साहित्य

सूर फूंका गया था या नहीं…!!!

Anwar Suhail
==============
सूर फूंका गया था या नहीं
कोई नहीं जानता लेकिन
जलावतनी की सज़ा काटते
असंख्य इंसान हो गये इकट्ठा वहां
हां वह हश्र का मैदान तो न था
लेकिन वह क़यामत भी तो न थी।

कीड़े-मकोड़ों की तरह बजबजाते
इंसानी ढांचों की भीड़
नफ्सा-नफ्सी का आलम
देह से देह छिल जाए ऐसी आपाधापी
निगाहों में थकन की जालियां
चेहरे पर लुटी-पिटी इबारतें
माथे पर शिकन का जुगराफ़िया

सभी का एक ही दर्द
सभी के एक से दु:ख
उम्र, जात, लिंग, रंग का नहीं कोई भेद
हताश, निराश, पस्त लोग

इस भीड़ में मैं भी तो हूं शामिल
धीरे-धीरे अंजान गंतव्य की तरफ़
जैसे ठेला जा रहा हो
भीड़ है कि बढ़ती ही जा रही
चिलचिलाती धूप का कोई असर नहीं
और न ही कोई भूख-प्यास
बस, बची रह जाए जीने की आस
क्योंकि भीड़ जानती थी कि वे मरे नहीं हैं
कि वे अभी बॉयोलाजिकली जीवित हैं
यह अहसास उन्हें मरने से डराता है
यह अहसास उन्हें जीने को ललचाता है

वे लोग जो इस भीड़ का नहीं हैं हिस्सा
वे इस दृश्य से ज़रा भी विचलित नहीं हैं
ये लोग अपने सुखों में वृद्धि के लिए
करते रहते हैं नाना प्रकार के प्रयास

सूरज समय से निकल-डूब रहा है
धरती बदस्तूर घूम रही धुरी पर
तुम अब भी इंतज़ार में हो मेरी जान
कि एक दिन हम सब एक साथ होंगे
कि सपने देखने पर नहीं है कोई बंदिशें अब भी।।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *