कश्मीर राज्य

कश्मीर हमारा, हमारे बाप का है, वहां के लोग मरते हैं तो मरें : सरकारी समाचार एजेंसियां बन गया है दिल्ली का हिंदी मीडिया : रिपोर्ट

जम्मू कश्मीर के सिलसिले से जो खबरें लोगों तक पहुँच रही हैं, वो या तो विदेशी मीडिया से आ रही हैं या दिल्ली के मीडिया से, दिल्ली का मीडिया लिखी पटकथा बयान करता है, सरकारी समाचार एजेंसियों की तरह काम कर रहा है दिल्ली का हिंदी मीडिया, टीवी चैनलों पर चंद्रयान की सफलता, रोना-धोना, शांतुना देना, मोदी की मुट्ठी में ‘चाँद’, क्या चंद्रयान की असफलता के लिए कांग्रेस ज़िम्मेदार है, जैसे कार्यक्रम चल रहे हैं, देश के एक भाग से पिछले 36 दिनों से पूरे देश का संपर्क टूटा हुआ है, वहां लोग किस तरह ज़िंदा हैं, उन पर क्या बीत रही है, कितने लोग गिरफ्तार हैं, गिरफ्तार होने वालों को मिलने वाली प्रताड़ना, बिजली के करंट, की तरफ धयान देने की फुर्सत यहाँ किसी को नहीं है, कश्मीर हमारा, हमारे बाप का है, वहां के लोग मरते हैं तो मारें, शायद ऐसा ही ख़याल कर के देश के लोग बहुत शांति से दुबके हुए बैठे हैं….

थे तो वो आबा तुम्हारे मगर तुम क्या हो
हाथ पे हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा हो
–अल्लामा इक़बाल रह०

S.n. Lal
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Kasmir main mohorrum ki dino main kya beet rahi hai…, dusre desho ka media dikha Raha hai, Yaha ka media to ankhe band kiye, chaliye mana media….?, Lekin Kam se ulema to Majliso aur bayano main kuch nahi, to waha ke liye duwa hi Kara sakte the…., Jin ke gharoo main kayee- kayee din khane Ko nahi…wo mohorrum ke juloos nikalne per dunde- lathiya kha rahe…, Khuda unki muskile aasan kare…ameen

पांच में से एक को हिरासत में रखते हैं, कुछ सौ लोग ही हिरासत में: जम्मू कश्मीर डीजीपी

BY द वायर

जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के एक महीने बाद राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) दिलबाग सिंह ने कहा है कि श्रीनगर में नारे लगाना हमेशा गुस्से का इजहार नहीं होता है.

उन्होंने कहा कि लोगों को पकड़ने की तुलना में उन्हें हिरासत में रखे जाने की संख्या बहुत कम है. अगर हम पांच लोगों को पकड़ते हैं तो उनमें से केवल एक को हिरासत में रखते हैं. हमने केवल कुछ सौ लोगों को हिरासत में रखा है, जो कि बड़ी संख्या नहीं है.

इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक साक्षात्कार में डीजीपी ने कहा, ‘ठीक-ठीक आंकड़े मौजूद नहीं हैं क्योंकि वे रोजाना बदल रहे हैं. हम जितने लोगों को पकड़ते हैं उनमें से बहुत कम लोगों को हिरासत में रखा जाता है. अगर हम पांच को पकड़ते हैं तो केवल एक को हिरासत में रखते हैं और बाकी को सामुदायिक समझौते के आधार पर रिहा कर दिया जाता है. हमने केवल कुछ सौ लोगों को हिरासत में रखा है. यह बहुत बड़ी संख्या नहीं है.’

उन्होंने कहा, ‘नजरबंद किए गए राजनीतिक लोग 35 से ज्यादा नहीं हैं. उनके साथ समस्या यह थी कि वे लोगों को उकसा सकते थे. इसलिए प्रशासन का यह फैसला था कि उन्हें रोका जाए और यह कदम उनकी सुरक्षा के लिए भी था.’

उन्होंने कहा, ‘अगर कुछ प्रतिबंधों से आप किसी की जिंदगी बचा सकते हैं तो उससे अच्छा क्या हो सकता है? लोग जिंदगी के साथ स्वतंत्रता की बात कहते हैं लेकिन मैं कहता हूं कि जिंदगी पहले आती है, स्वतंत्रता बाद में.’

