देश

कश्मीर की तड़प सुनी,,,इसराइल का मॉडल क़ारगर साबित हो रहा है,,,#Kashmir Bleeds…

 

मुमकिन है आपने वागाह बोर्डेर ‘भारत -पाकिस्तान सरहद’ पर होने वाली परेड को देखा होगा, जिसने वहां जा कर न देखा हो तभी टीवी पर तो देखा ही होगा,,,दोनों देश को बाँटने वाला गेट खुलता है,,,एक भारतीय सैनिक इधर से मार्च करता हुआ आगे बढ़ता है, उधर से पाकिस्तान का सैनिक मार्च करते हुए आता है, दोनों सैनिकों की लम्बी लम्बी कानों तक मूंछें होती हैं, पाकिस्तानी सैनिक की दाढ़ी और मूंछें दोनों होती हैं, इन सैनिकों के सर पर लम्बी कलगी की पगड़ी होती है, इनके बूट चमकदार, इनकी कमीज़ और पतलून एक दम साफ़ सुथरी होतीं हैं,,,,ये सैनिक कदम चाल से चलते हुए एक दूसरे की तरफ बढ़ते हैं और करीब आने पर एक साथ गरजदार आवाज़ में ‘नीचे से ऊपर तक ज़ोर लगाते हुए अपनी सीधी टांग सर से ऊपर तक उठाने के बाद पूरी ताक़त से ज़मीन पर मारता है, इन सैनिकों की आँखें फटी हुई होती हैं, ये एक दूसरे से मुक़ाबला करते नज़र आते हैं, इन के हाव भाव, आखों की त्योरियां, फटी आँखें, बुलंद आवाज़,,,ये लोग सपने में भी खुद को ऐसे ही चीखते – चिल्लाते देखते होंगे, इनका मानसिक संतुलन सही नहीं होगा, ये ज़ोर से चीखने – चिल्लाने की रोज़ाना की बे ज़रूरत आदत की वजह से खुद की तबियत में चिड़चिड़ापन पाते होंगे, ये लोग अपने बच्चों और परिवार से बहुत लगाव रखने के बावजूद घरवालों की नज़रों में अहमियत नहीं रखते होंगे,,,इन को इस तरह परेड क्यों करवाई जाती है, क्या और कोई अच्छा, आसान, प्यारा सा तरीका नहीं हो सकता है,,,जैसे कि उधर का सैनिक अपनी यूनिफार्म में और इधर का सैनिक अपनी यूनिफार्म में,,,आगे बढ़ते हैं,,,,करीब आते हैं,,,,थम,,,,सलामी,,,और गले मिलते हैं,,,तभी तराना गूंजे लगे,,,,ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद,,,,ऐय मुहब्बत ज़िंदाबाद,,,,\

 

पूर्व सांसद और केंद्रीय गृह राज्यमंत्री चिन्मयानंद के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाने वाली पीड़िता सोमवार को मीडिया के सामने आई. उसने संवाददाता सम्मेलन कर आरोप लगाया कि भाजपा नेता चिन्मयानंद ने उसके साथ बलात्कार किया और एक साल तक प्रताड़ित किया है, उसने दिल्ली में शिकायत दर्ज कराई है, पीड़िता का आरोप है कि शाहजहांपुर की पुलिस शिकायत दर्ज नहीं कर रही और उसके पिता को भी धमकाया जा रहा है,,,ये मामला पूर्व सांसद और केंद्रीय गृह राज्यमंत्री के खिलाफ है, जो जितना बड़ा नज़र आता है वो उतना ही गहरे गंदे गड्ढे में धंसा हुआ है, हुकूमत में ऐसे लोगों का आ जाना जो हत्यारे हैं, बलात्कारी हैं, अपहरणकर्ता हैं, सामूहिक नरसंहार के हीरो हैं,,,,अच्छे दिन आ गए हैं का अहसास दिलाता है,,,

ये विशवास रखिये, कहा हमेशा यही जायेगा कि ”हमारी पार्टी ऐसे किसी भी व्यक्ति का बचाव नहीं करती है’,,,हम इंसान हैं, हैं, हम जानवर भी हैं, जो हमारे कर्म बताते हैं,,,

 

दुनियां ने पिछले 40 वर्षों में बहुत तरक्की की है, भारत ने भी बहुत विकास किया है, 40 वर्ष पहले यहाँ अनाज नहीं होता था, कपडे नहीं होते थे, पैरों में चप्पलें नहीं होती थीं,,,तब का भारत ग़रीब था मगर मज़बूत था, आज भारत चंद्रयान की उड़ान भरता है, इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइल बना रहा है, एक राज्य की जनता को बंधक बनता है, सड़क चलते को बे वजह मार दिया जाता है, गौ माता के बच्चे इंसानों की जान ले लेते हैं, ऐसा समाज इंसानों का कभी नहीं होता है ये सब ‘जानवरों’ की दुनियां में होता है जिसे जंगल कहते हैं, जंगलराज कहते हैं, आज का भारतीय असहाय है, और भारत मजबूर है,,,

