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“गज़वा ए हिन्द” की हक़ीक़त : Zia Imtiyaz के क़लम से

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“गज़वा ए हिन्द” एक ऐसा विषय है जिसके बारे में न भारत का कोई मुसलमान कुछ जानता है, न बाकी दुनिया के मुसलमान, ग़ज़वा ए हिन्द के बारे में अगर कोई जानता है तो पाकिस्तान की दहशतगर्द तंजीमें या भारत के संघी… मैंने भी इंटरनेट पर आने के बाद ही पहली बार ग़ज़वा ए हिन्द का नाम संघियों से ही सुना, हालाँकि उससे पहले मैं इस्लाम की काफी स्टडी कर चुका था, …. दरअसल ज़्यादातर उलमा के बीच ग़ज़वा ए हिन्द की रिवायतें भरोसे के लायक नही मानी जाती हैं, इसलिये उलमा उन रिवायतों का ज़िक्र नही करते, और इसीलिये आम मुसलमानों को इस बारे में कोई जानकारी नही होती… मगर भारत के शरपसंद संघी ऐसा दिखाते हैं जैसे भारत और दुनिया का हर मुसलमान हर वक़्त ग़ज़वा ए हिन्द का ही ख्वाब देखता हो….

गज़वा ए हिन्द के मुताल्लिक 5 रिवायतें मौजूद हैं, जो दरअसल एक ही बयान है जिसके अलग अलग हिस्से अलग अलग जगह बयान किये गए हैं …. इन रिवायतों में जो बयान किया गया है, मुख़्तसर तौर पर वो ये है कि “नबी सल्ल० ने फरमाया की मेरी उम्मत में एक लश्कर जो कि येरूशलम के बादशाह की तरफ से हिन्द भेजा जाएगा ये लोग हिन्द को जीत लेंगे, और जब वहां से मालो दौलत ले कर लौटेंगे तो शाम के मुल्क यानि सीरिया में हज़रत इसा इब्न मरियम अ० को पाएंगे”

सबसे पहली बात तो आपको ये बता दूं कि ये रिवायतें हदीस की छह मकबूल किताबों (सही सित्ता) में सिर्फ एक जगह को छोड़कर कहीं मौजूद नही हैं, गौरतलब है कि हदीस की इन 6 किताबों पर तमाम मुसलमानों का एक मत है कि इनमें मौजूद हदीसें सबसे ज़्यादा विश्वास योग्य हैं, इनके अलावा बाकी किताबों में अक्सर कमज़ोर और मनगढ़ंत हदीसें पाई जाती हैं

फिर जहाँ जहाँ ये गज़वा ए हिन्द की रिवायतें लिखी हुई हैं, तो हदीस के नियम के मुताबिक उन्हें नबी से किसने सुना और उसने किसको सुनाया, जिस से पहुँचते पहुँचते ये हदीस रावी तक आई, ये चेन भी लिखी गई है, और यहाँ हम पाते हैं कि इन पांचों रिवायतों में रावियों की चेन में कोई न कोई रावी ऐसा ज़रूर है जिसको मुहद्दिसों ने यक़ीन के काबिल नही माना, कहीं चेन ही पूरी न थी, कहीं रावियों की चेन में ऐसा शख़्स शामिल था जिसको मुहद्दिसों ने झूठा करार दिया था… इसलिये ये तमाम रिवायतें खुद ब खुद ज़ईफ़ यानि नाकाबिले यक़ीन साबित होती हैं ….

इस सब के बावजूद इस रिवायत को अगर हम सही मान लें, तो भी अव्वल चीज़ ये है कि क़ुरान मजीद में अल्लाह ने मुसलमानों को जंग के बारे में जो हुक़्म दिया है वो ये है कि मुस्लिमों को गैरमुस्लिमों के साथ जंग की इजाजत तभी है जब गैरमुस्लिम खुद मुस्लिमों पर आक्रमण करें …

देखिए
‘‘जिन मुसलमानों से (खामखाह) लड़ार्इ की जाती है, उनको इजाजत हैं (कि वे भी लड़े), क्योकि उन पर जुल्म हो रहा हैं और खुदा (उन की मदद करेगा, वह) यकीनन उनकी मदद पर कुदरत रखता है।’’ (कुरआन, सूरा-22, आयत-39)

‘‘और जो लोग तुमसे लड़ते हैं, तुम भी खुदा की राह मे उनसे लड़ो, मगर ज्यादती (अत्याचार) न करना कि खुदा ज्यादती करनेवालो को दोस्त नही रखता।’’(कुरआन, सूरा-2, आयत-190)