Kenneth Roth
@KenRoth

Hardly a sign of normalization, Indian authorities have now imposed curfews in several parts of Kashmir amid a growing crackdown

 

बीते पांच अगस्त को लागू किए गए प्रतिबंधों को किसी अन्य तरह से लागू किए जाने की संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर डीजीपी ने कहा, ‘शायद एकमात्र यही रास्ता था. प्रतिबंध थोड़े सख्त लग रहे हैं, लेकिन कानून व्यवस्था को बनाए रखने में ये काफी सहायक हैं. हालांकि यह सब लोगों की कीमत पर हुआ, लेकिन हम उनके सहयोग के आभारी हैं. संचार से कहीं अधिक लोगों की जिंदगी जरूरी है.’

दक्षिणी कश्मीर में सेना द्वारा प्रताड़ना के आरोपों पर डीजीपी ने कहा, ‘हम रोजाना हालात का जायजा ले रहे हैं. एक मामला था जहां पर सेना की एक टुकड़ी ने दुर्घटनावश एक लड़के के सिर पर चोट पहुंचा दी थी. वे तलाशी के लिए गए थे लेकिन यह पूरी तरह से अलग मामला था.’

उन्होंने कहा, ‘जहां तक लोगों को उठाए जाने और प्रताड़ित किए जाने का सवाल है तो मैंने भी प्रताड़ना के आरोप लगाने वाले कुछ वीडियो देखे हैं. मुझे समझ में नहीं आता कि वे बच्चे अब कहां हैं. हमारे पास अब यातना देने की कोई परंपरा नहीं रह गई है. ऐसी कोई बात ही नहीं है.’

डीजीपी सिंह ने कहा, ‘मैं बहुत संतुष्टि के साथ कहना चाहता हूं कि अलग-अलग जगहों पर कुछ छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़कर माहौल काफी हद तक शांतिपूर्ण है. पूरे दक्षिण कश्मीर में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने के सबसे कम मामले सामने आए. अधिकतर घटनाएं श्रीनगर इलाके से सामने आईं. इन्हीं इलाकों में खासकर विदेशी मीडिया द्वारा प्रायोजित रिपोर्टिंग की गई.’

उन्होंने कहा, ‘एक दिन पहले ही मैंने डाउनटाउन श्रीनगर में सफकदाल, नौहट्टा, खानयार इलाकों में अपने लोगों से बात करते हुए दो घंटे बिताया. दो साल पहले इसी इलाके में एक पुलिस उपाधीक्षक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी. मुझे बताया गया कि उस थाने से एक भी मामला सामने नहीं आया. यही असली डाउनटाउन है.’

उन्होंने कहा, ‘वहां दुकानें बंद हैं लेकिन मैं उन्हें जबरदस्ती खुलवाने का पक्षधर नहीं हूं. यह उनका कारोबार है, उनका काम है. हम केवल शाम को थोड़े सचेत रहते हैं कि कोई फायदा न उठा ले. 92 थानों से प्रतिबंध हटा लिए गए हैं और केवल 13 थानों में प्रतिबंध लगे हैं. जम्मू और लद्दाख में कोई प्रतिबंध नहीं है. लेह और कारगिल में इंटरनेट भी काम कर रहे हैं.’

उन्होंने कहा, ‘श्रीनगर में होने वाली कुछ घटनाओं में कोई हिंसा या एफआईआर दर्ज नहीं हुई है. कुछ मामले तो गुस्से के कारण हुए जो कि संज्ञेय अपराध में नहीं आते हैं. मैं मामला दर्ज करके किसी लड़के की जिंदगी क्यों बर्बाद करूं. जब वे हद पार करते हैं, जब हिंसा, पत्थरबाजी या किसी के घायल होने का मामला सामने आता है तब मुकदमा दर्ज किया जाता है.’

उन्होंने कहा, ‘नारेबाजी यहां का शौक है. यह हमेशा गुस्से का इजहार नहीं होता है. आपने डाउनटाउन में देखा होगा कि रूटीन में भी आदमी जाएगा तो पत्थर पड़ जाएगा.’

