ित होने की वजह से शाला में उपस्थित होने में असमर्थ हूँ । कृपया मुझे अवकाश प्रदान करने की कृपा करें ।” इतनी मात्राएँ सीखने तक लड़का वोट डालने लायक हो जाएगा । अंत में थक हार कर सोचा कि जो सरल है उसे ही “अचछे” मतलब अच्छे से याद कर ले । नही तो आवेदन पत्र में ही अटके रह जाएंगे । अगले साल की कक्षा में आवेदन पत्र का विषय तो और भी अधिक आतंकी हो गया ।

इस बार आवेदन पत्र का विषय था बारिश की वजह से शाला का सफेद गणवेश सूख न पाने के कारण रँगीन कपड़ों में शाला प्रवेश की अनुमति हेतु आवेदन पत्र । कान्हा बार बार “सफेद गणवेश” की जगह “सफेद गणतंत्र” लिख रहा था। असल में यह राष्ट्रीय पर्व पर पांच पंक्तियाँ याद करने का साइड इफेक्ट था । आवेदन पत्र के शब्दों की कठनाई से अंत में वो वास्तव में सुबक सुबक कर रोने लगा – मम्मा ये लोग हिंदी में बात क्यो नही करते ? ये “गणवेश” किस लेंग्वेज़ का शब्द है ?? बेटे के हिंदी पेपर की पहली रात तो मैं खाना बाहर से ही मंगवाती हूं । बेटे को समय देने के कारण डिनर तैयार ही नही कर पाती । शब्दों की जटिलता देख उसकी हिम्मत टूटती रहती है । हमने इस आवेदन पत्र को न तैयार करने का निर्णय लेकर आगे व्याकरण , निबन्ध , शब्दार्थ , विरोधार्थी शब्द और पर्यायवाची पर ध्यान केंद्रित किया । निबन्ध और पत्र हमारे लिए वो राहु केतु बन चुके थे जो नम्बर नामक चन्द्रमा को लील जाते थे । व्याकरण की अपनी जटिलताएँ लगी ।कोई भी सच्चा आदमी “उड्डयन” शब्द का संधि विच्छेद देख बौखला जाए । कान्हा ने अनुमान लगाया “उड़ + यान = उड्डयन” होना चाहिए लेकिन सही उत्तर “उत् + डयन” है ।अब ‘त’ ‘ड’ कैसे बन गया। ये तो सरासर धोखा है , बेईमानी है । क्या हमने कभी किसी वर्ण के उच्चारण करने से पहले ये सोचा कि “सत + चरित्र= सच्चरित्र” में बाद में अतिरिक्त च कहाँ से प्रकट हो गया ? अब लिख तो दिया कि व्यंजन सन्धि का नियम , भाई नियम ।

अब ये पिछले साल की बात है । सिलेबस में औपचारिक पत्रों की श्रेणी में शिकायती पत्र लिखना था जैसे डेंगू की रोकथाम के लिए चिकित्सा अधिकारी को शिकायती पत्र ,…. मौहल्ले में नालियों की सफाई न होने पर नगर निगम को शिकायती पत्र ,… बार बार बिजली जाने पर बिजली विभाग को शिकायती पत्र…. और क्षेत्र में चोरी की बढ़ती घटनाओं के लिए थानाध्यक्ष को पत्र । पत्र का विषय देखकर बेटे के साथ साथ मेरे भी हाथ पाँव फूलने लगे । मैंने इस “शिकायती-पत्र” नामक आफ़त से निपटने रामबाण उपाय सोचा । एक तीर से दो शिकार (मुहावरा कान्हा की किताब से ) — “सुन बेटा ये नालियों की सफाई के लिए नगर निगम और डेंगू के रोकथाम के लिए चिकित्सा अधिकारी को शिकायत पत्र दोनों पत्रों के बीच का मैटर घालमघेल किया जा सकता है । इसमें अपने को दो से तीन लाइन की बचत है । महोदय , सनम्र निवेदन है कि मेरे क्षेत्र में …..तक दोनों पत्रों का एक सा है । इसके आगे भी दोनो ही पत्रों की दूसरी लाइन….. चारों ओर गन्दगी पसरी है , नालियों में पानी निकासी न होने से डेंगू का भय बना हुआ है और दूसरे वाले पत्र में जो सफाई के लिए शिकायत में भी यही मैटर डाल सकता है । बस डेंगू की जगह बीमारियों के फैलने का भय बना हुआ है लिख देना । आखरी लाइन भी एक सी है — …..कृपया आप इसके लिए अपने विभाग को जागरूक करे ।

बेटे को एक आवेदन पत्र को याद करने पर दूसरा मुफ्त बोनस में मिला । वैसे भी वो हमेशा भाग्य भरोसे एक ही आवेदन पत्र और एक ही निबंध याद करके जाता है । जिसका कोई नही उसका भगवान होता है । प्रश्नपत्र में “अथवा”के साथ दो विकल्पों में से प्रायः बेटे का इकलौता तैयार किया हुआ पत्र या निबंध आ ही जाते थे । मेरे इस आइडिया से उसका उत्साह दुगुना हो गया कि वो भी अपने स्कूल के उन महान हिंदी विशेषज्ञ बच्चों में शामिल हो सकता है जो दो पत्र याद करके आते है । खुश होकर गले लग गया “मम्मी दोनों आवेदन पत्र की लास्ट लाइन भी सेम टू सेम ।” उसने दोनों पत्र की अंतिम पंक्ति लिख कर दिखाया जो इस प्रकार थी “उममिद है आपका विभाग इस दीसा में ऊँचीत कारीवाई करेगा ।” मेरे द्वारा घबराते हुए गलत मात्राओं को चिन्हित कर सुधरवाने के बाद भी , मैं उसकी तैयारी से खौफजदा थी । हिंदी के पेपर के दिन जब बेटा स्कूल में होता है मैं पल पल घड़ी देखते बैठी रहती हूँ ..जाने क्या लिख रहा होगा ?? हे भगवान कौन सा पत्र आया होगा ??

बस से उतरते ही खुशी खुशी बोला कि “देखना इस बार शिकायती पत्र के पूरे 5 नम्बर मिलेंगे ।” मैंने उसे चूम लिया — आजा मेरे राजकुमार ।घर आकर प्रश्नपत्र देख तो मेरा जी धक से रह गया “आपके क्षेत्र में डाक वितरण में अनियमितताओं के लिए डाकपाल को शिकायत पत्र ।” प्रश्नपत्र पढ़कर सन्न रह गयी क्योकि मैंने तो ये कान्हा को पढ़ाया ही नही था — कान्हा तूने क्या लिखा बिट्टू ?? बड़े उत्साह से उछल उछल कर बताने लगा — हमारे क्षेत्र में नालियाँ बजबजा रही है। चारो तरफ गंगादि ही गंगादि है ।मम्मी आपने कहा था न कि लेटर के बीच में लिखा जाने वाला मैटर तो प्रश्न में ही आधा लिखा होता है । प्रश्न से ही पढ़कर आगे लिखा इसलिए हमारे क्षेत्र में डाक वितरण अनियमित है । कृपया दवा का छिड़काव करें और डाक वितरण नियमित करवाए ।मैंने खून का घूँट पीकर पूछा — डाक मतलब क्या होता है ?? वितरण का मतलब क्या है ?? उसने मासूम लेकिन सटीक जवाब दिया । ये वर्ड्स मैंने पहली बार सुना है ।आप बताइए ये शब्द “डाक” और “वितरण” कौन यूज करता है ?? मैं सोचने लगी सच तो बोल रहा है बोलचाल की भाषा में हम सरल शब्द ही उच्चारित करते है ।

पिछले साल बेटे को निबंध के लिए चार शीर्षक मिले । मैंने ” त्यौहारों का जीवन में महत्व” शीर्षक पर फिर चतुराई से काम लिया । थोड़ी मेहनत में शार्ट कट तरीका अपनाया — कान्हा देख बेटा एग्जाम में यदि पर्टिकुलर किसी त्यौहार का नाम भी लिख कर आ जाए तो …सपोज़ दिवाली , होली या राष्ट्रीय त्यौहार तो भी मैं तेरे लिए ऐसा मैटर लिख देती हूँ कि सभी में एक ही निबन्ध काम आ जाए ।

कान्हा को हिंदी के मामले में मेरी सुझाई कामचोरी बड़ी पसन्द आती है । देख बिट्टू फर्स्ट पैरा मैं ऐसा लिख देती हूँ जो किसी भी त्यौहार के निबंध में काम आ जाए । दो पंथ एक काज हुआ (कान्हा के किताब की लोकोक्ति) निबंध कुछ इस प्रकार था ……मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । उत्सवधर्मिता उसका स्वाभाविक गुण है ।त्यौहार मानव जीवन की नीरसता दूर करते है…. अरे अरे ! सुन ये उत्सवधर्मिता और स्वाभाविक की मात्रा तेरे लिए बहुत हो जाएगी । ये लाइन रहने दे । आगे लिख देती हूँ कि हमारी ऊबी हुई दिनचर्या , अरे यार ! “दिनचर्या” भी तेरे को टफ जाएगा हमारी ऊबी हुई जिंदगी में नया उत्साह लाती है । त्यौहारों में होने वाले मेलजोल पूरे साल हमें ऊर्जित रखते है ।कान्हा ध्यान से खुद नोट करने लगा ।वैसे भी वो पेपर के पहले ही दिन सिंसियर होता है । मम्मा आगे ??हाँ , देख ये सारी लाइंस किसी भी त्यौहार के इंट्रोडक्शन में चल जाएगी । बीच का पोर्शन तुझे थोड़ा चेंज करना होगा । दिवाली पर लिखने आए तो हम नए कपड़े पहनते है , फटाके जलाते है । होली हुआ तो रंग खेलते है । ये लाइन फिर दोनों में चल जाएगी कि इस दिन लोग एक दूसरे को बधाई देते है ।