जो पैसा जनता के ऊपर खर्च होना चाहिए, ग़रीब तीसरी दुनियां के विकसित देश उस पैसे को हथियार खरीदने में उड़ा देते हैं, काल्पनिक युद्ध का वातावण बनाया जाता है, आतंकवाद फैलाया जाता है और इससे लड़ने के लिए हथियारों की ज़रूरत बता दी जाती है,,,

भारत बहुत बड़ा देश है, केरल इसराइल से तीन गुना बड़ा है, बंगलौर की आबादी इसराइल के बराबर है,,,इसराइल अगर चाहे कि उसे दुनियां को इसी जगह रोकना है तो वो रोक सकता है, इसराइल चाहे वो कर लेता है,,,है न हैरत की बात,,,दुनियां की बैंकिंग यहूदी कण्ट्रोल में है, पूरी दुनियां का बड़ा/असरदार मीडिया यहूदी कण्ट्रोल में है,,,भारत जैसा विशाल देश इसराइल का मोहताज है, अरब देशों को कई बार कुचल चुका है इसराइल,,,भारतीय वायु सेना के विमान, उनके हथियार, उनके पायलटों की ट्रेनिंग इसराइल ने दी है, कुछ को फ्रांस ने,,,

पूरी दुनियां में मारा मारी हमेशा से चलती रही है, शातिर लोग हमेशा भोले भाले, सीधे-साधे लोगों पर राज करते रहे हैं, इंसानों की जिंदिगी में ज़हर घोलते रहे हैं,,,ये दुनियां बड़ी खूबसूरत है, यहाँ हर तरफ मुहब्बत की निशानियां मौजूद हैं, मगर लोगों को लड़ाई, झगड़ा, फिक्रें, तनाव, उलझनों में ऐसा उलझाया है कि किसी के पास मुहब्बत के लिए वक़्त ही नहीं बचा है,,,

अफगानिस्तान में अब इस्लामिक स्टेट भी सक्रिय है. देश के पूर्व में पाकिस्तान से सटी सीमा पर कुनार के जंगलों में इस्लामिक स्टेट की पकड़ मजबूत हो चुकी है. आईएस 2015 से वहां है. कहा जा रहा है कि तालिबान अगर कमजोर हुआ तो इस्लामिक स्टेट ताकतवर होगा.

अफगानिस्तान में बढ़ता आईएस का दखल कितना खतरनाक है

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तालिबान और अमेरिका के बीच दोहा में शांति वार्ता चल रही है. लेकिन इस्लामिक स्टेट अफगानिस्तान की शांति को भंग करने में जुटा है. अफगानिस्तान में आईएस का फैलना भारत और बाकी दक्षिण एशिया के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है.

17 अगस्त को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक शादी समारोह में हुए आत्मघाती हमले में 63 लोगों की मौत हो गई. इस धमाके की जिम्मेदारी आईएस से जुड़े हुए एक आतंकी संगठन ने ली है. यह शादी हजारा शिया समुदाय के लोगों की थी. इस समुदाय के लोग सुन्नी-बहुल अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अकसर कट्टरपंथियों के निशाने पर होते हैं. आईएस भी इन्हें निशाना बनाकर हमले करता रहता है.

इस हमले के चश्मदीद दूल्हे के एक रिश्तेदार ने बताया था कि, “हमारे देश में कुछ भी सुरक्षित नहीं है. वो हमारे स्कूलों, स्पोर्ट्स क्लबों को निशाना बनाते रहे हैं. अब वो हमारी शादियों में भी बम धमाके करने लगे हैं.” इस हमले के बाद पूरे देश में आक्रोश का माहौल है. अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने कहा कि वो अपने देश से आईएस का सफाया कर देंगे. लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि आईएस अफगानिस्तान में और मजबूत हो रहा है. अब इसके साथ कई सारे तालिबान लड़ाके भी जुड़ सकते हैं. कई सारे तालिबानी जिहादी दोहा में अमेरिका के साथ चल रही तालिबान की शांति वार्ता से खुश नहीं हैं. हालांकि तालिबान ने इस हमले की निंदा की है और इसमें किसी भी तरह शामिल होने से इंकार किया है.

पैर जमा रहा है आईएस
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अफगानिस्तान में अभी तक आईएस में शामिल लोग पहले पाकिस्तानी तालिबान में रहे हैं. ये लोग तालिबान छोड़कर आईएस में भर्ती हो गए. तालिबान और आईएस के बीच अफगानिस्तान में 2014 के आखिर से ही लड़ाई जारी है. आईएस ने जनवरी 2015 में अफगानिस्तान के पूर्वी हिस्से में अपना दबदबा बना लिया था. आईएस और तालिबान दोनों ही अफगानी सरकार के विरोधी हैं. लेकिन इन दोनों की विचारधारा और नेतृत्व में मतभेद हैं. इसी के चलते दोनों गुटों के बीच हिंसक झड़पें होती रहती हैं. दोनों ही गुट सरकार को हटाकर अफगानिस्तान की सत्ता पर नियंत्रण करना चाहते हैं.

अगर अफगानिस्तान में देखा जाए तो तालिबान आईएस से ज्यादा ताकतवर है. तालिबान अपने आप को मुख्य विपक्षी इस्लामिक समूह बताता है. तालिबान का लक्ष्य पश्चिमी देशों की कथित समर्थक सरकार को बर्खास्त कर अफगानिस्तान में इस्लामिक राज्य की स्थापना करना है. जबकि आईएस का लक्ष्य अफगानिस्तान को दक्षिण एशिया के लिए अपना बेस बनाने का है. जिससे वो इस इलाके के बाकी देशों में अपना विस्तार कर सके. काबुल में रहने वाले अफगानी राजनीतिक विश्लेषक युनूस फकूर कहते हैं, “आईएस की करतूतें इतनी हिंसक हैं कि दोनों की तुलना करने पर लोग तालिबान को बेहतर समझते हैं.”

सांप्रदायिक बंटवारा
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शादी में हुआ बम धमाका आईएस का शिया समुदाय पर पहला हमला नहीं है. अफगानिस्तान में आईएस ने शियाओं पर 2017 और 2018 में कई बार हमले किए. अधिकांश हमले शियाओं के धार्मिक स्थलों पर किए गए जिनमें सैकड़ों लोग मारे गए. काबुल में रहने वाले सुरक्षा विश्लेषक वाहिद मुजदाह कहते हैं कि आईएस कहीं ना कहीं अफगानिस्तान के लोगों के बीच सांप्रदायिक बंटवारा करना चाहता है. वो कहते है, “अफगानिस्तान में पैर जमाने में आईएस को तालिबान से कड़ी चुनौती मिल रही है. अगर आईएस को यहां खुद को स्थापित करना है तो उसे स्थानीय सुन्नी कट्टरपंथियों की मदद चाहिए. इसलिए वो लगातार शियाओं पर हमले कर खुद को तालिबान से अलग दिखाना चाह रहा है.”

अफगानिस्तान के सुरक्षा जानकार आशंका जता रहे हैं कि आईएस देश का सांप्रदायिक बंटवारा कर दो हिस्सों में तोड़ सकता है. हालांकि मुजदाह इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते. वो कहते हैं, “अफगानी शियाओं पर हर हमले के बाद इस्लाम के हर पंथ के धार्मिक नेता पीड़ितों के पक्ष में खड़े होते हैं और ऐसे हमलों की निंदा करते हैं. लेकिन अगर सरकार ने ऐसे हमलों को रोकने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए तो एक तो बंटवारे की आशंका गहरा सकती है.”

मध्य पूर्व से दक्षिण एशिया की ओर
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इराक और सीरिया में भारी नुकसान उठाने के बाद आईएस ने 2017 से अफगानिस्तान की ओर ध्यान देना शुरू किया. इराक और सीरिया में आईएस की हार के बाद जानकारों ने आशंका जताई थी कि बड़ी संख्या में आईएस के लड़ाके अफगानिस्तान या पाकिस्तान जा सकते हैं. हाइडलबर्ग यूनिवर्सिटी में काम कर रहे दक्षिण एशिया विशेषज्ञ जीगफ्रीड ओ वोल्फ कहते हैं, “इराक और सीरिया में हारने के बाद अब अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आईएस की गतिविधियों में बढ़ोत्तरी दिख सकती है. क्योंकि आईएस को अपनी आतंकी वारदातों को अंजाम देने के लिए एक नई जगह की जरूरत होगी.”

आईएस की मौजूदगी अब अफगानिस्तान के नरसंहार तक ही सीमित नहीं रह गई है. दूसरे राज्यों में भी आईएस ने अपनी पकड़ मजबूत की है. सुरक्षा के हिसाब से सुरक्षित माने जाने वाले उत्तरी इलाकों में भी इसकी मौजूदगी है. आईएस या आईएस समर्थक समूहों के हमले पाकिस्तान में भी हुए हैं. जानकारों का मानना है कि आईएस को पाकिस्तानी कट्टरपंथी संगठनों का समर्थन मिल सकता है क्योंकि वो शियाओं के खिलाफ हैं और पाकिस्तान में ईरान के प्रभाव का विरोध करते हैं. अफगानी सरकार हमेशा से पाकिस्तान पर तालिबान का समर्थन करने और दूसरे चरमपंथी समूहों की मदद से वहां की सरकार को अस्थिर करने की कोशिश का आरोप लगाती रही है.

जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान फिलहाल आईएस को अपना सहयोगी नहीं मानता है. वो नहीं मानता कि आईएस दक्षिण एशिया में पाकिस्तान की कोई मदद कर सकता है. लेकिन हो सकता है भविष्य में चीजें बदल जाएं क्योंकि सऊदी की वहाबी विचारधारा दोनों को एकजुट करने का काम कर सकती है. आईएस का पाकिस्तान और अफगानिस्तान में प्रभुत्व बढ़ना भारत के लिए भी खतरा हो सकता है.