डीजीपी सिंह ने कहा, ‘हम सामुदायिक समझौते का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं. लोगों को पकड़ने के लिए हमने सामुदायिक समझौते का इस्तेमाल किया और फिर अकेले श्रीनगर में हमने करीब 300 मामलों में पत्थरबाजों को रिहा कर दिया. अगर हर मामले में 10 लोग 10 लोगों की रिहाई मांगने आते हैं तो हमने सफलतापूर्वक 3000 लोगों से संपर्क किया और उन्हें उसी दिन छोड़ दिया गया.’

दक्षिणी कश्मीर में सेना ने लगाए अनुच्छेद 370 हटने से फायदे के पोस्टर

BY द वायर

नई दिल्ली: जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म किए जाने के बाद सेना ने दक्षिणी कश्मीर के कुछ हिस्सों में स्थानीय लोगों को अनुच्छेद 370 हटने से होने वाले फायदे समझाने के लिए पोस्टर लगाए और उन्हें बांटे.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जब लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लन से पूछा गया कि यह प्रचार अभियान सेना चला रही है या फिर केंद्र सरकार के निर्देश पर हो रहा है तब उन्होंने 4 सितंबर को एक प्रेस कॉ़न्फ्रेंस में कहा, ‘यहां कोई संगठित अभियान नहीं चल रहा है.’

उन्होंने कहा, ‘इलाके के फायदे के लिए पिछले 30 सालों से सेना यहां पर सद्भाव लाने की कोशिश में लगी हुई है, जिसके तहत उसने लोगों को प्रभावित करने वालों मौलवियों, शिक्षकों, छात्रों और सरपंचों से चर्चा की है.’

पुलवामा के अरीहल में स्थानीय लोगों ने एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स पर उर्दू में लगे पोस्टर दिखाए. इन पोस्टरों में अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-ए को राज्य से हटाने के फायदों के बारे में विस्तार से बताया गया है.

इन लाभों का उल्लेख स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन, संपत्ति के अधिकार और आरटीआई की श्रेणियों के तहत किया गया था. इसने केंद्र सरकार की योजनाओं जैसे आयुष्मान योजना के विस्तार और मिड-डे मील जैसी पहलों के लाभों को सूचीबद्ध किया.]

पोस्टर में लिखा है, ‘नए कोचिंग सेंटर और प्राइवेट स्कूल बनेंगे. नए होटल बनेंगे. मरकज की निगरानी में रहने का माहौल अच्छा होगा. जमीन की कीमत बढ़ेगी.’

इसमें नई फैक्टरियों के लगने और स्थानीय लोगों को नौकरी मिलने की भी बात कही गई है. इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि बाहर शादी करने वाली राज्य की महिलाओं का उनके संपत्ति पर अधिकार बना रहेगा.

अरीहल चौराहे के दुकानदार जहूर अहमद ने कहा, ‘विशेष दर्जा खत्म किए जाने के कुछ दिन बाद सेना आई और उसने हमें ये फोटोकॉपी पकड़ा दी. उन्होंने दीवारों पर भी पोस्टर चिपका दी. उन्होंने हमें समझाने की कोशिश की कि यह हमारे लिए क्यों जरूरी है.’

एक अन्य स्थानीय व्यक्ति इशफाक फिरोज ने कहा कि पोस्टरों को बांटने के दौरान सेना ने कहा कि हम अपने सेब का व्यापार पूरी आजादी से अन्य राज्यों के साथ कर सकेंगे.

जहां अधिकतर पोस्टरों को लोगों ने उतार दिया है, वहीं कुछ पोस्टर खाली बिल्डिंगों या बंद दुकानों पर अभी भी लगे हुए हैं.

 

कश्मीर पर अजीत डोभाल कितने सही, कितने ग़लत – नज़रिया

“मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के पक्ष में है. सिर्फ कुछ लोग इसके विरोध में हैं. लोगों को ऐसा लगता है कि ये आम लोगों की आवाज़ है. ये पूरी तरह सच नहीं है. कश्मीर में सेना की ओर से उत्पीड़न का सवाल ही नहीं उठता है. शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए जम्मू-कश्मीर पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात हैं. भारतीय सेना वहां पर सिर्फ आंतकवाद से लड़ने के लिए मौजूद है.”

