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बाबर ने उसका सिर हाथ में लेकर कहा था, ”तुम्हारे साहस का सम्मान उचित है”

Nitin Thakur
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बाबर 500 साल पहले होकर गुज़र चुका। जब उसने आगरा में अंतिम सांस ली तब वो 47 वर्ष का था। बेशुमार युद्ध अभियानों, हार, जीत, पलायन, धावों के बीच जो एक चीज़ मुसलसल चलती रही वो थी बाबर की कलम। जिस ज़माने में शासक एक आदमी सिर्फ इस काम के लिए रखते थे कि वो खाना परोसे जाने से पहले चखकर तस्दीक करे कि उसमें ज़हर नहीं तब वो तारीख लिखने वाले भी रख सकता था। बाबर ने ऐसा नहीं किया और सैन्य शिविरों तक में अपने जज़्बात चगताई तुर्की भाषा में खुद ही लिखता रहा जिसका अनुवाद बाद में अकबर ने फारसी में कराया ताकि लोग पढ़-समझ सकें। ऐसा हौसला करके बाबर ने अपना नाम दुनिया के पहले शासक के तौर पर लिखवा लिया जिसने आत्मकथा लिखी।

कल जब मैंने बाबरनामा की एक झलक यहां लिखी तब मुझे मालूम नहीं था कि वो इतनी पसंद की जाएगी। टूटी बाजू को सहारा देकर लिख गया था। आदत से मजबूर हूं और बिस्तर पर हूं लेकिन लिखने की हूक उठती है तो बेचैन कर देती है। कुछ दोस्तों ने कल इसरार किया कि इस सिलसिले को कुछ और बांधूं। मैं इतिहासकार नहीं हूं बल्कि इतिहास का छात्र हूं इसलिए पूरे हक से कुछ लिख पाना दुस्साहस होगा। फिर भी बाबरनामा से एकाध दिलचस्प बातें आपकी जिज्ञासा के शमन हेतु पेश करने की कोशिश भर कर रहा हूं। पढ़ने के बाद आप भी एकाध लाइन लिखेंगे तो मानूंगा कि मज़दूर की मज़दूरी मिल गई।

आप लोग उस राजवंश को मुगल नाम से जानते हैं जिसकी नींव बाबर के हाथों डाली गई लेकिन बाबरनामा पढ़कर हैरत होती है कि वो खुद मुगल नाम से चिढ़ता था। यहां तक कि उन लोगों से भी जो मुगल कहे जाते थे। असल में मंगोल को ही फारसी में मुगल कहा जाता था। बाबर को शासक बनने का मौका छोटी उम्र में ही मिल गया था। उसके पिता एक रोज़ कबूतरों को दाना डाल रहे थे। अचानक कबूतरखाना गिरा और उसके साथ बाबर के पिता उमर शेख मिर्ज़ा कबूतरों समेत नीचे आ गिरे। वो इस हादसे में मारे गए। वो जिस फरगना नाम की बेहद खूबसूरत जगह का शासक बना वो आज उज़्बेकिस्तान का हिस्सा है और ये वो देश है जहां हमारे दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने अंतिम सांस ली थी।

बाबर उस तैमूर (लंगड़ाकर चलने की वजह से तैमूरलंग या अमीर तैमूर) का वंशज था जिसने ईरान और मध्य एशिया में तैमूर वंश की स्थापना की थी। तैमूर ने बाबर के हिंदुस्तान पहुंचने से करीब सवा सौ साल पहले दिल्ली पर धावा बोला था। तब यहां तुगलक राज करते थे। तैमूर तब तक बहुत बड़ा लड़ाका बन चुका था। बाबर के उलट वो हमलावर के तौर पर आया था। जाटों और अहीरों ने उसका विरोध किया लेकिन मुहम्मद शाह तुगलक ने घुटने टिका दिए। मेरठ में उसे भारी विरोध झेलना पड़ा लेकिन दिल्ली तो आपसी झगड़े से बेदम थी। 1398 में दिसंबर का महीना था।तैमूर ने अपने ऊंटों की पीठ पर लकड़ी रखकर आग जलाई जिसे देखकर शाही सेना के हाथी अपनी ही सेना की तरफ दौड़ लगा बैठे। नतीजतन बादशाह तुगलक भाग निकला और दिल्ली लूटने का रास्ता साफ हो गया। दुनिया के सबसे अमीर शहरों में से एक को जीतने के बाद तैमूर ने ऑटोमन बादशाह तक को तुर्की में धूल चटाई। उसने आर्मेनिया, सीरिया, बगदाद तक जीते लेकिन बाबर ने हिंदुस्तान को रहने के लिए चुना।

