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मुसलमान इस ज़मीन पर सबसे लापरवाह लोग हैं : बाबरी मस्जिद मामले में अरशद मदनी और मोहन भागवत के बीच समझौता हुआ है?

इस्लाम की तारीख और मुसलमानों की तारीख दोनों अलग – अलग हैं, इस्लाम का इतिहास रसूल अल्लाह की पैदाइश से आप की वफ़ात तक का वक़्त है, इसमें ज़ियादा से ज़ियादा शुरू के चार खलीफाओं के साशनकाल को भी शामिल किया जा सकता है, उसके बाद का जो वक़्त है वो मुसलमानों का इतिहास है, मुसलमानों के इतिहास में क़ुरआन/हदीस/शरीयत मौजूद रही मगर जहाँ ज़रूरत हुई उसके हिसाब से काम किया गया, इस वक़्त में रसूल अल्लाह की मदनी रियासत का तसवुर ख़तम हो चुका था और उसकी जगह शंहशाहियत ने ले ली थी, इस दौर में बड़े बड़े शहंशाह हुए, उनके रुतबे/जलाल/ज़ुल्म इतिहास में दर्ज है,,,ये वो समय था जब मुसलमानों की ‘ट्रेन’ ग़लत पटरी पर ग़लत दिशा में चल पड़ी थी, जबकि वेस्ट में जो उस समय शहनशाहियत थी वो उन्होंने ख़तम कर के रसूल अल्लाह की मदनी रियासत का मॉडल ‘सेक्युलर/लिबरल/डेमोक्रेटिक सिस्टम को तुरंत अपना लिया था, इसकी वजह से यूरोप में तरक्की की राह को बहुत तेज़ी मिली, वहां का समाज दुनियां के हर मैदान में बहुत आगे निकल गया, यहाँ मुसलमानों ने रसूल अल्लाह की मदनी रियायत के मॉडल को छोड़ कर यूरोप की शंशाहियत को अपनालिया लिहाज़ा मुसलमानों की पस्ती हर जगह होती चली गयी, भारत में ज़रूर मुस्लिम राज बहुत मज़बूती से कायम रहा, यहाँ के मुस्लिम बादशाहों ने अरबी शहनशाहियत से खुद को दूर रखा जिसकी वजह से भारत में कानून का राज कायम रहा, साथ ही समाजी तैराकी ने बुलंदी हासिल की

अरब की मुस्लिम हुकूमतों ने बड़े ज़ुल्म किये थे, ऐसे ज़ुल्म जिनकी मिसाल दुनियां के किसी इतिहास में नहीं मिलती हैं, होशियार ग़ैर मुस्लिम लोग मुसलमानों को टारगेट कर इन पहलुओं पर हमले करते रहते हैं, मुस्लमान भी हर काल को इस्लामिक इतिहास बता कर ग़लतियाँ करते हैं

इस वक़्त भारत के मुस्लमान अपने इतिहास के सबसे बुरे समय में पहुँच गए हैं और अगर कोई मुझ से पूंछे तो मै समझता हूँ कि भारत में मुसलमानों के ग़ुलाम बनने का समय आ चुका है

यहूदी बड़ी सख्त जान कौम है, इस कौम ने बेहद मुश्किल दौर देखे हैं, दुनियांभर में इनका बड़ा पैमाने पर क़त्लेआम हुआ है, यहूदियों ने तमाम तरह की मुश्किलों को बर्दाश्त करते हुए अपनी कोशिशों को कभी नहीं छोड़ा, वो अपने टार्गेट्स की प्राप्ति के लिए हमेशा ‘घुन/दीमक’ की तरह लगातार काम करते रहे, यह कौम इस ज़मीन पर यहूदी कौम से ज़ियादा अनुसाहित कोई नहीं है, इनके अंदर बे-तहशा एकता पायी जाती है