ये बातें भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहरकार अजीत डोभाल ने शनिवार को कहीं.

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के फ़ैसले के बाद के माहौल और उससे पहले स्थानीय नेताओं को नज़रबंद किए जाने के लिए केंद्र की मोदी सरकार लगातार अलोचनाओं के घेरे में है.

जम्मू-कश्मीर में संचार सेवाओं की रोक और सेना द्वारा कश्मीरियों के उत्पीड़न के आरोपों के बीच अजीत डोभाल ने शनिवार को कुछ पत्रकारों से बात की और कश्मीर से जुड़े कई मसलों पर बात की.

डोभाल ने कहा कि पाकिस्तान में सक्रिय कुछ समूह कश्मीर में अशांति फैलाने की कोशिश कर रहे हैं.

उन्होंने ये भी कहा कि जम्मू-कश्मीर के किसी भी नेता के ख़िलाफ़ कोई भी चार्ज या राजद्रोह का मामला नहीं लगाया गया है. वे एहितायतन हिरासत में लिया गए हैं और जब तक लोकतंत्र चलने के लिए सही माहौल न बन जाए, तब तक वो हिरासत में ही रहेंगे.

डोभाल ने कहा कि कुछ लोगों को एहतियात के तौर पर हिरासत में लिया गया है. अगर जनसभाएं होतीं तो आतंकवादी इसका फायदा उठा सकते थे और क़ानून व्यवस्था को संभालने में दिक्कत होती.

कश्मीर की स्थिति के बारे में अजीत डोभाल के इन बयानों के क्या मायने हैं और इसे दूरगामी रूप में कैसे देखा जाए, इस बारे में बीबीसी संवाददाता अनंत प्रकाश ने वरिष्ठ पत्रकार भरत भूषण से बात की. पढ़िए, उनका नज़रिया:

‘कश्मीरी नेता सरकार का गुणगान नहीं करेंगे’

अजीत डोभाल जम्मू-कश्मीर के नेताओं को नज़रबंद करने और उन्हें हिरासत में लेने को सही ठहरा रहे हैं और इस फ़ैसले को ठहराने के लिए तरह-तरह की दलीलें दे रहे हैं लेकिन उनकी दलीलों में ज़्यादा दम नहीं है.

डोभाल कह रहे हैं कि अगर स्थानीय नेता जनसभा करते तो आतंकवादी उसका फ़ायदा उठा सकते थे. लेकिन ऐसा लगता है कि जिन लोगों ने पिछले 70 वर्षों से भारत का तिरंगा उठा रखा था, उन्हें जेल में बंद करके उन्हें भी आतंकवादियों के कैंप में डाल दिया गया.

जब ये नेता बाहर आएंगे तब ये मौजूदा सरकार का गुणगान करते हुए बाहर नहीं आएंगे. वो कश्मीर उस जनता के साथ खड़े होंगे, जो जनता इस बात से क्रोधित है कि उसके राज्य का विशेष दर्जा अचानक उससे छीन लिया गया और उसे पिछले एक महीने से घरों में बंद करके रखा गया है.

कश्मीर के लोगों को एक किस्म से क़ैदी बनाकर रखा गया है. उनसे मोबइल, टेलीफ़ोन और इंटरनेट, सबसे दूर रखा गया है. इन सबको सही ठहराने के लिए आप कुछ भी दलील दे सकते हैं लेकिन सवाल ये है कि लोग उस पर कितना यक़ीन करेंगे.

अलग है भारत का संघवाद
डोभाल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को भेदभावपूर्ण बताया लेकिन सच तो यह है कि भारत का संघवाद ‘एसेमेट्रिक’ है. यानी जैसा तमिलनाडु के साथ जैसा व्यवहार होता है, वैसा उत्तर प्रदेश के साथ नहीं होता और जैसा व्यवहार नगालैंड के साथ होता है वैसा दिल्ली के साथ नहीं होता. इसी तरह के संघवाद का एक उदाहरण अनुच्छेद 370 भी था.