ऐसा नहीं है कि बाबर ने हिंदुस्तान यूं ही चुना। असल में वो उज़्बेकों से अब टकराना ही नहीं चाहता था। तीसरी बार समरकंद हाथ से निकलने के बाद उसने सोच लिया कि अब ध्यान उत्तर भारत की ओर देना है। उसकी चाहत अपने पड़दादा के भी पड़दादा तैमूर के जीते इलाके को काबू में करने की थी जो दरअसल पंजाब बैठता है। बाबर ने अपना राजदूत दिल्ली के लिए भेजा लेकिन उसे लाहौर से आगे नहीं जाने दिया गया। तब भारत में इब्राहीम लोदी का सिक्का चलता था। वो दिल्ली और उत्तर भारत में लोदी वंश का शासक था। सुल्तान से उसके लोग नाखुश थे। पंजाब में उसके गवर्नर दौलत खान लोदी और बेटे चाहते थे कि वो दिल्ली से अलग हो जाएं। सुल्तान के 70 साल के चाचा ने भी दिल्ली की गद्दी चाही और इसके लिए बाबर को भारत आने का न्यौता देना शुरू कर दिया। बिहार, बंगाल, मालवा, गुजरात भी विरोधियों के हाथ में थे। राजपूत रजवाड़ों ने एक संघ बनाकर अपना नेता राणा सांगा को चुना जो लोदी को गद्दी से उतारने के लिए बाबर को बुला रहा था। कुल मिलाकर सब चाह रहे थे कि बाबर दिल्ली को गिरा दे लेकिन जो वो नहीं समझ पाए वो ये था कि बाबर काबुल-गज़नी छोड़कर दिल्ली-आगरा में ही जम जानेवाला है।

दौलत खां लोदी ने अपने बेटे को बाबर के पास काबुल भेजा। तब कामरान की शादी का माहौल था जो हुमायूं का भाई था। बाबर दिल्ली पर धावे को राजी तो हुआ मगर बोला कि भारत की विशेष चीज़ पान और आम हैं। अगर वो भेंट में मिले तो शकुन मानूंगा। दौलत खां ने पहले ही उसके लिए तोहफे में अधपके आम भेजे थे। बाबर ने वो देखे तो खुश हो गया। उसी साल सुल्तान लोदी का चाचा अलाउद्दीन आलम खां भी काबुल आकर बाबर से मिला और हमले की दावत दी। अब देर किस बात की थी। इधर बाबर काबुल से चला उधर सुल्तान इब्राहीम लोदी ने बिहार खां को लाहौर भेजा ताकि दौलत खां को सजा दी जा सके। दौलत खां लाहौर छोड़कर मुलतान भाग गया। बाबर ने बिहार खां को शिकस्त दे दी और लाहौर लूटकर बाज़ार जलवा दिए। आगे बढ़कर बाबर ने दीपालपुर जीता। अब दौलत खां आकर बाबर से मिला लेकिन उसे लाहौर वापस नहीं मिला।दौलत खां चिढ़ गया और बाबर से पिंड छुड़ाने के लिए साज़िश रचने लगा मगर उसके बेटे दिलावर ने ही पोल खोल दी। बाबर से जान बचाने के लिए दौलत खां अपने एक और बेटे के साथ भागकर पहाड़ों में छिप गया। हालांकि बाद में जब बाबर काबुल लौटा तो उसने बेटे को कैद करके कई राज्य जीते मगर आखिरकार लाहौर की सेना ने उसे हरा दिया। इस बीच दौलत खां ने सुल्तान के उस चाचा को भी हरा दिया जिसे बाबर ने दीपालपुर दिया था। बाबर ने उसे कहा कि जब दिल्ली जीतकर उसे दी जाएगी तो बस इतना करके कि लाहौर और अफगानिस्तान की तरफ के इलाके बाबर को दिए जाएं। इस समझौते के साथ सुल्तान का चाचा दल बल के साथ दिल्ली रवाना हुआ पर रास्ते में दौलत खां से संधि कर ली। बाबर को इससे भयानक गुस्सा चढ़ा।

