उत्तर प्रदेश राज्य

हज़रत इमाम हुसैन की शहादत पर स्वामी सारंग ने किया ज़ंज़ीरों से मातम : देखें लखनऊ के मोहर्रम की तस्वीरें और वीडियो

Swami Sarang
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अगर मुझे नहीं मिलती है मार्फ़त तेरी स्वामी सारंग के
तो फिर ये तय है, कि मुझमे ही कुछ
कमी है “हुसैन”

Mosaddiq Reza

Muharram in lucknow!

Azadari or Mourning in Lucknow, is name of the practices related to mourning and commemoration of the death anniversary of Imam Hussain-ibn-Ali at the Battle of Karbala in 680.
In period of Muharram (in the Indian sub-continent) in the context of remembrance of the events of Karbala, means the period of two months & eight days, starting from the evening of 29 Zill-Hijjah and ending on the evening of 8 Rabi-al-Awwal and in general round the year…

Ya Hussain! 🏴

 

 

Swami Sarang
मोहर्रम आतंकवाद के खिलाफ एक मुहीम है हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत पर हम अपने ख़ून के पुरसा का नजराना पेश करते हैं

 

Swami Sarang
दोस्त के वक़्त पर काम आने का नाम मुहर्रम है..😢

शेरे हैदर को ज़माने में वफा कहते हैं।
बाजू ए शब्बीर को जै़नब की रिदा कहते हैं।
जिससे मिलती है ज़माने के मरीज़ो को शिफा।
उसकोअब्बास के परचम की हवा कहते हैं

हर कौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन

Swami Sarang
10 मोहर्रम यौमे आशूरा ग़मे हुसैन(अ.स.) मे विश्वशांति और के साथ देश व प्रदेश में अमन और शान्ति रहे और लोगों में सद्भाव रहे ईश्वर से इस प्रार्थना के साथ कर्बला के 72 शहीदों की शहादत को याद करते हुए,छुरियों जंजीरो का मातम करके अपने खून से पुरसा दिया,और विश्व में और देश में प्रत्येक आतंकवादी और दिमाग़ से भी जो लोग आतंकवादी है उनका मैं अपने ख़ून के आख़री क़तरे तक विरोध करूँगा,विश्व में शान्ति का रास्ता कर्बला से हो कर जाता है।
#हक़_कीबात_मैंऔर_इमामहुसैन_(अ.स.)-1

Swami Sarang

‘अलम-फातहे-फुरात’ जुलूस-ए-अज़ा दरिया वाली मस्जिद में पहले अपनी खिराजे अकीदत पेश करी और फिर जुलूस में शिरकत करके जनाब मौलाना कलबे जव्वाद नकवी साहब के साथ गंगा जामुनी संस्कृति और समाजिक सौहार्द की ईश्वरीय प्रार्थना करी।;

हज़रत हुसैन

#इस्लाम में हज़रत हुसैन की शहादत 61 हिजरी में हुई!

इससे पहले उनके बड़े भाई और हज़रत अली के सबसे बड़े बेटे *हज़रत हसन* और उनसे पहले खुद उनके वालिद *हज़रते अली* रज़ि अल्लाहु और उससे भी पहले उनके खालू और तीसरे खलीफा हज़रत उस्मान गनी को नबी के शहर मदीना मे उनके घर को कई दिनो तक घेर कर उनको भूका प्यासा रख कर 77 साल बुढ़ापे की उम्र मे शहीद कर दिया गया, यहा तक कि *बागी कूफ़ी उनके जिस्म को काट काट कर टुकड़े कर देना चाहते थे इस लिए सहाबा को छुप कर आधी रात को उन्हें दफनाना पड़ा जन्नतुल बकी मे* ।

और इससे भी पहले इसी मुहर्रम की दूसरी तारीख मे खलीफा हज़रत उमर रज़ि.को *नमाज़ मे पीछे से खंजर मार कर अबु लुलू ने शहीद कर दिया* ।

और इससे भी पहले हज़ारो सहाबा शहीद हुए *इस्लाम की पहली जंग* जंगे बदर और जंगे ओहद में और इससे भी पहले नबी सल्ल के दिल के सबसे करीब और अज़ीज़ चाचा *हज़रत हमज़ा रज़ि* की शहादत हुई और उनके जिस्म को काट कर उनके कालेज, गुर्दा, दिल निकाल कर फेका गया और हमारे आका इस सदमे से कभी उबर नही पाए

और हमारे नबी सल्ल.ने उनको *शहीदो का सरदार कहा

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