वहीँ अगर यहूदी कौम से मुस्लिम कौम का कामपेरीज़ान करें तो मालूम होता है कि मुसलमानों के अंदर अनुसाशन और एकता का कहीं ओर छोर भी पल्ले नहीं पड़ेगा, इनकी भविष्य की योजनाएं समंदर के बुलबुलों जैसी होती हैं, जो पैदा होती हैं और इन्तिकाल फरमा जाती हैं, मुसलमानों इस ज़मीन पर सबसे लापरवाह लोग हैं, सबसे ज़यादा मदमस्त, इनमे सभी लोग बड़े वाले जानकार हैं, सभी लीडर हैं, सभी बहादुर हैं, सभी के बाप दादा ने जंगे लड़ी हैं और जीती हैं, सभी के पुखे ज़मीदार, जागीरदार, नवाब, राजे महाराजे हुआ करते थे, सभी को ज़मीन से लेकर आसमानों तक का पूरा इलम है

यहूदियों की कामयाबियां उनकी क़ाबलियत/मेहनत के दम पर है, वो मेहनत उन्होंने चाहे ग़लत रास्तों पर ही क्यों न की हो पर वो काम करते हैं, न रुकते हैं न थकते हैं, अब ये भी जान लें कि भारत में यहूदी हज़ारों साल पहले गुजरात के सूरत में आ कर बसे थे, ये लोग यमन से यहाँ आये थे, इसराइल ने 12 यहूदी कबीलों को देश निकाला दिया था, जिनमे से कुछ ईरान पहुंचे, इराक पहुंचे, यमन, अफ़ग़ानिस्तान में आ कर बस गए, भारत के यहुदिओं की आगे की नस्लों ने खुद को भारत के समाज के हिसाब से ढाला और इनमे से बहुत सारे पंडित/ब्राह्मण बन गए, ब्रह्म जिसने ब्रह्माण्ड को जनम दिया, ब्रह्माण्ड की जानकारी रखने वाले ब्रह्मा के करीबी ब्राह्मण हुए, ब्राह्मण फिलॉसफी है कि ये इस धरती के मालिक हैं, यहाँ जो कुछ भी है सब पर इनका अधिकार है, और ये सबसे उत्तम लोग हैं

सूरत के एक यहूदी ने अपनी बेटी की शादी में मुंबई को दहेज़ में दिया था तब मुंबई किसी गॉंव की तरह था, सूरत से यहूदी नासिक, पुणे, नागपुर जा कर बसे

1947 में भारत के बटवारे और अंग्रेज़ों के सत्ता हस्तांतरण के बाद भारत के अंदर जो दौलतमंद, हैसियतमंद, ताक़तवर मुस्लमान थे वो पाकिस्तान, लंदन, अमेरिका वरैरह देशों में जा कर बस गए यहाँ भारत में ग़रीब, मज़दूर, पिछड़े मुसलमानों की बड़ी तादाद रह गयी थी, कुछ जो किसी लायक थे वो राजनैतिक पार्टियों में घुस गए और अपने फायदे के लिए काम करते रहे, वहीँ यहूदियों से ब्राह्मण बने लोगों ने मुसलमानों के खिलाफ संगठित होकर काम करना शुरू रखा धीरे धीरे ये लोग सत्ता के शिखर तक पहुँच गए, आज इनका भारत पर पूर्ण कब्ज़ा है

अब भारत के मुसलमानों का भविष्य अंधी सुरंग की तरफ उन्हें लेकर जाता है, ये ऐसी सुरंग है जिसका दूसरा छोर.किनारा कहाँ जाता है किसी को नहीं मालूम, इन हालात से कैसे निपटा जाए आज किसी भी मुस्लमान के पार इसकी कोई तरकीब नहीं है,