भारतीय जनता पार्टी सभी राज्यों को एक चश्मे से देखती है. भले ही उनका इतिहास अलग हो, भले ही भारत में उनके विलय होने की पृष्ठभूमि अलग-अलग क्यों न रही हो.

अपने नज़रिए को संदर्भ में बीजेपी जो कह रही है, वो उसके हिसाब से सही है. मगर जिस संदर्भ में भारत का संविधान बना, जिस संदर्भ में जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बना, उस संदर्भ को ध्यान में रखें तो डोभाल जो कह रहे हैं वो ग़लत है.

अजीत डोभाल ने पत्रकारों से बातचीत में जिन बिंदुओं पर बात की, वो सभी मुद्दे अमरीकी विदेश मंत्रालय की ओर से उठाए गए थे. अमरीकी विदेश मंत्रालय की ओर से शुक्रवार को भारत प्रशासित कश्मीर को लेकर बयान जारी किया गया था.

डोभाल ने अपने बयानों में अमरीका का कहीं ज़िक्र नहीं किया लेकिन उन सभी सवालों के जवाब दिए जो अमरीकी विदेश मंत्रालय ने पूछे थे.

अजीत डोभाल एक तरीके से अमरीका को ही जवाब दे रहे थे. अजीत डोभाल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में स्थिति में सामान्य हो जाएगी. क़ायदे से उन्हें ये भी बताना चाहिए कि स्थिति सामान्य कब होगी.

अभी के हालात को देखें तो बिल्कुल नहीं लगता कि सरकार यहां अगले छह महीने या अगले एक साल में चुनाव करा पाने की स्थिति में होगी.

लोकतंत्र में नेता ‘नियुक्त’ नहीं किए जाते
अजीत डोभाल कह रहे हैं कि कश्मीर में उम्मीदों से ज़्यादा तेज़ी से स्थिति सामान्य हो रही है लेकिन क्या नेताओं को जेल में बंद करने से स्थिति समान्य होगी? पुलिस के डंडे से स्थिति सामान्य होगी या मोबाइल-इंटरनेट पर रोक लगाने से स्थिति सामान्य होगी.

लोकतंत्र में स्थिति सामान्य करने के लिए ‘सेफ़्टी वॉल्व्स’ की ज़रूरत होती है जो नेता बनते हैं. वो नेता जो जनता के बीच जाते हैं, उनके साथ बैठक करते हैं. भले ही वो भारत सरकार के ख़िलाफ़ नारे लगाएं लेकिन आपको उसी सेफ़्टी वॉल्व के जरिए स्थिति सामान्य करनी होगी. लेकिन मौजूदा सरकार जम्मू-कश्मीर के नेतृत्व को ख़त्म करके एक नया नेतृत्व पैदा करना चाहती है.

सरकार को लगता है कि ये नेता ‘नियुक्त’ कर लेगी लेकिन जनतंत्र में नेता नियुक्त नहीं किए जाते.

कश्मीरियों के लिए कब चलेगी पहली गोली- जमात प्रमुख का सवाल: उर्दू पाक प्रेस

पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ़्ते भी भारत प्रशासित कश्मीर से जुड़ी ख़बरें सबसे ज़्यादा सुर्ख़ियों में रहीं.

भारत ने पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 से मिले विशेष राज्य के दर्जा को ख़त्म करने की घोषणा कर दी थी.

इसके बाद से ही भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही चल रहे ख़राब संबंधों में और इज़ाफ़ा हो गया है. भारत कहता रहा है कि न केवल भारत प्रशासित कश्मीर बल्कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग है.

जबकि पाकिस्तान कहता रहा है कि कश्मीर एक विवादित जगह है और उसके अनुसार संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और कश्मीरी जनता की इच्छा के अनुसार ही इसका अंतिम फ़ैसला होना चाहिए.

पूरे हफ़्ते कश्मीर से जुड़ी ख़बरें ही पाकिस्तानी अख़बारों के पहले पन्ने पर छायी रहीं.

फ़व्वाद चौधरी के बयान
अपने बयानों के लिए मशहूर पाकिस्तान के विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी मंत्री फ़व्वाद चौधरी ने कहा है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच जंग हुई तो भारत को नाक-ओ-चने चबवा देंगे.