अफ़्ग़ानिस्तान में क्या होने जा रहा है

अफ़ग़ान तालिबान और अमेरिका की शांति वार्ता को ट्रम्प ने रद्द कर दिया है, इससे रूस सबसे ज़ियादा खुश है, रूस अमेरिका से पुराने ज़ख्मों का हिसाब बरारबर करना चाहता है, वो चाहता है कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में फंसा रहे, इस बीच खबर बहुत बड़ी यह है कि अमेरिका बहुत जल्दी ही ISIS/दाइश को नए रूप में सामने लाने वाला है, जब दाइश अग़निस्तान में तालिबान से युद्ध करेंगे उस समय रूस तालिबान के साथ यहाँ की जंग में सीधे सीधे एंट्री करेगा तालिबान के योद्धा रूस के टैंकों पर सवार हो कर युद्ध करते नज़र आएंगे,

पाकिस्तान अमेरिका से फिलहाल नाराज़ है, कश्मीर पर भारत की कार्यवाही में पाकिस्तान का मानना है कि भारत ने कश्मीर पर जो कार्यवाही की है वो अमेरिका और सऊदी अरब से ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद की है, पाकिस्तान को सऊदी अरब की तरफ से ज़बरदस्त झटका लगा है, अरब के देश कश्मीर मामले में पाकिस्तान को साफ़ हिदायत दे चुके हैं कि पाकिस्तान कश्मीर के मसले को मुस्लिम उम्मत का मसला न बनाये, ये भारत का अंदरूनी मामला है

फ्रांस, भारत और इसराइल का मज़बूत गठजोड़ अफ़ग़ानिस्तान में अपने अपने एजेंडे/हितों के लिए वहां बना रहना चाहते हैं, अब मसला ये है कि अमेरिका क्या अफ़ग़ानिस्तान को छोड़कर कश्मीर के मसले पर आगे बढ़ेगा, चीन का सिल्क रुट/सी पैक को नाकाम करना अमेरकी पॉलिसी का हिस्सा है, भारत भी चीन की इस योजना से खफा है, तो क्या अफ़ग़ानिस्तान के साथ साथ कश्मीर भी युद्ध का मैदान बनने वाला है?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ट्वीट कर अफ़गान तालिबान और अमेरिका की शांति वार्ता को रद्द करने का एलान किया है, हम ये फरवरी के महिने से लगातार लिख रहे हैं हैं कि मिडल ईस्ट और भारतीय उप महादीप में जो बड़ी हलचल और घटनाएं घट रही हैं उनका असल केंद्र अफ़ग़ानिस्तान है,

अफ़ग़ानिस्तान में भारत, ईरान, रूस, चीन, सऊदी अरब, UAE, UK, फ्रांस मुख्य प्लयेर हैं जो वहां अपने अपने हित लिए हुए बैठे हैं, यहाँ पाकिस्तान की भूमिका परदे के पीछे से मोहरे आगे पीछे बढ़ाने की है, अमेरिका अफगानिस्तान के युद्ध से खुद को बाहर निकालना चाहता है, इसके लिए उसकी तरफ से अमेरिका के विशेष दूत जलमय ख़लीलज़ाद वार्ता की कमान संभाले हुए हैं, क़तर में 9 राउंड की वार्ता होने के बाद समझौता लगभग तैय्यार हो चुका था, समझौते का ड्राफ्ट पाकिस्तान, चीन, ईरान और रूस को दिखाया जा चुका था, केवल इस समझौते पर दस्तखत होना बाकी थे जोकि उम्मीद जताई जा रही थी कि वो भी जल्द होने वाले थे इस बीच अफ़ग़ान सदर अशरफ गनी इस समझौते से खुश नहीं थे, वो तालिबान को सत्ता में वापस लाने के आलावा अमेरिका के बाहर हो जाने के बाद खुद की हुकूमत के लिए खतरा देख रहे थे, अफगान सदर ने एक दिन पहले अपनी अमेरिकी यात्रा भी इस नाराज़गी के चलते रद्द कर दी थी


इन सब के परे अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान और अमेरिका के बीच समझौता न हो ये कोशिश भी की जा रही थी, ये कोशिश उन देशों की तरफ से की जा रही थी जिनके बहुत सारे असासे/एसिटस अग़निस्तान में मौजूद हैं, जिनका पूरा ख़ुफ़िया तंत्र वहां बैठ कर कई देशों के मामलों में दखल देता है, उन देशों में आतंकवाद, धमाके, हत्याएं आदि करवाता है

अफगानिस्तान अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण विश्व ख़ास कर एशिया में बहुत अहमियत रखता है, दरअसल यहाँ बहुत ही शातिराना चालें चली जा रही हैं, अगर अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से जाता है तो वहां चीन और रूस अपना वजूद कायम कर लेंगे, साथ ही पाकिस्तान की पोजीशन बहुत मज़बूत हो जाएगी, चीन का प्रोजेक्ट सी -पैक अफगानिस्तान और पाकिस्तान से हो कर गुज़र रहा है, रूस के लिए अफ़ग़ानिस्तान की अहमियत अरब को लेकर है वो यहाँ रह कर अरब के मामलात पर ज़यादा तवज्जो दे सकता है वहीँ, इसराइल, फ्रांस, सऊदी अरब, UAE और भारत नहीं चाहते कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से जाए

अमेरिका को चाहिए था वक़्त
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तालिबान से शांति वार्ता शुरू करने में अमेरिका की बड़ी चाल छुपी है, इराक, सीरिया, यमन में करारी हार के बाद अमेरिका ने वहां से दाइश के जंगजुओं को अपने हेलीकॉप्टरों में भर भर कर सुरक्षित जगहों जैसे इसराइल, फ्रांस, अफ़ग़ानिस्तान में भेज दिया था, इराक और सीरिया से दाइश का सफाया हो गया, कभी सोचा है कि दाइश कहाँ ग़ायब हो गए?

हारता देख अमेरिका, इसराइल और सऊदी अरब ने युद्ध नीति में भारी परवर्तन किया है, अब दाइश को नए तेवरों के साथ फिर से लॉन्च करने की तैयारी चल रही है, इन्हें ज़बरदस्त ट्रेनिंग और हथियार दिए गए हैं, यह अब तक के इस धरती पर सबसे खूंखार योद्धा के रूप में पेश किये जाने वाले हैं, दाइश के इन खूंखार लड़ाकों को अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के खिलाफ कार्यवाही करने का टास्क दिया जायेगा, यहाँ ये लोग अफ़ग़निस्तान में तालिबान के लड़ाकों की निर्ममता से हत्याएं करेंगे, उनके वीडियो वायरल किये जाया करेंगे, वहीँ पाकिस्तान के अंदर यह लोग सरकारी ठिकानों और सेना को निशाना बनाया करेंगे
जानकार सूत्रों के मुताबिक फ्रांस, इसराइल और UK में दाइश के नए कैडर ट्रेनिंग आदि के बाद मैदान में उतरने के लिए तैय्यार बैठे हैं, अब इनको कब इनकी नौकरी पर भेजा जायेगा इसका फैसला अमेरिकी पेंटागॉन को करना है,

अफगानिस्तान के अंदर घटने वाली घटनाओं का सम्बन्ध कई देशों से है, यही नहीं अफगानिस्तान की आड़ में और भी बहुत से कुकर्म होते रहे हैं, इस समय दुनियां दो बड़े ब्लॉक्स में बंटी हुई है


– एक ब्लॉक का मुखिया है अमेरिका, इसमें सऊदी अरब, इसराइल, भारत, फ्रांस, UK और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं
– दूसरा ग्रुप है रूस का जिसमे चीन, ईरान, उत्तर कोरिया, पाकिस्तान, सीरिया, तुर्की शामिल हैं

पुलवामा में भारतीय सेना के ऊपर आत्मघाती हमला हुआ था जिसमे 40 से अधिक सैनिकों की मौत हुई थी, यह हमला 14 फरवरी को हुआ था, 11 फरवरी को नेतन्याहू भारत की यात्रा पर आने वाला था लेकिन उसने वो यात्रा रद्द कर दी थी, 13 फरवरी को ईरान की सेना पर आत्मघाती हमला हुआ था जिसमे 27 ईरानी सैनिकों की मौत हुई थी, ईरान ने उस हमले के लिए पाकिस्तान पर आरोप लगाया था, भारत ने पुलवामा हमले के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया था,

फिर श्रीलंका के अंदर ईसाई समुदाय के धार्मिक स्थलों पर सीरियल ब्लास्ट हुए थे, श्रीलंका के हमलों के लिए भारत के मीडिया ने जिहादी मुसलमानों को ज़िम्मेदार बताया था, बाद में श्रीलंका के राष्ट्रपति ने बयान दिया था कि हमले ड्रग तस्करों ने अंजाम दिलवाये थे

भारत में लिट्टे, पूर्वोत्तर के कुछ आतंकवादी ग्रुप ही आत्मघाती हमले करने में माहिर हैं, लिट्टे अब रहा नहीं, पूर्वोत्तर के आतंकवादी असम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा आदि इलाकों में अपनी एक्टिविटी सीमित रखते हैं, इनकी रीच बढ़त अधिक नहीं है

पुलवामा हो या ईरान का आतंकवादी हमला, दोनों ही जगह आत्मघाती हमले हुए थे, इतने बड़े हमले करने की छमता सामान्य आतंकवादी समूह में नहीं होती है, यहाँ पता नहीं क्यों किसी ने भी एक बार भी ”दाइश” की बात नहीं की थी

फ्रांस की ब्लैक वॉटर, मोसाद के यहूदियों को मुस्लिम हुलिया के साथ तैयार किया जा रहा है, यह लोग ‘दाइश’ की तरफ से मुसलमान बन कर खून बहाएंगे, अबू बक्र अल बगदादी को अमेरिका ने सुरक्षित रखा हुआ है, भारतीय मीडिया का हीरो बग़दादी बहुत जल्द सामने लाया जायेगा, वो अपने दाइश के लोगों को युद्ध करने और इस्लामिक रियासत क़ायम करने का फतवा देता नज़र आएगा,,,बग़दादी इसराइल का ख़ास वफादार है, यहूदी प्रोपेगंडा मशीन फिर इस्लाम और मुसलमानों को आतंकवादी बता कर अपने नए लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए ये हथकंडा अपनायेगा, भारत का मीडिया इसराइल के एजेंडे को हमशा बहुत सक्रियता के साथ फैलता रहा है, उसे फिर से काम मिल जायेगा

हाल के कुछ सप्ताह के भीतर ईरान और भारत के रिश्तों में कड़वाहट पैदा हुई है, उधर ईरान और पाकिस्तान नज़दीक आये हैं, ईरान अमेरिका के टारगेट पर है, रूस कह चुका है कि ईरान पर हमला रूस पर हमला माना जायेगा,,,मैथमैटिकल इक्वेशन को देख कर तस्वीर साफ़ नज़र आती है, कि ”नया दाइश/खुरसान दाइश” क्यों और किस किस की मदद से बनाया गया है

अफगानिस्तान ऐसा देश है जहाँ अमन आसानी से कभी भी कायम नहीं हुआ है, यहाँ की जनता लड़ते लड़ते मर जाती है और फिर नयी नस्ल खड़ी हो जाती है, वो लड़ती है, लड़ाई जारी है, अमन की बात और आस फ़िल वक़्त करना/सोचना जुर्म है,,,अभी यहाँ से आगे कश्मीर भी है, कश्मीर के अंदर ज्वालामुखी धधक रहा है, वहां कर्फ्यु हटने के बाद पता चलेगा कि हालात कैसे रहते हैं,,,मगर मुझे ज़रा भी उम्मीद नहीं है कि अब कुछ सालों शायद कई और दशकों तक कश्मीर में अमन हो पायेगा,,,,मर्ज़ बढ़ता ही गया,,,जियूँ जियूँ दवा की,,,हुकूमतें कभी भी आम आदमी की नहीं होती हैं, वो अपनों के लिए और ख़ास लोगों के लिए होती हैं,,,आम आदमी का जीवन इस धरती पर भारी बोझ जैसा लगता है इन ज़ालिम सत्ता के रोगियों को,,,

सऊदी अरब एक बड़ा मुस्लिम देश है, इसके पास धन की कमी नहीं है मगर यह देश हमेशा अपने पैसे के बल पर अपने अत्याचार जारी रखे रहा और अनगिनत लोगों को मारवा डाला, आज भी यमन में सऊदी अरब खून की होली खेल रहा है, सद्दाम हुसैन, कर्नल गद्दाफी, मुर्सी की हत्याएं सऊदी अरब ने अपने अमेरिकी और इस्राइली मित्रों के साथ मिल कर करवा डालीं,,,सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने साफ़ कर दिया है कि ‘कश्मीर का मसला मुस्लिम उम्मत’ का मसला नहीं है, अब इनकी बाला से कश्मीरी मरें तो मरें,,,

अगले कुछ महिनों के अंदर एक बड़ी जंग होने के इमकान हैं, यह जंग या तो कश्मीर को लेकर भारत – पाकिस्तान के बीच होगी या फिर टैक्टिस वार होगी ईरान के खिलाफ, जंग कहीं भी हो ज़द में आयेगा अफ़ग़ानिस्तान, वहां अगर तालिबान से अमेरका का समझौता नहीं हुआ तो बहुत बड़े खूनखराबे होंगे, जोकि भारत के लिए फायदे का सौदा साबित होंगे, पाकिस्तान अपनी सेना अफगान बोर्डेर से नहीं हटा सकेगा, इसराइल, फ्रांस के लिए बड़े हथियारों के टेंडर मिल जायेंगे, कश्मीर की तड़प सुनाई देती है,,,,इसराइल का मॉडल कारगर साबित हो रहा है,,,,

– परवेज़ ख़ान

Indian troops martyred 95,238 Kashmiris since January 1989: report

ISLAMABAD: Indian troops, in their unabated acts of state terrorism in occupied Kashmir, martyred 95,238 innocent Kashmiris, including 7,120 in custody, since January 1989 till date.

A report released by the Research Section of Kashmir Media Service on the occasion of the World Human Rights Day, today, revealed that these killings rendered 22,894 women widowed and 107,551 children orphaned.

The report said that the troops molested or disgraced 11,107 women and damaged 109,191 residential houses and other structures during the period.

Indian troops and police subjected at least 8,000 people to custodial disappearance in that time.

The report pointed out that during this year alone, Indian forces and police martyred 350 Kashmiris including PhD scholars, engineering students and Hurriyat leaders. Among those martyred were Professor Dr Muhammad Rafi Butt, Dr Manan Bashir Wani, Dr Sabzar Ahmad Sofi , Dr Abdul Ahad Ganai, M-Phil student Aedimad Fayaz Mali, Muhammad Esha Fazali (24-year-old engineering graduate), Syed Oais Shafi Shah (engineering graduate ), Aasif Ahmad Malik (28-year old B-Tech engineer), THK leader Mir Hafizulla, Muslim League leader Tariq Ahmad Ganie, Hurriyat leader Mohammad Yousuf Rather alias Yousuf Nadeem and THK leader Hakim-ul-Rehman Sultani.

Over 2,348 people were arrested including minor boys, youth, students, women and Hurriyat leaders and activists.

Resistance leaders including Shabbir Ahmad Shah, Nayeem Ahmad Khan, Syeda Aasiya Andrabi, Fehmeeda Sofi, Nahida Nasreen, Altaf Ahmed Shah, Aiyaz Muhammad Akbar, Peer Saifullah, Raja Merajuddin Kalwal, Shahid-ul Islam, Farooq Ahmad Dar alias Bitta Karate, Mohammad Aslam Wani, businessman Zahoor Watali, Syed Shahid Shah and Ghulam Muhammed Butt have been detained in Delhi’s Tihar jail.