बहरहाल सच यही है कि बूढ़े अलाउद्दीन आलम खां ने दिल्ली तो घेरी मगर उसके हाथ कुछ ना लगा। बाबर ने ज़रूर पंजाब पार करके सरहिंद, अंबाला, शाहाबाद, सरसावा तक आकर कैंप लगाए। वो चढ़ता आ रहा था और उधर लोदी ने भी सेना को बढ़ाया। बाबर कहता है कि बैरी की गिनती एक लाख थी। हाथी एक हज़ार बताए जाते थे। उसके पास दो पुरखों का माल खचाखच भरा था। बाबरनामा में वो लिखता है कि हिंदुस्तान में चलन है कि काम आ पड़ने पर सिपाहियों की भरती कर ली जाती है। सुलतान एक लाख सिपाही और जुटा सकता था। पर अल्लाह की मौज है, वह ना तो अपने लश्कर को मना सका और ना ही रुपये बांटकर बंधदी कर सका। कर भी कैसे सकता था? भीतर से मक्खीचूस था। रुपये का एक ही सुख जानता था- तल्लड़ में बंद रखने का सुख।

बाबर कहता है कि जब वो पानीपत के मैदान में खाइयां खोद रहा था तब भी लोदी को उन पर हमले की ना सूझी। कोई भी जानकार लड़वैया ऐसी गहरी चूक कभी ना करता। खैर, बाबर 7-8 दिन पानीपत में जमा रहा। बीच-बीच में उसके सिपाही लोदी की छावनी तक जाकर तीर बरसाते और कितनों के सिर काट लाते। हुमायूं भी इस जंग में शामिल था और सीख रहा था। साल ये 1526 था और महीना अप्रैल। किसी भी दिन सीधा टकराव तय था। बाबर ने तुलगुमा शैली में सेना को बांट दिया। उसे पता था कि लोग उसके पास कम हैं इसलिए रणनीति ही सहारा है। लड़ाई में उस्ताद अली कुली खां के तोपखाने का भी अहम रोल था। वो बहुत तजुरबेकार आदमी था। 21 अप्रैल की सुबह छिड़ी वो हिंदुस्तान की पहली लड़ाई थी जिसमें बारुद का इस्तेमाल हो रहा था। इतनी तेज़ आवाज़ें सुनी गई कि लोदी की शाही सेना में हड़कंप मच गया। अभी दिन ढला नहीं था लेकिन बाबर बताता है कि शाही सेना पस्त होने लगी। उसने लिखा- अल्लाह ताला की मेहरबानी ने काम ऐसा आसान कर दिया कि बैरी का वो अनगिनत लश्कर डेढ़-दो पहर के अरसे में धूम में मिलकरक रहर गया। पांच-छह हज़ार तो सुलतान इब्राहीम के पास एक ही जगह मरे थे। हर कहीं लाशों के टीले लगे थे। मरे हुओं की गिनती हमने 15-16 हजार कूती पर आगरा जाने पर हिंदुस्तानियों से पता चला कि 50-60 हजार काम आए थे।

खैर, आंकड़े भले ही अलग-अलग हों लेकिन बाबर बताता है कि पहले उसे लगा कि सुल्तान भाग गया मगर बाद में उसके एक खास ताहिर तीबरी ने लाशों के ढेर में इब्राहीम लोदी का शव पहचान लिया। उसका सिर काटकर लाया गया। बकौल तारीखि सलातीनि अफ़ग़ाना बाबर ने इब्राहीम की कब्र वहीं बनवाई जहां वो मरा था और उसका सिर हाथ में लेकर कहा था- तुम्हारे साहस का सम्मान उचित है।

लोदी वंश के आखिरी शासक के साथ मिथिला के महाराजा लक्ष्मीनाथ सिंह देव झा भी मारे गए थे। ग्वालियर के राजा विक्रमाजीत (विक्रमादित्य) की भी मौत इसी लड़ाई में हुई।

इस तरह बाबर के लिए दिल्ली-आगरा का रास्ता साफ हो गया लेकिन क्या आप जानते हैं कि लोदी वंश की सल्तनत खत्म होने के बावजूद कुछ दिन बाद बाबर उसी की वजह से मरते-मरते बचा था और वो भी लोदी वंश की एक महिला के ही हाथों? वो कहानी पढ़नी है तो बताइएगा क्योंकि ये लंबी हो गई है और मेहनत भी काफी हो चुकी। रुचि बनी रही हो तो बात आगे बढ़ाएंगे।

 

मुगल बादशाह बाबर

बाबर (Babur) का जन्म 14 फरवरी 1483 ई. को मावराउन्न्हर की एक छोटी सी रियासत फरगना (Fergana ) में हुआ था |

बाबर के पिता का नाम उमरशेख मिर्जा (Umar Sheikh Mirza) था जो फरगना की जागीर का मालिक था तथा उसकी माँ का नाम कुतुलनिगार खां (Qutlugh Nigar Khanum) था |