बिलकुल यही हुक़्म बहुत साफतौर पर प्यारे नबी स.अ.व. फरमाया है
” ऐ लोगों खुद कभी दुश्मन से लड़ाई भिड़ाई करने की चाहत न करो, बल्कि अल्लाह से दुआ किया करो कि वो दुश्मन के शर से तुम्हारी हिफाज़त करे । लेकिन जब बहुत मजबूरी मे तुम्हें दुश्मन के मुकाबले जंग करनी पड़ जाए तो न्याय पर कायम रहते हुए युद्ध लड़ो.. (सहीह मुस्लिम)

और रहे शान्ति प्रिय गैर-मुस्लिम तो उनके साथ क़ुरान पाक भले सुलूक की ही तालीम देता है
‘‘जिन लोगों ने तुमसे दीन (धर्म) के बारे में जंग नही की और न तुम को तुम्हारे घरो से निकाला, उनके साथ भलाई और इंसाफ का सुलूक करने से खुदा तुमको मना नही करता। खुदा तो इंसाफ करनेवालों को दोस्त रखता हैं। ‘‘ (कुरआन, सूरा-60, आयत-8)

….. अब अगर गज़वा ए हिन्द की हदीस को सही माना जाए तो इस्लाम में जंग की शर्त ये है कि पहले हिन्द से मुस्लिम देशों पर हमला हो, और जब तक हिन्द खुद मुस्लिमों पर हमला नही करता किसी मुस्लिम देश को यहाँ हमला करने की इजाज़त नही है,

…. जो उलमा (पाकिस्तान के कुछ फ़ित्ना परस्तों को छोड़कर) गज़वा ए हिन्द की उस हदीस को सही मानते हैं, जिसमे सिर्फ इतना बयान किया गया है कि नबी सल्ल० ने फरमाया कि मेरी उम्मत में अल्लाह दो गिरोहों को जहन्नुम से बचाएगा, एक गिरोह जो हिन्द में लड़ेगा, और दूसरा गिरोह जो ईसा इब्न मरियम के साथ होगा, उन उलमा के मुताबिक ये भविष्यवाणी मोहम्मद बिन क़ासिम या महमूद गजनवी के वक़्त में पूरी हो चुकी है, और क्योंकि हदीस में सिर्फ एक गिरोह का ज़िक्र किया गया है… इसलिये अब दोबारा कभी गज़वा ए हिन्द की सम्भावना नही बचती

…. दूसरी तरफ हम रिवायत का दूसरा हिस्सा देखें तो गज़वा ए हिन्द की रिवायतों में ज़िक्र है कि गज़वा ए हिन्द के वक़्त ईसा अ० का ज़हूर हो चुका होगा जो कि तमाम सही अहादीस के मुताबिक ऐन क़यामत के वक़्त ही मुमकिन होगा, उससे पहले एक लंबा अरसा दज्जाल का साम्राज्य रहेगा, दुनिया के कानून और रिवाज छिन्न भिन्न हो चुके होंगे, सूरज पश्चिम से उगेगा…

तो ज़ाहिर है कि न अभी दज्जाल आया, दुनिया में भलाईयाँ भी बाकी हैं और अभी सूरज के पश्चिम से निकलने की कोई सम्भावना नही है …. यानि रिवायत के बयान किये गए हालात पूरे होने की सम्भावना हमारी ज़िन्दगियों में तो नही दिखती

और तो और अभी तो येरूशलम भी मुसलमानों के पास नही है, जबकि रिवायत के मुताबिक़ ग़ज़वा ए हिन्द से पहले येरूशलम पर मुसलमान काबिज़ होंगे, मतलब यहाँ भी रिवायत एक ऐसी अवस्था का ज़िक्र कर रही है, जो हाल फिलहाल में आना नामुमकिन दिखती है… और आज के दौर का कोई भी उपद्रवी गज़वा ए हिन्द की (कमज़ोर) रिवायतों का सहारा लेकर भारत पर हमला करना चाहेगा तो वो इस्लाम को नही बल्कि अपनी मक्कारी को फॉलो कर रहा होगा

हाँ एक बात और, नबी सल्ल० के वक़्त में शब्द “हिन्द” से मुराद सिर्फ आज का भारत नही होता था, क्योंकि उस वक़्त इस सरज़मीन पर छोटी छोटी बहुत सारी रियासतें होती थीं न कि आज के नक़्शे का भारत, उस वक़्त हिन्द के दायरे में, बांग्लादेश, बर्मा, थाईलैंड और इंडोनेशिया तक आते थे सो गज़वा ए हिन्द का मतलब ये निकाल लिया जाए कि आज के भारत में ही कहीं मुस्लिमों का एक गिरोह युद्ध करने आएगा , ये भी सही नही… अगर उन रिवायतों को सही भी मान लिया जाए तो वो युद्ध भारत की बजाये, बंग्लादेश, पाकिस्तान, बर्मा या थाईलैंड आदि जगहों पर भी कयामत के समय हो सकता है, जबकि क़ुरान में बताए नियम के मुताबिक इनमें से कोई देश मुस्लिम देशों में तबाही मचा चुका हो

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