Over 500 people including Hurriyat leaders Masarrat Aalam Butt, Ghulam Muhammad Khan Sopori, Mushtaqul Islam, Maulana Barkati, Muhammad Yousuf Mir, Farooq Ahmad Tawheedi, Mohammad Yusuf Falahi, Hakim Abdu Rashid, Gulzar Ahmad Gulzar, Nisar Hussain Rather, Umar Adil Dar, Hakim Showkat, Merajudin Nada, Zahoor Ahmad, Sirajidin, Shakeel Ahmad Bakshi, Mohmmad Amin Mangloo, Abdul Ghani Butt, Ghulam Muhideen Peer, Assadullah Parray, Fehrooz Ahmad Khan are languishing in different jails across the occupied valley and in India under the black law, Public Safety Act.

The report maintained that the puppet authorities had kept the All Parties Hurriyat Conference Chairman Syed Ali Gilani, Mirwaiz Umar Farooq, Muhammad Yasin Malik, Mohammad Ashraf Sehrai, Zafar Akbar Butt, Mukhtar Ahmad Waza, Hilal Ahmad War, Bilal Ahmad Siddiqi under detention either in their houses or in jails, time and again. They were not allowed to carry out their political activities and were also not allowed to offer Friday prayers and address public meetings.

The report said that after the extrajudicial killing of popular youth leader, Burhan Wani, on July 8, 2016, over 846 people have been killed and more than 25,909 injured so far due to the firing of bullets, pellets, PAVA and teargas shells by Indian troops, paramilitary forces and police on peaceful protesters and mourners.

Eyesight of over 2,830 young people has been partially damaged due to the pellet firing by Indian forces.

Meanwhile, Hurriyat leaders in their separate statements have appealed to the United Nations and other human rights organisations to send their teams to monitor the plight of human rights in occupied Kashmir.

source – www.geo.tv

Kashmir Bleeds

August 11, 2019
Kiran Butt

Last week as soon as the news came out of Kashmir that tourists are being requested to vacate and more than 100,000 additional troops are being deployed in the valley which already has 700,000 troops and is the most militarized zone in the world, horrors of something bad to the bone happening started floating in everyone’s mind.

On Monday, August the 5th India revokes Article 370 in Raj Sabha which was the special status of Jammu and Kashmir after their independence from the British rule in 1947.

In response to this move, Pakistan expelled the Indian envoy and cut all the bilateral ties with India and approached different international platforms to register their protest.

But being a Kashmiri myself all the reactions and uproar was the very secondary thing for me. I was concerned about all my friends and loved ones more than diplomatic reactions. I left messages to everyone in my contact list to get the updates but no one responded.

Finally I got hold on a journalist living in Jammu (cannot mention name due to security purpose) and asked about my journalist friends the first thing she said while sobbing was “Kiran I was not expecting this, they have ruined it. I cannot share any information. I even don’t know where my staff is right now. People are terrified. My valley is burning and there is no one who could save us. There are pregnant women who are rushing to the state hospitals before time and people have stocked up all the medicines and food supplies. We don’t know what is happening and what will happen?”

That phone call was the moment which I pray never should have happened. But we cannot keep our eyes shut. I am still not able to get any information about my friends. Indian paramilitary forces even have erected barricades every few hundred meters across Srinagar city to halt civilian movement.

India’s RSS-headed government has already done so many human rights violations inside India what can we expect from them when it comes to Kashmir now. There is one soldier for every 08 Kashmiris. All the international organizations have condemned Modi’s decision and after his not so heroic speech many questions are rising. There is a list of human rights violations happening in Kashmir which includes freedom of speech, lynching, pellet guns, gang rapes by Indian forces, etc. All these violations and Modi is offering Kashmiri products to the exporters to boost the failing Indian economy. This shows that the Modi govt just needs Kashmir, not the Kashmiris. This is the height of desperation to cover your own failures and policies.

In which state of mind is Mr. Modi in? And the horrors are not just ending there. Eid is just around the corner and there are no official words from Indian authorities about lifting the ban. They did not even lift the ban on Friday prayer.
Well according to their own claim if India is the most secular country in the world and their extremist political leaders think that their so-called golden plan is going to work for Kashmiris, why aren’t they lifting up the curfew and letting the world hear the choice of people who have a birth right to freedom. Let them reply to your Eid wishes, I know that reply will not disappoint you.

All over the world people are comparing this heinous move to Israel’s brutalities in Palestine but I will say that it is worse than that. Deciding the fate of almost 13 million people under dark clouds of lockdown shows the real, not so secular face of India.

As per sources, people are worried in their homes that what is going to happen with the future of their next generation. The network is down, the broadcasts suspended and even there have been no newspaper publications in kashmir for the past couple of days

The question really is now, if Hindutva extremists are planning a total ethnic cleansing of Kashmiris and the whole world is silent on this bloodshed. Where are we heading with this?

Is Modi govt going to repeat the Gujrat genocide, in which they brutally killed thousands of Muslims and no one raised their voice?

Kashmiris are waiting for someone who could help them in saving their existence. In this matter, every second counts and we cannot just use hashtags or change our display pictures to show solidarity with Kashmiris. We cannot stay silent for a long time on this or else the paradise on earth, the scenic valley of Kashmir will burn in front of our eyes and we will be just looking towards more condemnations and concerns.