अख़बार एक्सप्रेस के अनुसार फ़व्वाद ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि भारत की तरफ़ से कहा जा रहा है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कमज़ोर है इसलिए उसे कश्मीर भूल जाना चाहिए.

इसके जवाब में फ़व्वाद कहते हैं, ”कई बार कमज़ोर अर्थव्यवस्था वाले मुल्कों ने आर्थिक सुपरपावर को शिकस्त दी है. जंग की ख़्वाहिश नहीं लेकिन अगर जंग हुई तो भारत को नाक-ओ-चबे चबवा देंगे.”

पाकिस्तान ने शुक्रवार ( 06 सितंबर) को पूरे पाकिस्तान में कश्मीरियों के समर्थन में रैली निकालने का आह्वान किया था.

इस अवसर पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने एक साथ लाइन ऑफ़ कंट्रोल यानी नियंत्रण रेखा का दौरा किया.

अख़बार दुनिया के अनुसार इमरान ख़ान ने कहा कि भारत प्रशासित कश्मीर में लॉकडाउन और भारतीय सेना का कश्मीरियों पर कथित ज़ुल्म मानवाधिकार की बदतरीन मिसाल है. इमरान ख़ान ने एक बार फिर दोहराया कि कश्मीरियों को उनके अधिकार मिलने तक पाकिस्तान उनकी मदद करता रहेगा. उन्होंने ये भी कहा कि पाकिस्तान की सेना भारत के किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार है.

उधर अख़बार नवा-ए-वक़्त ने दावा किया है कि शंघाई कोऑपरेशन काउंसिल (एससीओ) ने कश्मीर मसले को हल कराने की पेशकश की है.

अख़बार के अनुसार एससीओ ने भारत प्रशासित कश्मीर में भारत की एकतरफ़ा कार्रवाई को ख़ारिज करते हुए इस समस्या को हल कराने की पेशकश की है.

अख़बार ने एससीओ प्रमुख के हवाले से लिखा है कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय मामला ही सही लेकिन एससीओ के सदस्य देश इस पर ख़ामोश नहीं बैठ सकते हैं.

कब चलेगी पहली गोली: जमात प्रमुख

पाकिस्तान के एक धार्मिक संगठन जमात-ए-इस्लामी ने भारत प्रशासित कश्मीर की जनता के समर्थन में कराची में कश्मीर मार्च का आह्वान किया था.

अख़बार एक्सप्रेस के अनुसार कराची की सड़कों पर काफ़ी लोग उमड़े थे.

लोगों को संबोधित करते हुए जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख सिराज उल हक़ ने कहा कि फ़ेसबुक पर बातचीत करने से समस्या का समाधान नहीं होगा.

उन्होंने पाकिस्तान सरकार से आह्वान किया कि वो शिमला समझौते को ख़त्म करने की घोषणा करे.

अख़बार के अनुसार जमात प्रमुख ने ये भी कहा कि कश्मीर पाकिस्तान के लिए ज़िंदगी और मौत का सवाल है, अगर कश्मीरी ये जंग हार गए तो भारत का अगला निशाना पाकिस्तान प्रशासित होगा.

उन्होंने कहा कि अगर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आरएसएस पर गर्व है तो वो भी ग़ज़नवी (महमूद ग़ज़नवी) की औलाद हैं.

पाकिस्तान सरकार पर भी प्रहार
अख़बार जंग के अनुसार जमात प्रमुख ने लाहौर में आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए सरकार पर भी तीखे हमले किए.

उन्होंने कहा कि कश्मीर के लिए आख़िरी गोली और आख़िरी सांस तक लड़ने की बात कहना आसान है लेकिन उन कश्मीरियों के लिए पहला क़दम कब उठेगा और पहली गोली कब चलेगी.

दरअसल इससे पहले पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने सेना मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान कभी भी कश्मीरियों को अकेला और हालात के रहम-ओ-करम पर नहीं छोड़ेगा.

अख़बार दुनिया के अनुसार जनरल बाजवा का कहना था, ”पाकिस्तान की जनता और पाकिस्तान की सेना अपने कश्मीरी बहन-भाइयों के लिए कोई भी क़ुर्बानी देने को तैयार है. आख़िरी गोली, आख़िरी सिपाही और आख़िरी सांस तक अपना फ़र्ज़ अदा करेंगे.”