एक खबर और जान लें इस वक़्त बाबरी मस्जिद के मसले पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में जारी है, हिन्दू पक्ष की तरफ से अपना पक्ष रखा जा चुका है, और अब मुस्लिम पक्ष की तरफ से बहस जारी है, अदालत का फैसला क्या आयेगा ये तो आगे चल कर पता चलेगा, सूत्रों के मुताबिक मुस्लिम पक्षकारों में आपस में भसड़ हो गयी है, सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद के दो पक्षकार हैं एक है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड़ और दूसरा है जमीयत-उल-उल्माये-हिन्द, दोनों फ़रीक़ की तरफ से एक साझा वकील है, जमीयत और पर्सनल लॉ बोर्ड में झगड़ा ख़बरों को अख़बारों में छपवाने को लेकर हो रहा है, जमीयत की तरफ से प्रेस को जारी बयानों में पर्सनल लॉ बोर्ड का कहीं ज़िक्र नहीं होता है, जबकि बोर्ड अपने बयानों में जमीयत का नाम शामिल रखता है

जमीयत उलेमाए हिन्द के कर्ताधर्ता मौलाना अरशद मदनी पाए के सियासतदां हैं, 2004 में लोकसभा चुनावों उत्तर प्रदेश में ‘अवामी फ्रंट” नाम से एक गठबंधन तैयार हुआ था जब इस गठबंधन की तरफ से मौलाना से शामिल होने की दवात दी गयी तो मौलाना ने ‘मै मज़हबी कारकुन हूँ सियासत से मेरा वास्ता नहीं है’ कह कर खुद को अलग रखा और कुछ दिनबाद राष्ट्रीय लोकदल अजित सिंह की पार्टी की तरफ से राज्य सभा जा पहुंचे

मौलाना की हाल ही में आरएसएस के मोहन भागवत से निजी मुलाक़ात हुई थी, वो भागवत से मिलने क्यों गए थे, कौनसा ख़ास काम था जो उन्हें वहां ले पहुंचा, कहीं इस मुलाक़ात के पीछे बाबरी मस्जिद को लेकर कोई सौदा/समझौता करना तो मक़सद नहीं था?

 

  • parvez khan

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Manjoor Ahmed 🇮🇳
@ManjoorPoet

Maulana Arshad Madni, the head of the country’s leading Muslim organization Jamiat Ulema-e-Hind, met RSS Sarsanghchalak Mohan Bhagwat.
Maulana Madani told RSS chief without Hindu-Muslim unity and communal harmony, our country cannot become a big force.

मोहन भागवत और उलेमा ए हिन्द के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी की मुलाकात ने लोगों को चौंकाया

02 Sep 2019

नई दिल्लीः आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और जमीयत उलेमा ए हिन्द के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी की मुलाकात ने कई लोगो को अचंभे में डाल दिया है लेकिन आरएसएस इस मसले पर मौन है. बल्कि मदनी का कहना है कि मुलाकात हिन्दू- मुस्लिम एकता बढ़ाने के लिए हुई है.

दिल्ली का झंडेवालान इलाका जो आरएसएस के दिल्ली मुख्यालय के तौर पर भी पहचान रखता है. बीते शुक्रवार को यहां एक चौंकाने वाली घटना घटी है. आरएसएस के इस मुख्यालय में आरएसएस प्रमुख के साथ मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा ए हिन्द के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी की डेढ़ घंटे लंबी मुलाकात हुई, मुलाकात को लेकर आरएसएस मौन है लेकिन जमीयत उलेमा ए हिन्द ने इस पर चुप्पी तोड़ी है.

सूत्रों का कहना है कि मौजूदा हालात में हिन्दू-मुस्लिम एकता को और मजबूत करने के लिए इस बैठक की कोशिशें पिछले दो साल से हो रही थी, भीड़तंत्र द्वारा हत्या और तीन तलाक कानून पास होने के बाद देश में हिन्दू-मुस्लिम एकता को और मजबूत करने की ज़रूरत है, मदनी ने ये भी कहा कि एक बड़े समुदाय को नाराज़ कर देश को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता, इसके लिये दूसरे मुस्लिम संगठनों से भी बात करने की ज़रूरत है.

