विशेष

*ताज़ियादारी का तैमुर के नाम पर फैलाया जा रहा जुठ और उस्का तारीख़ से जवाब*

Munawwer Hussain
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कुछ अक्ल के अंधो के लिए जिन्हे ना दिन का पता है ना दुनिया का,ना कभी तारीख देखी ना कभी दिन को समझा, भेड बकरियों की तरह सिर्फ जिसनें जो बताया उसी को समझा, किसी एक फतवे की आड लेकर पूरी कौम पर रुआब झाडने निकल पडे है, आइये में तारीख का आइना दिखाता हुं।

*हिन्दुस्तान में।*

हीजरी सन 80, इस्विसन 699 में सबसे पहेले हजरत खालिद बिन वलीद जो सहाबी ए रसुल थे वो आये और बाद में यंहा से चले गये।

जिसके बाद ताबेइन हजरत बदीउद्दीन कुत्बुल मदार, मदारुल आलमीन (रदी) हीजरी 292, इ.स. 895 में आये जो हलब शहर जिसे हम आज अलेप्पु (सीरीया) कहते हैं, वो गुजरात के खंभात के किनारे पर ठहरे और वंहा पर अपना चिल्ला किया और इस्लाम की तबलीग शुरू की जंहा आपने मौला हुसैन की याद मे डंका बजाया, अलम बनवाये, एक छोटी सी ताजिया भी बनवायी और इसी तरह से यादे हुसैन मनाना शरु किया।यह ताजियादारी की शरुआत थी।

जिसके बाद सुल्तान महमूद गजनवी सोमनाथ पर ने हमला किया और जीत जाने पर आपके खास सिपहसालार सैयद सालार साहू से अपनी बहन का निकाह किया और उनसे हजरत सैयद मसूद सालार गाज़ी का जन्म हुआ जो 10 फरवरी 1014 में बताया जाता है, आप अपने वालिद के ही नक्शेकदम पर चलते हुए 4 अक्तूबर 1032 मे जामे शहादत पा गये और जब तक हुकूमत रही ताजियादारी करते रहे।

जिसके बाद हुजूर सरकार गरीब नवाज (रदी) जिनका जन्म हिजरी 536 इ.स.1141 मे अफगानिस्तान के हेरात शहर में हुआ था, और आप अपने पीरो मुर्शिद हजरत ख्वाज़ा उस्मान हारुनी का कुर्ब पाकर हिन्द आये और दावतें इस्लाम को पुरनुर किया, आपका विसाल हिजरी 636 इ.स. 1236 मे हुआ, आपने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ जिकरे हुसैन ही किया और ताजियादारी की और आज भी जारी और सारी है ।

आपकी रुबाइ पुरी दुनिया में मशहूर है।

*शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन*
*दीन अस्त हुसैन, दीने-पनाह हुसैन*
*सरदाद न दाद दस्त, दर दस्ते-यज़ीद*
*हक़्क़ा के बिना, लाइलाह अस्त हुसैन.*

आइये अब चलते हैं तारीख के अगले पडाव पर।

तैमूर लंग जो चंगीज खान का वंशज था वो हिन्द को सिर्फ लुटने की वजह से तारीख 24 सितम्बर 1398 (हिजरी सन 7 रबीउस्सानी 801) में सिर्फ 15 दिन के लिये आया था जंहा उसने दिल्ली में 7 दिन और रात कत्ले-आम की और बाकी के सात दिन वो बीमार हो गया जिसके कारण उसने हिंद छोड दिया और आगे की ओर चल पडा, और उसकी मौत तारीख 17 फरवरी 1405 (16 शाबान 807 हीजरी) में हुई।

*कुछ लोग कहते हैं कि ताजियादारी की शरुआत तैमूर ने की?*

अब मुझे जवाब दो कि जब तैमूर हिंद मे आया तब रबीउस्सानी का महीना चल रहा था! तो क्या उसने बिना मुहर्रम के ताजिये बनाये? और वो सिर्फ 15 रोज रुका था तो ऐसा कौनसा जादुई चिराग उसके पास था जिससे उसने पूरे हिंद (भारत- पाकिस्तान- अफगानिस्तान और बांग्लादेश) में ताजियादारी शरु करवायी थी!!!