फिर जो आगे लिखा रही हूँ किसी में भी निबंध में कॉपी पेस्ट चलेगा । इस दिन हम अपने परिवार , रिश्तेदारों से मिलते है , मिठाइयाँ खाते है ।इस तरह त्यौहार जीवन में रौनक बनाए रखते है और प्राचीन परम्पराओं और कथाओं को नव जीवन देते है । हमें त्यौहारों पर जुआ नही खेलना चाहिए ,।मदिरापान नही करना चाहिए इससे त्यौहार की गरिमा खत्म होती है ……..बिट्टू इस ट्रिक से पहली बार तेरा निबन्ध नही छूटेगा क्योकि तेरी मैडम ने कहा है कि त्यौहार का महत्व , दीपावली , 15 अगस्त । मतलब दो ऑप्शन में एक ऑप्शन त्योहार रहेगा ही दूसरा महात्मा गांधी , पोस्टमैन या कुछ भी लेकिन फेस्टिवल तो पक्का है । महात्मा गांधी के जीवन में इतनी मात्राएँ और यात्रायें याद करनी पड़ती । करमचंद्र गाँधी , पोरबंदर , पुतली बाई , शुरुवाती औपचारिक शिक्षा ,अफ्रीका ,वकालत जैसे शब्द कान्हा की क्षमता से बाहर थे । कस्तूरबा बाई में भी आधा स था सो त्यौहार पर ही तैयारी उचित लगी । त्यौहार में भी तीन विकल्प थे जिनमें कोई एक आता । मात्राओं की गलतियों के साथ 5 में 3 नम्बर ले आया है तो भी हम गरीबो के लिए ये नम्बर जरूरत से ज्यादा ही थे ।

दूसरे दिन कान्हा जी हिंदी का पेपर देकर लौटने पर स्कूल बस से उतरते ही बोले किसी भी त्यौहार पर निबंध नही आया । मैं दंग रह गयी। तेरी मैम ने चार टॉपिक दिए थे जिनमें से तीन त्यौहार थे । कान्हा ने कहा “आपने त्यौहार पर करवाया था और मैडम ने पर्व पर लिखने दे दिया ।” मुझे लगा किस दीवार पर अपना सर दे मारू लेकिन कान्हा ने अपनी बात जारी रखी । चिंता मत करो मम्मा मैंने अपने मन से बहुत अच्छा लिखा पर्व पर । मैंने शंकित आवाज़ में पूछा क्या लिखा तुमने ?? मैंने लिखा कि पर्व बादलों को रोककर बारिश करवाते है । पर्व पर सीढ़ीदार खेती होती है और लोग गर्मियों से बचने पर्व पर घूमने जाते है।स्वाभाविक था कि निबन्ध में 0/5 नम्बर मिले ।

वास्तव में बच्चों को जिस विषय में रुचि हो वही पढ़ने देना चाहिए । मेरे मैथ्स और कान्हा के हिंदी नम्बर देखकर तो यही समझ आता है 😂😂 । अपने बेटे के प्रेम में मुझे मैथ्स समझ आने लगा क्योकि मैंने यूट्यूब के वीडियो से उसे सिखाने के लिए समझा । कान्हा जी मैथ्स , फिजिक्स और इंग्लिश लिटरेचर में जीनियस है । कान्हा अब हिंदी कहानियों की किताब पढ़ने लगा है तो पहले से उसकी हिंदी भी बहुत सुधरी है । मैने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद दुबारा पढ़ाई करनी होगी कभी नही सोचा था । अब मैं बेटे की क्लास 8th की सहपाठी छात्रा हूँ फर्क इतना है कि यूनिफार्म पहनकर स्कूल नही जाती लेकिन एग्जाम का तनाव पहले से ज्यादा है । पिछले दो सालों में हम दोनों ने एक दूसरे की मदद से अपने हिंदी और मैथ्स का ज्ञान बहुत बेहतर किया है ।😊😊
एक बड़े होते बच्चें की मम्मा

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