साहित्य

किसी पद पर होने के बाद रोना, किसी ब्रेकिंग न्यूज से कम नहीं है!

Pratima Jaiswal
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मेरे जीवन में ऐसे कई पुरुष दोस्त रहे, जिनसे कई विषयों पर वैचारिक मतभेद रहे। कभी-कभी भेद इतना बढ़ जाता कि बहस तक हो जाती। इनमें से कुछ दोस्त ऐसे थे, जिन्होंने जीवन के उदासीन और बोझिल दिनों में मुझे याद किया।

इनमें से कुछ दोस्त ऐसे थे, जो दुनिया की नजरों में सख्त और गुस्सैल मिजाज वाले कहलाते थे, लेकिन मैंने इनमें से कई दोस्तों को सिगरेट पीने के बहाने ऑफिस के आखिरी छोर पर पड़ने वाली खाली जगहों पर आसूं बहाते हुए देखा। वहीं, वाशरूम से चेहरा धोकर निकलने वाले लड़कों की लाल आंखें भी अलग कहानी बयां करती थीं।

कभी किसी का प्रेम सम्बध टूटने पर मेरे पास फोन आता, तो कभी पारिवारिक झगड़े मेरे दोस्तों को रुला देते। मेरे सामने आसूं बहाने में इन्हें कोई डर या परेशानी नहीं होती थी, क्योंकि उन्हें पता था कि मैं उनके आसुंओ की वजह से कमजोर नहीं समझूंगी। इनमें से कई दोस्तों से महीनों तक बात भी नहीं होती लेकिन किसी रोज इन्हें रोने के लिए एक दोस्त की जरुरत पड़ती। मैं कोने में छुपकर आसूं बहाते इन प्रोफेशनल लड़कों को देखकर सोचती थी कि दुनिया आसूंओं को इतना कमतर कैसे आंकती हैं?
या किसी बड़े प्रोफेशन में आकर आपको सभी के सामने रोना क्यों नहीं आ सकता? फिर यह भी तो एक भाव ही है।

दफ्तरों में किसी चुभने वाली बात से रो देने वाली लड़कियों को कमजोर समझ लिया जाता है या बेचारगी की नजरों से देखा जाता है। लड़कियों का रोना मखौल तो लड़कों का रोना किसी विपदा या ब्रेकिंग न्यूज जैसा बना दिया जाता है। फलां लड़की की तरह रो रहा था?, इतना कमजोर कैसे है? रोने को लेकर दुनिया हमेशा से क्रूर रही है। लड़कियों के रोने को तो फिर भी ताने-उलाहने या मजाक उड़ाकर आम मान लिया गया है लेकिन लड़कों से अपेक्षा की जाती है कि उसे ‘मजबूती’ के खांचे में सही बैठना है।

कोई घर में मर जाए, शारीरिक-मानसिक परेशानी हो, आत्मसम्मान को ठेस लगना, प्रेम सम्बध टूटना हर मामले में लड़को को अपना रोना काबू में रखना है क्योंकि दुनिया उन्हें देख रही है। लड़के पर मजबूत होने का दबाव है। वो शारीरिक-मानसिक रूप से लड़की से कम भी है, तो उसे ढोंग करके मजबूत दिखने का कवरअप करते रहना सिखाया गया है। लड़की पर ‘लड़की’ बने रहने का दबाव है, तो लड़कों पर लड़के जैसे दिखने का दबाव भी है। यहां एक समाज ने मिलकर एक खांचा बना दिया है। जिसमें प्रत्येक गुण लड़के-लड़कियों के लिए बांट दिए गए हैं।

जैसे, एक दोस्त के पिताजी गुजर गए थे। कुछ दिनों बाद उससे मिलने गई। मुझे देखकर गले लगकर किसी बच्चे की तरह रो पड़ा। आसपास पड़ोस के लोग और रिश्तेदार अजीब नजरों से हमें देख रहे थे। कुछ देर बाद उसने खुद को संभाला, तो खुद को शर्मिदा महसूस करने लगा। महीना बाद ऑफिस वापस लौटा, तो मुझसे नजरें चुराने लगा। शायद मेरे सामने रो देने पर उसे झिझक हो रही थी। जब एक दिन उससे बात कि तो उसकी झिझक दूर हुई, कि मैं उसे कमजोर नहीं समझ रही। मेरी दादी के गुजरने के बाद मैंने पिताजी के कमरे से न जाने कितनी बार रोने की आवाज सुनी। सुबह उठकर देखा, तो उन्हें नॉर्मल पाया। जब पूछा कि आपके कमरे से रात को रोने की आवाज आती है, तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि वो नहीं जानते।

रोना भी तो एक भाव है फिर मैं, आप या दुनिया यह कैसे नियम बना सकती है कि आपको कब, कहां और किस बात पर रोना है और कब नहीं। बेशक, हम लोग खुद का रोना रोकते हैं, कभी-कभी बेहिसाब रोना तक रोक लेते हैं लेकिन अगर किसी का रोना निकल ही आता है, तो रोने पर ऐसा खांचा तो नहीं खींचना चाहिए, जिसमें सही न बैठ पाने पर कोई अपराधबोध से घिर जाए।

लड़का हो या लड़की रोने के प्रति दुनिया हमेशा से क्रूर रही है। हमारे समाज ने लड़कों के मन में ‘रोने’ के प्रति ऐसी मानसिकता बैठा दी या उनकी कंडीशनिंग की गई है, जिससे रोने वाले इंसान खासतौर से लड़कियों को कमतर समझे। जब तक उन्हें रोने को सामान्य भाव की तरह नहीं समझाया जाएगा, तब तक लड़कियों के रोने को मखौल, गुस्से या हल्के भाव की तरह ही देखा जाएगा। उनके खुद के मन में रोने को लेकर ऐसी नकरात्मकता बैठा दी गई है। वहीं, समाज ने कई चीजों की परिभाषाएं ऐसी बना दी हैं, जिससे नकरात्मकता फैलती गई।

दफ्तरों या किसी पद पर होने के बाद रोना, किसी ब्रेकिंग न्यूज से कम नहीं है। फिर रोना तो सभी को आता है, कोई रोक लेता है और कोई बिखरकर फिर से बन जाता है। किसी का रो देना, क्रूर हंसी हंस देने से कहीं बेहतर है।
मैं अपने जीवन में उन सभी रिश्तों, दोस्तो की शुक्रगुज़ार हूं, जिन्होंने दुख बांटने या मेरे सामने रो देने में कोई झिझक महसूस नहीं की। मेरे लिए यह बात बहुत महत्व रखती है।

-प्रतिमा

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