और वह दौर जो था उस दौर में औलिया अल्लाह मौजुद थे, मान भी लो कि उसने शरुआत की थी तो उस दौर के किसी वली अल्लाह ने क्यों इसे नही रोका?

*आप तारीख उठाकर पढलो की हिन्द में जितने भी औलिया अल्लाह आये तमाम ने ताजियादारी की है।*

एक पल के लिए मान भी लेते हैं कि नाउज़ोबिल्लाह ये सब लोग गलत थे ।

*उसी नस्ले तैमुर के बाबर की औलाद और हजरत आलमगीर बादशाह औरंगजेब (जन्म- 3 नवम्बर 1618 दाहोद, विसाल 3 मार्च 1707) जो शरीयत के बडे ही पाबंद थे जिन्होंने फतावा आलमगीरी लिखी है, और अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा हुकूमत 60 साल हिंद पर की थी और इस्लाम का प्रचार और प्रसार किया था, अब अगर ताजियादारी शरीयत के हिसाब से हराम और बिद्दत होती तो यह बादशाह सबसे पहेले इसे बंद करवा देते।*

मगर नही की कयोंकि उन्हे ताजियादारी में कोई बुराइ नजर नही आयी जो आजकल के मुल्लों को आ रही है !!

*यंहा पर बताता चलूँ की हिन्दुस्तान में आये और बसे हुए हर सिलसिले के बुजुर्गों ने ताजियादारी की है, और उसे बढाया भी है।*

लेकिन बरतानी हुकूमत के दौरान जब मुसलमानों से निबटने में हुकूमत को परेशानी होने लगी तब इन अंग्रेजों ने किसी मौलवी से एक फतवा दिलवा दिया कि ताजियादारी हराम है!!!

और पुरी कौम जो एक होकर आशुराह के दौरान जिकरे हुसैन करती थी उसे दो खैमो में बाट दिया, और अंग्रेजो की यह चाल कामयाब हुई कयोंकि जो हुजूम ताजियादारी मे उमड़ता था वो एक फतवे की बुनियाद पर तुटने लगा, और जो मुसलमान कभी किसी से डरते नही थे वो लोग अंग्रेजी हुकूमत के गुलाम बन गये।और यही साजिश आज भी जारी है, *फुट डालो और राज करो*

लेकिन मुसलमान ये समझने को तैयार नही कि यह आशुराह का जुलुस और अखाड़े दर असल हमारी कौम का शक्ति प्रर्दशन है, और ये हिन्द की हुकुमत पर भारी पड़ता है,जिस वजह से हुकुमत अपने कारिंदे छोडती है और अंदरूनी खुराफात पैदा करवाती है।

आज भी जब माहे मुहर्रम आता है तो यह मौलवी लोग अपने आला मौलवी की पैरवी करने नये नये खुराफात पैदा करते हैं और भोले भाले इल्म से कोरे लोग इनके बहेकावे में आ जाते हैं और हराम हलाल के चक्कर में अपना अहम फरीजा मोहब्बत और मवद्दते अहले बयत से महेरुम रहे जाते हैं,

हम किसी को यंहा ताजियादारी जबरन मनवाना नही चाहते लेकिन जो लोग अंग्रेजो और मौलवीयो की चाल में अबतक नही फंसे उन्हे नमाज और शरीयत की आड लेकर बरगलाना छोड दो।

आप नही मानते मत मानो लेकिन आप ही सच्चे और पक्के मुसलमान हो ये गुरुर भी दिमाग में से निकाल दो, कयोंकि इस्लाम आपकी बपोती नहीं हैं, आप सूफ़ियां ए किराम को ना मानो, आप किसी दरगाह को ना मानो ये आपकी अपनी सोच हो सकतीं हैं, लेकिन अपनी सोच किसी पर मत थोपो, जो लोग ताजियादारी करते थे वो तुमसे कंही बेहतर थे, और जो लोग कर रहे हे वो भी अकलमंद है, तुम्हारे ताने, तंज और मुखालिफत अपने तक महेदुद रखो।

हमने आपको तारीख का आइना दिखा दिया है।

कम से कम अब अपनी जहालत से बाज आ जाओ। वरना तारीख तुम्हें माफ नहीं करेगी, और अपना हश्र यजीद पलीद के साथ पाओगे।

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