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वो ख़त जिसको पढ़कर मुहम्मद बिन क़ासिम ने 17 साल की उम्र में हिन्द व सिंध के ज़ालिम हुक्मरानों को रौंद डाला…!

यह ख़त अबुल हसन की बेटी नाहिद ने सिंध से एक सफेद रुमाल पर अपने खून से हज्जाज़ बिन यूसुफ के लिए लिखा था, और क़ासिद से कहा था…
“अगर हज्जाज बिन युसुफ़ का खून मुंजमद हो गया हो तो मेरा ये खत पेश कर देना वरना इसकी जरूरत नहीं है।

हज्जाज़ बिन यूसुफ ने खत के चंद सुतूर पढ़कर कंपकपा उठा, और उसकी आंखों के शोले पानी में तब्दील होने लगे, उसने रुमाल मुहम्मद बिन क़ासिम के हाथों में दे दिया, मुहम्मद बिन कासिम ने शुरू से लेकर आखिर तक लिखे अल्फ़ाज़ पढ़ा उसमे लिखा था……

“मुझे यक़ीन है कि वालि-ए-बसरा क़ासिद की ज़बानी मुसलमान बच्चों और औरतों का हाल सुनकर अपनी फ़ौज के गय्यूर सिपाहियों को घोड़ों पर ज़िनें डालने का हुक्म दे चुका होगा, और क़ासिद को मेरा ये खत दिखाने की जरूरत पेश नहीं आएगी, अगर हज्जाज बिन युसुफ़ का खून मुंजमद हो चुका है तो शायद मेरी तहरीर भी बेसूद साबित हो, मैं अबुल हसन की बेटी हूं मैं और मेरा भाई अभी तक दुश्मन के दस्तरस से महफूज़ हैं, लेकिन हमारे साथी एक ऐसे दुश्मन की कैद में है जिसके दिल में रहम के लिए कोई जगह नहीं है।

क़ैदख़ाने की इस तारीक कोठरी का तसउव्वुर कीजिए जिसके अंदर असीरों के कान मुजाहिदीन-ए-इस्लाम के घोड़ों की टापूँ की आवाज़ सुनने के लिए बेकरार हैं। ये एक मोअजज़ा था कि मैं और मेरा भाई दुश्मन के क़ैद से बच गए थे, लेकिन हमारी तलाश जारी है और मुमकिन है, हमें भी किसी तारीक कोठरी में फेंक दिया जाए। मुमकिन है कि इससे पहले मेरा जख्म मुझे मौत की नींद सुला दे और मैं इबरतनाक अंजाम से बच जाऊं, लेकिन मरते वक़्त मुझे इस बात का अफ़सोस होगा कि, वो सबा रफ्तार घोड़े जिनके सवार तुर्किस्तान और अफ्रीका के दरवाज़े खटखटा रहे हैं, अपनी कौम की यतीम और बेबस बच्चों की मदद को ना पहुंच सके, क्या ये मुमकिन है कि वो तलवार जो रोम और ईरान के मफदूर ताजदारों के सिर पर साबक़ा बनकर कुंदी-
सिंध के मग़रूर राजा के सामने कुंद साबित होंगी?

मैं मौत से क़त्तई नहीं डरती लेकिन ऐ हज्जाज़ अगर तुम जिंदा हो तो अपनी अपनी ग़य्यूर क़ौम के यतीमों और बेवाओं की मदद को पहुंचो”

“नाहिद एक ग़य्यूर क़ौम की बेबस बेटी”

इस खत को पढ़ने के बाद 17 साल की उम्र के मुहम्मद बिन कासिम की सिपहसालारी में मुजाहिदीन-ए-इस्लाम ने हिन्द व सिंध को रौंद डाला था, और क़ौम के बच्चों और औरतों के साथ साथ सालों से ज़ालिम हुक्मरानों के हाथों पिसती सिंध व हिन्द की अवाम को निजात दिलाई थी, और राजा दाहिर को दिखा दिया था कि अभी मुजाहिदीन-ए-इस्लाम की तलवारे कुंद नहीं हुई हैं।

(मुहम्मद बिन क़ासिम)
नसीम हिजाज़ी—-

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