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मोहर्रम में बंटने वाले तबर्रुक में हलीम बहुत ख़ास है : हलीम कब और कैसे बना और कहां से आया भारत?

अच्छा खाना किसे पसंद नहीं और यदि आपका संबंध दिल्ली, हैदराबाद, लखनऊ या फिर कराची से है तो चाहे आप खाने-पीने के लिए उत्सुक हों या न हों, बिरयानी और हलीम का उल्लेख आते ही अपकी भूख ज़रूर जाग उठेगी। यह तो अधिकतर लोग जानते हैं कि बिरयानी बनाने का श्रेय मुग़ल रानी मुमताज़ महल के सिर जाता है लेकिन बहुत कम लोगों को यह पता है कि हलीम की शुरुआत कहां से हुई है?

हलीम वास्तव में अरब के प्रसिद्ध पकवान “हरीस” का भारतीय रूप है। दसवीं शताब्दी में मोहम्मद मुज़फ़्फ़र अल-सय्यार द्वारा संकलित की गई पुस्तक “अल-क़बीख़” अरबी व्यंजनों की पहली जानकारीपूर्ण पुस्तक थी। इस पुस्तक के मुताबिक़ हरीस इराक़ के बग़दाद के अमीरों का एक पसंदीदा खाना था। अरब से हरीस ईरान और फिर भारतीय उपमहाद्वीप में आम हो गई। इब्ने बतूता ने अपने सफ़रनामे में एक स्थान पर लिखा है कि फ़ार्स के लोग अपने हर महमान को हरीस पेश करते हैं जो गोश्त, दाल और घी से तैयार किया जाता है।

अरबों के वहां इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई? इतिहासकार इस पर एकमत नहीं हैं। अरबी व्यंजनों की प्रसिद्ध इतिहासकार “क्लोदा रोग़न” के मुताबिक़, अरबों ने हरीस अंदलिस के यहूदियों से सीखा था, जो सप्ताह के पवित्र दिन अपने दस्तरख़ान पर इसका विशेष इंतेज़ाम करते थे। इसके विपरीत अमेरिकी लेखिका ईनाया क्लीज़लू टाइम पत्रिका में विभिन्न ऐतिहासिक तथ्यों से यह साबित करती नज़र आती हैं कि वास्तव में एक अमावी बादशाह के पास जब यमन से गणमान्य लोगों का एक प्रतिनिधिमंडल दमिश्क़ आया तो बादशाह ने राजनीतिक वार्ता से पहले अनाज और गोश्त से तैयार इस पकवान को बनाने का तरीक़ा मालूम किया जो उन्होंने कभी यमन में खाया था। जिससे पता चलता है कि हरीस यमन से दमिश्क़ और फिर दमिश्क़ से बग़दाद पहुंचा है।

सात विभिन्न प्रकार के अनाज और गोश्त के इस स्वादिष्ट मिश्रण को भारत की धरती पर सबसे पहले अरब ने परिचित करवाया और समय के साथ-साथ इसमें भारतीय मसालों का स्वाद शामिल होने लगा। उत्तरी भारत में इसका रिवाज सम्राट हुमायूँ के ईरान से लौटने के बाद शुरू हुआ और अकबर के शासनकाल में इसे और ज़्यादा बढ़ावा मिला। हैदराबाद डेक्कन में सुल्तान सैफ़ नवाब जंग के ज़माने में इसे सभी सरकारी मेहमानों के सामने बहुत सलीक़े से पेश किया जाता था। कहा जाता है कि भारत के विभिन्न इलाक़ो में बनने वाला खिचड़ा भी हरीस का ही एक रूप है। हलांकि हरीस, हलीम कैसे हुआ? इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। अरबी में “हलीम” का एक अर्थ “नरम” भी होता है, तो इसलिए यह कहना भी सही नहीं है कि हलीम, हरीस का ही बिगड़ा हुआ उच्चारण है या फिर यह वास्तव में अरबी भाषा वाला ही हलीम है।


लेकिन इस बहस की परवाह किए बिना यह सच है कि हलीम को जो सार्वजनिक लोकप्रियता भारत और विशेषकर उत्तरी भारत और हैदराबाद डेक्कन में प्राप्त हुई वैसी लोकप्रियता न ईरान में मिली और नहीं ही किसी अरब देश में। कोलकाता से लेकर कराची तक हलीम भारतीय उपमहाद्वीम के मुसलमानों को एक पहचान बन चुका है। भारत में हलीम को धार्मिक कार्यक्रमों पेश करने की परंपरा भी काफ़ी पुरानी है। कई सदियों से दिल्ली, लखनऊ और हैदराबाद के शिया मुसलमान मोहर्रम के मौक़े पर आयोजित होने वाली मजलिसों के बाद हलीम बांटते और खिलाते हैं और इसी तरह बंटवारे के बाद यह सिलसिला मुहाजिरों के ज़रिए पंजाब और सिंध में भी आम हो गया। शिया मुसलमानों की यह परंपरा इतनी आम हुई कि अब सुन्नी मुसलमान भी नज़रों-नयाज़ में हलीम को प्रमुख्ता से जगह देते हैं। बांग्लादेश में हलीम रमज़ान के मुबारक महीने के लिए विशेष है। तरावीह की के बाद ढाका के विभिन्न इलाक़ों में हलीम की तैयारी आरंभ हो जाती है जिसे सहरी के समय खाया जाता है।

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