The Rise of Afghanistan’s Taliban

Southern grievances are at a tipping point, and if Kabul or Washington won’t address them, the Taliban—or other armed groups—certainly will.

 

by Masood Ahmad Azizi

The latest round of U.S.-Taliban talks appears to be heading to a framework for peace. In exchange for a timeline for the withdrawal of U.S. forces, the Taliban have agreed to a guarantee that Afghan territory will not be used to sponsor terrorist groups or stage attacks against the United States or its allies. This would be followed by a nationwide ceasefire and the start of an intra-Afghan dialogue, leading to the release of prisoners from both sides.

For all the progress, the peace talks face criticism for excluding the Afghan government. The Taliban have consistently refused to recognize Afghanistan’s elected government—calling it a U.S. puppet—and demanded to negotiate solely with the United States. But intra-Afghan negotiations between the Taliban and Afghan leadership will only begin once a deal with the United States is agreed upon.

The ugly truth is that the Taliban have a legitimate claim of representing a part of Afghan society. The southern provinces of Helmand, Oruzgan, Zabul and Kandahar—part of the Pashtun heartland—does not fully reject the Taliban and provides 80 percent of its fighters. It has also become a fertile recruiting ground for Al Qaeda as well as Daesh.

It is widely accepted that anger and resentment throughout the south was the catalyst for the 2005 resurgence of the Taliban. Capitalizing on mistakes made by both the Afghan government and the Americans, the Taliban have waged a formidable military comeback, which has given the terror group considerable leverage at the negotiating table. Central to its argument is a compelling claim that the Taliban, not the elected Afghan government, speak for the south.

Southern grievances stem from persistent underrepresentation in successive administrations. After the ouster of the Taliban in 2001, Kandahar-born former President Hamid Karzai, perhaps in the interest of national unity, often neglected the south in order to win over other parts of the country. Successive governments followed suit.

In Kabul, decision-making bodies are still mostly staffed with Afghan returnees from abroad. While the returnees may be highly educated and qualified, they lack the nuanced understanding of the country’s ground realities especially along the so-called Pashtun belt in the south. Southerners have rarely held any of the key ministries, and only the Ministry of Border and Tribal Affairs since 2017. President Ashraf Ghani, although ethnically Pashtun, is widely criticized for failing to understand the social fabric of southern Afghanistan and as a result has been unable to fully address its concerns. Even the leadership of the High Peace Council established in 2010 to separately negotiate with the Taliban is led by non-Pashtuns.

Without advocates in Kabul, the south has suffered from election rigging, lack of investment, and inadequate reconstruction efforts, leaving the region impoverished and southerners festering in anger, susceptible for recruitment by the Taliban and other armed groups. Inevitably, this lack of a “southern voice” in the Afghan government will have consequences in the ongoing U.S.-Taliban negotiations. While the government might ignore the south, the Taliban does not.

The United States and its Afghan partners, to their credit, have recognized the danger of marginalization. In 2008, there were strong recommendations from Kabul for a “ground-up approach” to fighting terror by recruiting southern Afghan tribesmen but a lack of understanding of the political realities led to problems in implementation which continue to this day. In one example, a high-ranking Afghan military official declared to parliament in 2016 that it was vital to address the southern Achakzai tribal insurgency, but it was some Ishaqzai tribesmen who were fighting against Afghan National Forces. Confusing these two tribes is comparable to confusing a Californian with a Virginian.

Dangerously, the “southern voice” is up for grabs. The dire conditions in the region have stoked opposition to Taliban domination. The area, when aggrieved, has historically been a center of revolt, ranging from resistance to the 2001 U.S.-led occupation, anti-Soviet mobilization occupation in the 1980s and the Anglo-Afghan wars of the nineteenth century. Since 2005, the Taliban have leveraged the post–2001 grievances to recruit cadres of southerners to join its ranks and control of the south is the result. Unless the United States and its local partners offer southerners an alternative, the Taliban or other armed groups will leverage that control at the negotiating table.

To sustain long-term peace in Afghanistan, the south must be heard, and its interests reflected in peace negotiations. It is too important to neglect. It contains the key provinces of Kandahar, Zabul, Helmand, and Oruzgan, is rich in resources and a crossroads for trade with Pakistan and Iran. It is also a center of both Taliban strength and anti-Taliban resistance. Peace negotiations are a chance—perhaps the final chance—for the government to demonstrate support for a region that has suffered both from Taliban repression and government neglect.

As U.S.-Taliban negotiations transition to intra-Afghan talks, the need for southern representation only becomes more urgent. At present, the south has no seat at the table, but the region is crucial for even a semblance of peace and reconciliation. Without a seat, or voice, violence will persist. Southern grievances are at a tipping point, and if Kabul or Washington won’t address them, the Taliban—or other armed groups—certainly will.

Masood Ahmad Azizi is an experienced and effective strategic security leader committed to working in partnership across tribal, ethnic and national borders to realize the full potential of Afghanistan and the Afghan people. He was the youngest and longest-serving deputy minister in the Interior Ministry, holding the rank of major general. In that role, he acted as a proponent of strong reform within Afghan Security Institutions.

Follow him on Twitter @masoodaazizi.

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