पिछले साल विज्ञान भवन में आरएसएस का तीन दिवसीय एक सेमीनार किया था जिसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मुस्लिम समुदाय से आरएसएस के बारे में भ्रांति दूर करने और आरएसएस के करीब आने की अपील की थी. आरएसएस हमेशा कहता रहा है कि हिंदुत्व का मतलब जीवन शैली है और जब हिन्दुत्व कहा जाता है तो इसका मतलब हिन्दू-मुसलमान दोनों होता है. आरएसएस के बारे में गलत धारणा को खत्म कर मुस्लिमों को आरएसएस से जुड़ना चाहिए. मदनी और भागवत की इस मुलाकात को इसी कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. इसके अतिरिक्त राममंदिर मुद्दे से भी इस मुलाकात को जोड़ा जा रहा है.

नवम्बर में राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने को उम्मीद है. वही जम्मू-कश्मीर में भी धारा 370 की समाप्ति को लेकर सियासत गरमाई हुई है. हालांकि आरएसएस की तरफ से बार-बार मुस्लिम समुदाय में आरएसएस को लेकर शंकाओं को दूर करने की कोशिश की जाती रही है. मदनी के साथ हुई आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की मुलाकात को आगे भी जारी रखने की ज़िम्मेदारी संघ के सह सम्पर्क प्रमुख रामलाल को दी गयी है. हालांकि उन्होंने भी इस मुलाकात पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है.

 

WASI AHMAD QADRI
@wasiahmad1961

We request the PM of the country, the organization of both Mohan Bhagwat and Arshad Madni should be stopped, peace will prevail in the country and the world, but PM Modi does not have the power to do this work, then PM Modi has zero in our eyes And there is a burden on the earth

 

Meeting of Maulana Madani and Mohan Bhagwat, the Jamiat and the RSS chiefs, sets cat among the pigeons

 

The meeting between Jamiat-e-Ulema-Hind (A) chief Maulana Arshad Madani and Mohan Bhagwat on Friday triggered a storm in the Muslim community. But none of the two has spoken on what was discussed

S Khurram Raza
Published : 3 Sep 2019

The first ever meeting between the two, which is said to have lasted an hour and a half at the RSS office in Delhi at Jhandewalan, has set the cat among the pigeons. Several agitated Muslims wonder why Maulana Madani agreed to call on the RSS chief at the RSS office and why their meeting could not take place at a neutral venue.

There is also speculation over what was discussed. A close aide of Maulana Madani told NH, “no, no, we can’t say anything on the Buzurgwar (the elder) and his meeting.” But while no Muslim leader is prepared to say anything on record, a measure of the respect and clout enjoyed by the Jamiat chief, off the record they fumed and made no secret of their uneasiness. The meeting, some of them said, would also erode the respect and authority that the Jamiat chief enjoyed.

The RSS, they quickly pointed out, had taken it as a tactical victory and would be gloating at the Jamiat chief personally calling on Bhagwat at the RSS office. Earlier the RSS had invited Madani to listen to a series of lectures by Bhagwat at the Vigyan Bhavan but the Jamiat chief had politely declined and had stayed away.

But while the perception is that the meeting was set up at the behest of the Jamiat chief, sources say that it was the RSS which had sent overtures. The meeting was on the anvil for several months and while the RSS chief had expressed his desire to meet Maulana Madani before the general election, the latter had prudently decided to wait till after the election.

Sanjay Pandey, who is the RSS in charge of its school programme, Saraswati Shishu Mandir, is credited with arranging the meeting. Pandey, who hails from Dehradun, is said to have been impressed with the educational institutions run by Jamiat-e-Ulema-Hind. Pandey was also impressed by the fact that a large number of non-Muslims also studied in the engineering schools and B.Ed colleges run by Jamiat in Dehradun, Punjab and Rajasthan besides other places.

Sources close to Madani claim that when Pandey had called on the Jamiat chief, the latter had conveyed his displeasure with the RSS to him. Once this was conveyed to Bhagwat, the RSS chief expressed a desire to meet the Maulana.

Critics of the meeting point to the irony that the Jamiat, which played a stellar role in the Independence struggle, agreed to a meeting with the RSS, which played no role in the freedom struggle. “ Surely the two community leaders would not have discussed how to maintain communal harmony and lead the country to prosperity,” is the acerbic exclamation that one hears again and again from Muslims across the board.