बाबर (Babur) पितृ पक्ष की ओर से तैमुर (Timur) का पांचवा वंशज और मात्र पक्ष की ओर से चंगेज खा (Genghis Khan) का चौदहव वंशज था इस प्रकार उसमे तुर्कों और मंगोलों दोनों के रक्त का सम्मिश्रण था |

बाबर (Babur) ने जिस नवीन राजवंश की नीवं डाली , वह तुर्की नस्ल का “चगताई वंश” Chaghatai Dynasty था | जिसका नाम चंगेज खां के द्वितीय पुत्र के नाम पर पड़ा था |

बाबर अपने पिता की मृत्यु के बाद 11 वर्ष की अल्पायु में 1494 ई. में फरगना की गद्दी पर बैठा था |

बाबर (Babur) का भारत पर आक्रमण मध्य एशिया के शक्तिशाली उज्ज्बेको से बार-बार पराजय , शक्तिशाली सफवी वंश तथा उस्मानी वंश के भय का प्रतिफल था |

बाबर के उजबेक सरदार शैबानी खा की बार बार पराजय ने उसे पैतृक सिंहासन को प्राप्त करने का विचार छोडकर दक्षिण-पूर्व (अर्थात भारत) में अपना भाग्य आजमाने के लिए विवश कर दिया |

इस कड़ी में बाबर ने 1504 ई. में काबुल पर अधिकार कर लिया और परिणामस्वरूप उसने 1507 ई. में पादशाह की उपाधि धारण की | पादशाह से पूर्व बाबर “मिर्जा” की पैतृक उपाधि धारण करता था |

बाबर ने जिस समय भारत पर आक्रमण किया उस समय बंगाल , मालवा ,गुजरात , सिंध , कश्मीर ,मेवाड़, दिल्ली खानदेश , विजयनगर एवं विच्चिन बहमनी रियासते आदि अनेक स्वतंत्र राज्य थे |

बाबर (Babur) ने अपनी आत्मकथा “बाबरनामा” (Baburnama) में केवल पाँच मुस्लिम शासको – बंगाल ,दिल्ली , मालवा ,गुजरात और बहमनी तथा दो हिन्दू शासको “मेवाड़ और विजयनगर” का ही उल्लेख किया है |

बाबर ने अपनी आत्मकथा “बाबरनामा” में विजयनगर के तत्कालीन शासक “कृष्णदेव राय” को समकालीन भारत का सबसे शक्तिशाली राजा कहा है |

बाबर को भारत आने का निमन्त्रण पंजाब के सूबेदार दौलत खा लोदी तथा इब्राहिम के चाचा आलम खा लोदी ने दिया था |

राणा सांगा (Rana Sanga) द्वारा बाबर को भारत पर आक्रमण का उल्लेख सिर्फ बाबर ने स्वयं अपनी आत्मकथा में किया है इसके अलावा किसी भी स्त्रोत में इस साक्ष्य की पुष्टि नही हो पायी है |

बाबर ने पानीपत विजय से पूर्व भारत पर चार बार आक्रमण किया था | इस प्रकार पानीपत विजय उसका भारत पर पांचवा आक्रमण था |

बाबर (Babur) ने भारत पर पहला आक्रमण 1519 ई. में “बाजौर” पर किया था और उसी आक्रमण में ही उसने भेरा के किले को भी जीता था |

बाबर ने अपनी आत्मकथा में कहा है कि इस किले (भेरा) को जीतने में उसने सर्वप्रथम बारूद अर्थात तोपखाने का प्रयोग किया था |

पानीपत के प्रथम युद्ध (21 अप्रैल 1526) में बाबर की विजय का मुख्य कारण उसका तोपखाना और कुशल सेनापतित्व था |

पानीपत के प्रथम युद्ध (First battle of Panipat) में बाबर ने उज्बेको की युद्ध निति “तुलगमा युद्ध पद्दति ” तथा तोपों को सजाने में “उस्मानी विधि” का प्रयोग किया था |

दो गाडियों के बीच व्यवस्थित जगह छोडकर उसमे तोपों को रखकर चलाने को उस्मानी विधि कहा जाता था | इस विधि को उस्मानी विधि इसलिए कहा जाता था क्योंकि इसका प्रयोग उस्मानियो ने सफवी शासक शाह इस्माइल के खिलाफ युद्ध में किया था |

पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर के तोपखाने का नेतृत्व उस्ताद अली और मुस्तफा खा नामक दो योग्य तुर्की अधिकारियों ने किया था |

पानीपत के युद्ध में इब्राहिम लोदी की पराजय का मुख्य कारण एकता का अभाव , अकुशल सेनापतित्व तथा अफगान सरदारों की उससे क्शुब्द्ता थी |