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इक़बाल अहमद
बीबीसी संवाददाता

@UN
rights chief ‘deeply concerned’ about #India actions in #Kashmir

 

UN rights chief ‘deeply concerned’ about India actions in Kashmir

“I am deeply concerned about the impact of recent actions by the government of India on the human rights of Kashmiris.”

Those are the words of Michelle Bachelet, the United Nations High Commissioner for Human Rights, who highlighted the issue of Kashmir in her opening statement to the UN Human Rights Council in Geneva on Monday.

Bachelet pointed to “restrictions on internet communications and peaceful assembly, and the detention of local political leaders and activists.”

The UN rights chief said she had “appealed particularly to India to ease the current lockdowns or curfews, to ensure people’s access to basic services, and that all due process rights are respected for those who have been detained.”

“It is important that the people of Kashmir are consulted and engaged in any decision-making processes that have an impact on their future.”

Indian authorities tightened the security lockdown in Kashmir on Sunday after breaking up religious processions by Shia Muslims who defied a ban.

On August 5, Indian Prime Minister Narendra Modi revoked special rights for the state of Jammu and Kashmir. The long-standing constitutional provisions for the region are no longer legally valid.

Following the move, India deployed troops to the region to stymie potential protests. The government in New Delhi also imposed severe restrictions on movements, and cut all telephone, mobile phone and internet connections.

The controversial action has angered both Pakistan, which controls parts of Kashmir, and the local population.

Some of the restrictions have been eased but no prominent detainees have been freed. Mobile and internet connections remain suspended, too.

India has long accused Pakistan of training, arming and sending militants to Kashmir. Pakistan denies direct support but says it gives moral and diplomatic support to the Kashmiri people in their struggle for self-determination.

Pakistan’s Foreign Minister Shah Mehmood Qureshi is scheduled to address the Human Rights Council on Tuesday, with a speech expected to focus heavily on the situation in Kashmir, which has been split between India and Pakistan since their partition in 1947.

In August that year, the British Raj was dismantled with the subcontinent divided into two independent states, Hindu-majority India and Muslim-majority Pakistan.

Millions were uprooted in one of the largest mass migrations in history, with experts estimating at least one million died in communal violence unleashed by partition that continues to haunt the subcontinent to this day.

Elsewhere in her remarks, Bachelet voiced concern over India’s citizenship register in the northeastern state of Assam.

She said some 1.9 million people had been excluded from the final list, which was published on August 31. Bachelet said the register had “caused great uncertainty and anxiety.”

“I appeal to the government to ensure due process during the appeals process, prevent deportation or detention, and ensure people are protected from statelessness.”

Modi’s Hindu nationalist Bharatiya Janata Party (BJP) runs Assam. The Indian prime minister is now under fire by critics who say the National Register of Citizens (NRC) process reflects the party’s goal to serve only its coreligionists.

Political opponents say the NRC is being used by the BJP to marginalize the large minority of Muslims in Assam, many of whom fled there when East Pakistan broke violently from Islamabad in 1971 to become Bangladesh.

Shireen Mazari
@ShireenMazari1
UNHCHR takes up the Kashmir issue in the UN Human Rights Council – but will the Council move to taking action? The 1st Kashmir report of the UNHCHR had asked the Council to set up an indep investigation comm to probe HR violations in IOJK but the Council has still not moved on it

Prime Minister Imran Khan has called upon the UN Human Rights Council to immediately set up an independent investigation commission to probe human rights abuses in Indian Occupied Jammu & Kashmir as recommended by the UNHCHR’s two reports on Kashmir.

 

ANI
@ANI
Kashmir Zone Police: Terror module of Lashkar-e-Taiba outfit involving 8 individuals arrested in Sopore. Investigation under progress.

 

shahid siddhu 🇵🇰🇹🇷
@siddhu_shahid

36 day Curfew Consecutively in Occupid #Kashmir New Human Crises have Created Brutality of Indian 🇮🇳 Forces More than 10000 have detained Total lockdown People Are Dying without food & Medicines . It’s Bigger Slap 👋 on the World 🌎

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