In the absence of authoritative information, speculation is rife that the two may have discussed the situation in Assam in the aftermath of the NRC. The more charitable have speculated that the two might have discussed a resolution of the Babri Masjid demolition and dispute over the Ram Temple. But sources close to the Maulana claim that the Babri Masjid issue was not discussed at all. Instead, they claim that the discussion centred around the mob lynching, insecurity among Muslims and discrimination.

Significantly, some of them blurted out that the Maulana did not mince his words at the meeting and said he remained opposed to the ideas of the RSS, Savarkar and Golwalkar. But they also added that the Maulana indicated that in national interest Jamiat would always set aside ideological differences and work together.

Observer feels that tough days are ahead for Arshad Madni and this time it could be tougher than 2008 when Jamiat split into two as differences appeared between uncle (Arshad Madni) and nephew (Mehmood Madni). Both the Jamiat factions claims to be the real Jamiat.

But even as his followers point out that RSS needs the Maulana more because of the goodwill and support that he enjoys in the community, the Jamiat head clearly has a lot of answering to do.

मौलाना अरशद मदनी की मुनाफ़िक़ात की पूरी कहानी

By : शोएब रज़ा
Sep 1, 2019

नई दिल्लीः जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैयद अशरद मदनी और राष्ट्रीय स्वयं सेवा संघ के प्रमुख मोहन भागवत के बीच 30 अगस्त को हुई मुलाकात ने देश में अचानक सियासी चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया. दो बिल्कुल अलग विचारधारा वाले संग़ठन जमीयत उलेमा ए हिन्द और आरएसएस इतने नज़दीक आ जाएगें और जमीयत के अध्य्क्ष मौलाना अरशद मदनी आरएसएस चीफ मोहन भागवत से मिलने पहुंच जाएंगे, ये बात किसी ने कभी नहीं सोची थी, लेकिन 30 अगस्त को ऐसा ही हुआ और मदनी के मुलाकात मोहन भागवत से हुई.

इस मुलाकात को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाओं के आने का सिलसिला अभी तक जारी है, लेकिन ये मुलाकात अचानक नहीं हुई बल्कि इसकी भूमिका पिछले करीब डेढ़ साल से बन रही थी और इसके लिए बाकायदा संघ के बड़े नेता मौलाना अरशद मदनी के सम्पर्क में थे.

जी मीडिया को कुछ ऐसी तस्वीरें हाथ लगी है जिसमें दारुल उलूम देवबंद की रशीदिया मस्जिद में मौलाना अरशद मदनी के साथ आरएसएस नेता और आरएसएस प्रशिक्षण सेंटर के अध्य्क्ष सुनील पांडे बैठे नज़र आ रहे है. ये तस्वीरें करीब एक साल पुरानी है.

मौलाना अरशद मदनी ने जी मीडिया से हुई बातचीत में इस बात को माना कि उनकी आरएसएस चीफ मोहन भागवत से मुलाकात में सुनील पांडे का अहम रोल रहा और जब दिल्ली के आरएसएस कार्यलय में उनकी मुलाकात मोहन भागवत से हुई उस वक़्त भी सुनील पांडे मौजूद थे. ये मुलाकात गैर राजनीतिक थी और हिन्दू मुस्लिम भाईचारा कायम करने के मकसद से की गई थी.

मौलाना अरशद मदनी ने इस बात को भी जोर देकर कहा कि वो आरएसएस चीफ मोहन भागवत के साथ आने वाले वक्त में मंच भी साझा करेंगे इससे उन्हें कोई परहेज नहीं. मोहन भागवत की तारीफ करते हुए मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि मोहन भागवत बेहद सुलझे हुए आदमी है और वो इस बात को कहते है कि देश की तरक्की के लिए हिंदू मुस्लिम एकता बहुत जरूरी है. यही वजह है कि अब जमीयत उलेमा ए हिन्द और आरएसएस के बीच सम्पर्क ना टूटे इसके लिए पूरी कोशिश की जाएगी.

 

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