पानीपत का युद्ध परिणाम की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण नही था | फलस्वरूप इस युद्ध ने भारत के भाग्य को नही बल्कि लोदियो के भाग्य का निर्णय किया |

पानीपत युद्ध के विजय के उपलक्ष्य में बाबर ने काबुल के प्रत्येक निवासी को एक एक चाँदी का सिक्का दान में दिया था | अपनी उदारता के कारण बाबर को “कलन्दर” भी कहा जाता है |

राजपूतो के विरूद्ध बाबर द्वारा लड़े गये खानवा के युद्ध का मुख्य कारण बाबर का भारत में रहने का निश्चय था |

राणा सांगा और बाबर के बीच शक्ति प्रदर्शन आगरा से 40 किमी दूर खानवा नामक स्थान पर 17 मार्च 1527 में हुआ था |

इस युद्ध में राणा सांगा की ओर से हसन खां मेवाती , महमूद लोदी , आलम खा लोदी तथा मेदिनी राय ने भाग लिया था |

बाबर (Babar) ने अपने सैनिको का मनोबल बढाने के लिए जिहाद का नारा दिया था तथा मुस्लमानो पर लगने वाले तमगा कर की समाप्ति की घोषणा की |

बाबर (Babur) ने खानवा के युद्ध में विजय प्राप्ति के बाद गाजी (योद्धा एवं धर्म प्रचारक दोनों) की उपाधि धारण की |

बाबर ने 29 जनवरी 1528 में चंदेरी पर अधिकार हेतु मेंदिनीराय पर आक्रमण किया जिसमे वह विजयी हुआ | यह विजय बाबर के लिए मालवा जीतने में सहायक सिद्ध हुयी |

बाबर (Babar) ने इस युद्ध में भी जिहाद का नारा दिया था और युद्ध के पश्चात राजपूतो के सिरों की मीनार बनवाई थी | चंदेरी के युद्ध में राजपूत स्त्रियों ने जौहर व्रत किया था |

बाबर ने 06 मई 1529 को घाघरा के युद्ध में बिहार और बंगाल की संयुक्त अफगान सेना को पराजित किया | इस युद्ध के पश्चात बाबर का भारत पर स्थायी अधिकार हो | अब उसके साम्राज्य की सीमा सिन्धु से लेकर बिहार तक तथा हिमालय से लेकर ग्वालियर तक फ़ैल गया था |

26 दिसम्बर 1530 को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गयी और उसे आगरा में “नूर अफगान” बाग़ में दफना दिया गया परन्तु बाद में उसे काबुल में उसी के द्वारा चुने गये स्थान पर दफनाया गया |

कुछ इतिहासकार बाबर (Babar) की मृत्यु का कारण इब्राहिम लोदी की माँ द्वारा दिए गये विष को मानते है |

बाबर ने सर्वप्रथम “सुल्तान” की परम्परा को तोडकर अपने को “बादशाह ” घोषित किया था जबकि इससे पूर्व के शासक अपने को सुल्तान कहकर पुकारते थे |

बाबर बागो को लगाने का बड़ा शौकीन था | उसने आगरा में ज्यामितीय विधि से एक बाग़ लगवाया जिसे “नुरे-अफगान” कहा जाता था परन्तु अब इसे “आराम-बाग़” कहा जाता है |

बाबर ने सड़को को नापने के लिए “गज-ए-बाबरी” नामक माप का प्रयोग किया था जो कालान्तर तक चलता रहा |

बाबर की आत्मकथा का अनुवाद अब्दुर्रहीम खानखान ने फारसी और श्रीमति बेबरीज ने अंग्रेजी में किया था |

 

 

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जब भी सत्ता अंकुश लगाने पर आमादा होती है अपनी बात कहने के नए तरीके ईजाद कर लिए जाते हैं। जब तक सत्ताधीश को बात समझ आती है, लोग फिर नया तरीका ढूंढ लेते हैं। किसी एक जगह या एक सत्ता की बात नहीं, ये संघर्ष पुराना है। जान से मार देने के बावजूद बातें दफन नहीं की जा सकीं। सुकरात की हत्या ने उनके विचारों को तेज़ी से फैलाया। ईसा की हत्या ने उनसे मुहब्बत करने के लिए लोगों को मजबूर किया। भगत सिंह की फांसी ने लोगों को उनके विचारों की तरफ खींचा। गांधी की हत्या ने देश में दंगे बंद करा दिए। फिर लिखता हूं- अगर आपको एक भी आदमी पढ़ता है तो भी अपनी बात लिखिए, ताकि उनको पता रहे कि अभी सब भेड़ नहीं बने हैं।

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